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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 19

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 19

दोस्तो आज के कार्यक्रम में हम पवित्र क़ुरआन द्वारा दी गयी एक अन्य शुभसूचना के बारे में चर्चा करेंगे।

महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए यूनुस की 62वीं से लेकर 64वीं तक की आयतों में कहता है” जान लो कि जो ईश्वर को दोस्त रखते हैं वे न तो डरते हैं और न ही दुःखी व क्षुब्ध होते हैं। बेशक जो लोग ईमान लाये और ईश्वर की अवज्ञा करने से डरते हैं वे लोक- परलोक में प्रसन्न हैं, ईश्वर के वादे में कोई परिवर्तन व बदलाव नहीं है और यह बहुत बड़ी सफ़लता है।“ एक दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इस आयत की तिलावत की और अपने साथियों व अनुयाइयों से पूछा कि जानते हो कि ईश्वर के दोस्त कौन लोग हैं? तो उन लोगों ने कहा कि नहीं हे अमीरूल मोमिनीन, आप बताइये कि वे कौन लोग हैं? इस पर इमाम ने फ़रमाया" ईश्वर के दोस्त हम और हमारे वह अनुयाई हैं जो हमारे बाद आयेंगे। उसके बाद इमाम ने फरमाया। कितने भाग्यशाली हैं वे लोग, आप लोगों से भी अधिक भाग्यशाली हैं। इस पर इमाम के कुछ अनुयाइयों ने उनसे कहा” वे क्यों हमसे अधिक भाग्यशाली हैं? क्या हम आपके अनुयाई नहीं हैं? हम दोनों एक ही धर्म के मानने वाले हैं क्यों हम दोनों समान नहीं हैं? इस पर इमाम ने फरमाया नहीं दोनों बराबर नहीं हैं। उन पर वह ज़िम्मेदारियां हैं जो तुम पर नहीं हैं। वे उन कठिनाइयों का सामना करेंगे जिसे तुम सहन नहीं कर रहे हो।" पैग़म्बरे इस्लाम ने भी ईश्वर के दोस्तों का परिचय कराते हुए कहा है कि ईश्वर के दोस्तों का मौन उसकी याद है, उनकी दृष्टि पाठ, उनकी बातें तत्वदर्शी और समाज में उनकी गतिविधियां बरकत का कारण हैं। पवित्र क़ुरआन की आयतों के अनुसार महान ईश्वर के दोस्तों की दो विशेषताएं होती हैं प्रथम यह कि वे महान ईश्वर पर ईमान व आस्था रखते हैं और दूसरे यह कि वे महान ईश्वर से डरते और उसका भय रखते हैं। महान ईश्वर और उसके दोस्तों के मध्य दूरी नहीं होती है। उनके दिलों से पर्दे हट गये हैं। ईमान, नेक अमल और दिल के नेत्रों से महान ईश्वर को इस प्रकार देखते हैं कि उन्हें किसी प्रकार का संदेह नहीं होता और इसी पहचान की वजह से ग़ैर ईश्वर उनकी दृष्टि में छोटा व तुच्छ है और जो लोग महान ईश्वर के दोस्त हैं वे महान ईश्वरीर की याद में इस प्रकार लीन हैं कि वे दूसरों को भूल जाते हैं।

पवित्र कुरआन की इन आयतों से इंसानों को यह सीख मिलती है कि तक़वा वह चीज़ है जो पापों के कारण उत्पन्न भय को ही समाप्त कर देती है। तक़वा एक आंतरिक शक्ति है जो इंसान को पाप करने और उद्दंडी होने से रोकती है। वास्तव में तक़वा इंसान के अंदर वही काम करता है जो गाड़ी के अंदर ब्रेक करता है। जिस तरह ब्रेक गाड़ी को हर प्रकार के ख़तरे से बचाता है उसी प्रकार तक़वा इंसान को हर प्रकार की बुराई, पाप और उद्दंडता से बचाता है। जो लोग तक़वा से सुसज्जित हैं अंदर से उनकी सोच और उनका दिल इस प्रकार के आराम का आभास करता है कि दुनिया में आने वाले किसी भी तूफान से वे भयभीत नहीं होते हैं। इसी तरह किसी भी प्रकार के तूफान से वे परेशान व विचलित नहीं होते हैं। इस आधार पर वे न केवल किसी प्रकार का ग़म व चिंता नहीं करते बल्कि महान ईश्वर लोक-परलोक में उन्हें जो नेअमतें प्रदान करता है और करेगा उससे वे प्रसन्न हैं पर जिन लोगों के दिल तक़वा से खाली हैं उन्हें इस प्रकार की शांति व आराम नसीब नहीं है। आखिर यह कैसे संभव है कि जिस इंसान ने अत्याचार किया हो, लोगों का ख़ून बहाया हो और दूसरों के अधिकारों को  ग़स्ब किया हो और उन्हें छीना हो तो उसे शांति कैसे मिल सकती है। यह तक़वे का स्वाभाविक असर है कि इंसान हर प्रकार अशांति व परेशानी से शांति का आभास करता है और तक़वा उसे हर प्रकार के पापों से दूर रखता है। पवित्र कुरआन जब रोज़े के अनिवार्य होने की बात करता है तो उसका एक रहस्य व तर्क तक़वा बताता है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरए बक़रा की 183वीं आयत में जहां यह कहता है कि हे ईमान लाने वालों तुम पर रोज़ा वैसे ही अनिवार्य किया गया है जैसे तुमसे पहले वालों पर किया गया था ताकि तुम मुत्तक़ी अर्थात ईश्वर से डरने वाले बन सको।“ जब इंसान पापों से परहेज़ करता है और अपनी ग़लत इच्छाओं का पालन नहीं करता है तो यही परहेज़गारी उसे तक़वे के चरण तक पहुंचा देती है और तक़वा इंसान को सही और ग़लत को समझने और उनके मध्य अंतर करने की शक्ति प्रदान करता है। इसी प्रकार तक़वा इंसान को वह शक्ति प्रदान करता है जिसकी वजह से इंसान शांति के साथ जीवन के उतार- चढ़ाव से घबराता नहीं है। दूसरे शब्दों में जो इंसान मुत्तक़ी है यानी महान ईश्वर से डरता है उसके हाथों में प्रज्वलित दीप है जो इंसान को सीधा रास्ता दिखाता है और उसे गुमराही और बर्बादी के रास्ते से सुरक्षित रखता है। पैग़म्बरे इस्लाम अपने एक निष्ठावान साथी व अनुयाइ अबूज़र से कहते हैं” तक़वा समस्त भलाइयों का स्रोत है।“

