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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 18

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 18

शबे क़द्र, वह रात है जिसमें लाखों आशिक़ लरज़ते दिलों और आंसू से डूबी हुई आंखों से हाथों को दुआ के लिए उठाते हैं ताकि अनन्य ईश्वर उनके पापों को माफ़ कर दे और उन पर कृपा दृष्टि करे।

इन रातों को बंदा ईश्वर के समक्ष उपस्थित होता है और उससे अपने दिल की बातें बयान करता है। शबे क़द्र वह रात है जिसमें सारे दरवाज़े खुल जाते हैं, सारी समस्याएं हल हो जाती हैं, भूल भटके लोग ईश्वरीय मार्ग प्राप्त कर लेते हैं, भाग्य दोबारा लिखा जाता है, भविष्य का निर्धारण होता है और इंसान के एक साल के भविष्य का निर्धारण और उस पर हस्ताक्षर होता है, इस रात सभी लोग अल्लाह के मेहमान होते हैं।

शबे क़द्र को गुप्त रखने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मुसलमान, पवित्र रमज़ान का अंतिम दशक, ईश्वर की उपासना, दुआ मांगने तथा पवित्र क़ुरआन की तिलावत करने में व्यतीत करे। यदि शबे क़द्र का पता चल जाए तो बहुत से लोग उसकी रात में उपासना करना पसंद करेंगे और दूसरी रातों में उपासनाओं और इबादतों की बरकतों से दूर रहेंगे। चूंकि शबे क़द्र गुप्त और ग़ैर निर्धिरित है इसीलिए मोमिनों को उन सभी रातों को जिनमें शबे क़द्र की संभावना हो, ईश्वरीय गुणगान और पापों के प्रायश्चित में व्यतीत करना चाहिए और अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। इतिहास में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम पवित्र रमज़ान के अंतिम दशक में मस्जिद में एतेकाफ़ करते थे। वह एतेकाफ़ के पुण्य को दो हज और दो उमरह के बराबर बताते हैं। जैसे ही पवित्र रमज़ान के महीने के अंतिम दश्क आरंभ होते थे, पैग़म्बरे इस्लाम अपना बिस्तर हटा देते थे और स्वयं को उपासना के लिए पूरी तरह तैयार करते थे और अपने लिए बनाए गये विशेष साए के भीतर जाकर उपासना करते थे।

 

रिवायत में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम ने शाबान के महीने के आख़िरी शुक्रवार को रमज़ान के महत्व पर बल देते हुए अपने एक संबोधन में जिसे ख़ुतबए शाबानिया कहा जाता है, कहा कि हे लोगों! बरकत, दया, कृपा और प्रायश्चित का ईश्वरीय महीना आ गया है। यह ऐसा महीना है जो ईश्वर के निकट समस्त महीनों से श्रेष्ठ है। इसके दिन बेहतरीन दिन और इसकी रातें बेहतरीन रातें और उसके क्षण बेहतरीन क्षण हैं। यह वह महीना है जिसमें तुम्हें ईश्वरीय मेहमानी के लिए आमंत्रित किया गया है, ईश्वरीय सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान की गयी है, तुम्हारी सांसें ईश्वरीय गुणगान व तसबीह हैं, इसमें तुम्हारा सोना उपासना और तुम्हारे कर्म स्वीकार और तुम्हारी दुआयें कबूल हैं। इस महीने की भूख- प्यास से प्रलय के दिन की भूख- प्यास को याद करो, गरीबों, निर्धनों और वंचितों को दान दो, अपने से बड़ों का सम्मान करो और छोटों पर दया करो और सगे-संबंधियों के साथ भलाई करो। अपने पापों से प्रायश्चित करो, नमाज़ के समय अपने हाथों को दुआ के लिए उठाओ कि वह बेहतरीन क्षण है और ईश्वर अपने बंदों को दयादृष्टि से देखता है।

यहां पर यह बताना आवश्यक है कि उस महीने में जिसमें निश्चित रूप से दुआओं के स्वीकार करने की गैरेंटी दी गयी है, दुआओं के क़बूल होने और स्वीकार होने की एक शर्त है कि दुआ मांगने वाला का दिल पाक और पापों से दूर हो। इसीलिए अपने दिनों को हर प्रकार के पापों और प्रदूषणों से दूर रखना चाहिए और अपने दिल पर लगे ज़ंग को साफ़ करना चाहिए और उसके बाद ही रमज़ान में ईश्वर का मेहमान बनना चाहिए और उससे अपने पापों की क्षमा मांगनी चाहिए।

शबे क़द्र में सभी लोग ईश्वर के मेहमान होते हैं, यह वह रात है जिसमें आसमान, ज़मीन से सबसे निकट हो जाता है, कितना अच्छा है कि इन रातों में हमारे दिल पाक और पवित्र हों ताकि हम शैतानी बंधनों से ख़ुद को आज़ाद करें। शबे क़द्र वह रात है जिसमें मुसलमान रात्रिजागरण करके इस रात के महत्व को समझता है और इस अवसर से भरपूर लाभ उठाता है।

 

ईश्वर दयालु और कृपालु है उसकी दया और कृपा असीम है और उससे किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती। ईश्वर ने मुसलमानों पर एहसान किया और शबे क़द्र का तोहफ़ा जिसमें उसके पाप माफ़ कर दिए जाते हैं। सलाम हो उस रात पर जिसे महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने एक हज़ार महीनों से बेहतर बताया है। सलाम हो उस रात पर जिसका हर क्षण ईश्वरीय दया व कृपा से ओत-प्रोत है और सलाम हो उस रात पर कि पवित्र कुरआन की वास्तविकता इस रात में पैग़म्बरे इस्लाम के हृदय पर नाज़िल हुई। यह बहुत ही मूल्यवान समय है।