महान धार्मिक हस्तियों ने तक़वे को इंसान की परिपूर्णता की सीढ़ी बताया है और उस तक पहुंचने के लिए इंसान को हर प्रकार के ग़लत कार्यों व पापों से परहेज़ करने की ज़रूरत है। चूंकि रोज़े की वजह से इंसान के अंदर अपनी ग़लत इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है इसलिए तक़वा हासिल करने का बेहतरीन माध्यम रोज़ा है। रोज़ा रखने वाला इंसान महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए एक महीने तक नियत समय के भीतर खाने- पीने सहित उन समस्त चीज़ों व कार्यों से परहेज़ करता है जिनसे रोज़ा बातिल हो जाता है। इंसान रोज़ा रखकर अपने उद्दंडी मन को नियंत्रित करता है, दिल को स्वच्छ व पवित्र बनाता है और आंतरिक सुधार करता है। इस प्रकार का व्यक्ति अपने अंतर परिवर्तन करके समाज सुधार की भूमि प्रशस्त करता है। वह ग़लत इच्छाओं और अनुचित मांगों के समक्ष प्रतिरोध करता है। अमानत में ख़यानत व विश्वासघात नहीं करता है, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है और वह महान ईश्वर के दोस्तों की पंक्ति में शामिल हो जाता है।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई कहते हैं” रमज़ान महीने के रोज़े का नतीजा हमारे दिल में तक़वा है जो जीवन के उतार- चढ़ाव में हमारी मदद करता है और सीधे रास्ते को हमारे लिए सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार वरिष्ठ नेता कहते हैं जो चीज़ हमें पापों से बचाती है उसकी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी कारण वरिष्ठ नेता रमज़ान महीने में तक़वा हासिल करने पर बल देते और उसके महत्व के बारे में कहते हैं” इस महीने में हम जो चीज़ ईश्वर से चाहते हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण तक़वा होना चाहिये, लोक- परलोक का कल्याण, विजय, सफलता और समस्त कार्यों का समाधान तक़वा और परहेज़ारी में नीहित है।

ईरान के महान बुद्धिजीवी और विचारक उस्ताद शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी कहते हैं” तक़वे की वास्तविकता उस पवित्र शक्ति की प्राप्ति है जो इंसान की अंतरआत्मा को शक्तिशाली बनाती है और उद्दंडी नफ्स व मन को नतमस्तक और उसे अनुपालन करने वाला बनाती है। इसी प्रकार वह संयम व तक़वे को बुद्धि पर आधारित जीवन के लिए ज़रूरी समझते हैं। वह लिखते हैं” सामान्य अर्थ में तक़वा वह चीज़ है जो हर उस इंसान के जीवन में ज़रूरी है जो इंसान बनाना और तर्क-संगत जीवन व्यतीत करना चाहता है।

तक़वे का सबसे महत्वपूर्ण लाभ हर प्रकार की ग़लत इच्छा से मुक्ति है। इस प्रकार की मुक्ति दूसरी तार्किक व बौद्धिक आज़ादी की भूमिका है। मुत्तक़ी यानी तक़वा रखने वाला इंसान हर चीज़ को वास्तविकता की नज़र से देखता है। वह कठिनाइयों में घबराता नहीं है। विदित संसाधनों व संभावनाओं से अधिक वह महान ईश्वर की असीम कृपा व मदद पर भरोसा करता है। जो इंसान तक़वा करता है उसके लिए महान ईश्वर आसमान से कृपा का द्वार खोल देता है और मार्गदर्शन को स्वीकार करने की भूमि प्रशस्त हो जाती है। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि अगर तक़वा करोगे तो हम तुम्हें सत्य- असत्य को पहचानने की शक्ति प्रदान करेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम के एक साथी ने उनसे पूछा कि तक़वा क्या है? तो आपने फ़रमाया क्या तुम कभी कांटों से भरे रास्ते में चले हो? उसने कहा हां। मैं कांटों से भरे रास्ते में चला हूं। तब पैग़म्बरे इस्लाम ने उससे कहा किस प्रकार चले हो? इस पर उसने कहा जहां भी कांटा था वहां क़दम नहीं रखा और वहां से नहीं चला। उस वक्त पैग़म्बरे इस्लाम ने उस सहाबी से कहा जान लो कि जीवन में बहुत कांटे हैं अगर वहां से नहीं गये जहां जाने से ईश्वर ने मना किया है तो यही तक़वा है।

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से दुआ है कि इस पवित्र महीने में हम सबको वह तक़वे के आभूषण से सुसज्जित होने का सामर्थ्य प्रदान करे।


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