सूरए क़द्र पवित्र क़ुरआन का 97वां सूरा है और पवित्र क़ुरआन की व्याख्या करने वालों ने क़द्र के दो अर्थ बयान किए हैं। कुछ व्याख्याकारों ने क़द्र को प्रतिष्ठा, प्रतिभा और वैभवता के अर्थ में बयान किया है जिसके आधार पर शबे क़द्र प्रतिष्ठा, सज्जनता और विशेष वैभता से संपन्न है इसीलिए इस रात को सज्जनता की रात भी कहा गया है।

कुछ अन्य व्याख्याकारों ने इस रात की विशेषता के बारे में आने वाली रिवायतों को आधार बनाते हुए इसका अर्थ भाग्य और ईश्वरीय युक्ति बयान किया है जिसके आधार पर लोगों के भाग्य और उनके भविष्य का निर्धारण इस रात में किया जाता है। इंसान दुआओं द्वरा पवित्र ईश्वर से अपने भविष्य को सुधार और संवार सकता है।

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम शबे क़द्र के महत्व व स्थान के बारे में फरमाते हैं” शबे क़द्र रमज़ान महीने का दिल है।“ इस आधार पर अगर कोई रमज़ान के पवित्र महीने से अच्छी तरह लाभ उठाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह शबे क़द्र से भरपूर लाभ उठाये। इस रात में महान ईश्वर की उपासना करने, पवित्र कुरआन की तिलावत और प्रार्थना करने पर बहुत बल दिया गया है और ये वे चीज़ें हैं जो ईश्वरीय ज्ञान व प्रेम को स्वीकार करने के लिए दिल का विशुद्धीकरण करती हैं। चिंतन- मनन करने और निर्णय लेने के लिए शबे क़द्रे बहुत ही महत्वपूर्ण व मूल्यवान अवसर है। क्योंकि शबे क़द्र भविष्य निर्धारित करने की रात है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हर इंसान अपने लिए अच्छा से अच्छा भविष्य चाहता है परंतु इसके लिए सोच- विचार और चिंतन- मनन की आवश्यकता है कि क्या चीज़ अच्छा भविष्य हो सकती है? इस रात में क़ुरआन नाज़िल हुआ है, इस रात में गुट -2 में फरिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं, वे मोमिनों की सभाओं को देखते हैं, उन्हें सलाम करते हैं और सुबह तक उनकी दुआओं के स्वीकार होने के लिए आमीन कहते हैं। हे पालनहार हम शबे क़द्र में तेरी क्षमा की आशा के साथ तेरी कृपा के आसमान की ओर देखते हैं। आज रात में हम सुबह तक जाग रहे हैं। हमारे दिल में जो तेरे प्रेम का पौधा है उसकी सिंचाई हम प्रायश्चित के आंसूओं से कर रहे हैं और अपनी आत्मा का शुद्धीकरण तेरी याद व कृपा से कर रहे हैं। हे मेरे पालनहार अपनी असीमित कृपा व दया से मेरे पापों को माफ कर दे और मुझे इस रात में जागने का सामर्थ्य प्रदान कर।

 

19 रमज़ान को सुबह की नमाज़ की हालत में हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर हमला किया गया जिसके तीन दिनों के बाद वे शहीद हो गए। 19 रमज़ान की सुबह हज़रत अली, फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिदे कूफ़ा के लिए निकले।  जब वे मस्जिद पहुंचे तो उन्होंने सुबह की अज़ान दी।  अज़ान देने के बाद वे दुआएं पढ़ने में व्यस्त हो गए।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम जब सुबह की नमाज़ के लिए आते थे तो सामान्यतः उन लोगों को उठाते थे जो मस्जिद में सोए होते थे।  उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया।  उन्होंने सोए हुए लोगों को पुकराते हुए कहा कि नमाज़ के लिए उठो।  मस्जिदे कूफ़ा के एक कोने में इब्ने मुल्जिम नामक एक व्यक्ति लेटा हुआ था जो सोने का दिखावा कर रहा था हालांकि वह जाग रहा था।  इमाम अली ने उसको संबोधित करते हुए कहा कि उठो नमाज़ पढ़ो क्योंकि इस समय जो सोता है ईश्वर उसपर क्रोधित होता है। 

इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम मेहराब की तरफ़ गए और उन्होंने नमाज़ पढ़नी शुरू की।  इब्ने मुल्जिम, मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि किसी दूसरे इरादे से आया था।  उसने जब देखा कि हज़रत अली ने नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी है तो वह अपनी जगह से उठा और उनकी तरफ़ आया।  इमाम अली जब सजदे से अपना सिर उठा रहे थे उसी समय अपने काल का अत्यंत दुष्ट व्यक्ति इब्ने मुल्जिम मुरादी, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के निकट आया।  उसने ज़हर में बुझी हुई तलवार से हज़रत अली के सिर पर वार किया।

यह ऐसा वार था जो सिर से माथे तक जा पहुंचा।  यह वह वार था जिसने लोगों को हज़रत अली जैसे महान व्यक्ति से वंचित कर दिया और मानवता को दुख के अथाह सारग में डिबो दिया।  सिर पर तलवार के वार से अली ख़ून मे लथपथ हो गए।  जैसे ही हज़रत अली के सिर पर ज़हर से बुझी तलवार से वार किया गया हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने आकाश की ओर देखते हुए कहा कि है काबे के रब की सौगंध, मैं सफल हो गया। यह वार इतना तेज़ था कि तलवार हज़रत अली के सिर में घुस गई और उसका ज़हर उनके पूरे शरीर में पहुंच गया।  मस्जिदे कूफ़ा में हंगामा मच गया। इस प्रकार तीन दिन के बाद एक महान हस्ती हमारे बीच से उठ गई।


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