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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 17

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 17

इस्लाम धर्म में एकेश्वरवाद की विचारधारा और आडियालाजी हमको यह सिखाती है कि जीवन में हमेशा उच्च ईश्वरीय लक्ष्य रखना चाहिए और हर प्रकार के छोटे विचारों और छोटी सोच से दूर रहना चाहिए।

यह बहुत ही महत्वपूर्ण और निर्णायक मापदंड है जिसे जीवन के समस्त क्षेत्रों में सफलता के लिए अपनाना चाहिए विशेषकर जब ईश्वरीय उपासना की बात हो। पवित्र क़ुरआन के सूरए इन्शेक़ाक़ की 6 से 8 तक की आयत में आया है कि हे इन्सान तू अपने ईश्वर की ओर जाने का प्रयास कर रहा है तो एक दिन उसका सामना करेगा, फिर जिसको कर्मपत्र दाहिने हाथ में दिया जाएगा, उसका हिसाब आसान होगा।

निसंदेह उच्च लक्ष्य के चयन के लिए मज़बूत और उच्च इरादे की आवश्यकता होती है जो हर इन्सान में एक दूसरे की तुलना में समान और बराबर नहीं होती और हर इन्सान में इरादा और उसके साहस में अंतर पाया जाता है। कुछ लोग अल्लाह की इबादत के रास्ते में केवल विदित कर्मों को ही पर्याप्त समझते हैं और उसी पर ख़ुश रहते हैं किन्तु कुछ लोग दिल की गहराईयों से ईश्वर की इबादत करते हैं ताकि उपासन के उच्च स्थान और ईश्वर के निकटवर्ती स्थान को हासिल कर सकें, इसी आधार पर रोज़ेदारों के दर्जों को भी विभाजित किया जा सकता है।

एक गुट वही छोटी सोच रखने वाला होता है और उसका कोई ख़ास इरादा और मक़सद नहीं होता, अर्थात खाने पीने से रुकता है और विदित रूप से पापों से दूर रहता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस गुट के बारे में फ़रमाते हैं कि कुछ ऐसे रोज़ेदार हैं जो अपने रोज़े से केवल भूख और प्यास के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं कर पाते।

निसंदेह इस्लाम धर्म में इबादत और उपासना को केवल विदित उपासना तक ही सीमित नहीं किया गया है बल्कि हर बंदे को अपनी इबादत में हमेशा उंचा लक्ष्य रखना चाहिए। पवित्र क़ुरआन के सूरए ज़ारियात की आयत संख्या 56 में ईश्वर कहता है कि मैंने इन्सान और जिन्न को केवल अपनी इबादत के लिए ही पैदा किया है। इसी प्रकार सूरए मुल्क की आयत संख्या 2 में ईश्वर कहता है कि उसने मौत और जीवन को इस लिए पैदा किया है ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में अच्छे कर्मों के लेहाज़ से सबसे बेहतर कौन है और वह प्रतिष्ठा वाला और क्षमा करने वाला भी है।

 

एक महापुरुष के हवाले से बयान किया गया है कि ईश्वर ने यह नहीं कहा कि तुममें से कौन ज़्यादा कर्म करता है बल्कि कहा गया है कि ताकि तुम्हारी गुणवत्ता की दृष्टि से परीक्षा ले कि कौन सबसे सुन्दर कर्म करता है। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि उपासना में गुणवत्ता के लिए ईश्वरीय उपासना के अर्थों को गहराई से समझने की ज़रूरत है जिस पर सामान्य रूप से सतही नज़र रखने वाले कुछ विशेष ध्यान नहीं देते। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस प्रकार के दृष्टिकोण को रद्द करते हुए फ़रमाते हैं कि वह उपासना जो सही पहचान के साथ न हो उसमें कोई भलाई नहीं है।

यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इस बात से कहीं कोई ग़लत धारणा पैदा न हो जाए कि उपासना का लक्ष्य, केवल उसकी गुणवत्ता ही है, इसीलिए धार्मिक कार्यों को अंजाम न दें और सारे धार्मिक कार्यों को छोड़ दें बल्कि इसका लक्ष्य यह है कि अपनी इबादत की गुणवत्ता को जितना चाहे मज़बूत करें और जितना चाहें बढ़ाने का प्रयास करें।

इस आधार पर रोज़ेदारों का दूसरा गुट वह है जो अपने विदित कर्मों को पर्याप्त नहीं समझते और वह इबादत को अंजाम देने में उन प्रतिबद्धताओं पर अमल करने का प्रयास करे जो उसने रोज़े से सीखा है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि अपनी भूख और प्यास से प्रलय के दिन थका देने वाली भूख और प्यास को याद रखो, अपने निर्धनों और ग़रीबों को सदक़ा और दान दो और अपने बड़ों का सम्मान करो और अपने छोटों पर कृपा और दया करो और अपने निकट संबंधियों से मेल मिलाप करो, अपनी ज़बानों को हर प्रकार के पापों से दूर रखो और जिस चीज़ को देखने को ईश्वर ने मना किया है उससे अपनी आंखों को बंद रखो और जिस चीज़ को सुनने को ईश्वर ने वर्जित नहीं किया है, उससे दूर रहो, अनाथों पर कृपा और दया करो ताकि तुम्हारे अनाथों पर कृपा दृष्टि हो, ईश्वर से अपने पापों की क्षमा मांगो और नमाज़ के समय जब दुआ के लिए हाथ उठाओ कि यही सबसे बेहतरीन समय है जब ईश्वर अपने बंदों पर कृपा दृष्टि करता है और उनकी दुआओं को स्वीकार करता है। हे लोग तुम्हारी आत्मा और जान, तुम्हारे कर्म और क्रियाकलाप में फंसी हुई है, ईश्वर से क्षमा याचना द्वारा उसे स्वतंत्र करो, तुम्हारे कंधों पर पाप का बोझ बढ़ रहा है और ज़्यादा लंबे सज्दे करके उसके वज़्न को कम करो।

 

रोज़ा रखने का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण दिल का रोज़ा है। अर्थात इससे पहले जो कुछ बयान किया गया है उसके अलावा इन्सान का दिल ईश्वर पर ईमान से भरपूर होना चाहिए और ईश्वर की याद से ही उसके मन को शांति मिलनी चाहिए। वह दिल जो हर प्रकार के पापों और बुराईयों, सामाजिक व व्यक्तिगत ख़राबियों से पवित्र हो, वह दिल जो पवित्रता और सफ़ाईयों, भलाईयों और नैतिकता और अच्छाईयों का केन्द्र हो, इस प्रकार के दिलों को अल्लाह पसंद करता है और उसको अपनी विशेष कृपा दृष्टि का पात्र बनाता है।

इस आधार पर जो पवित्र और पाक दिल के साथ रोज़ा रखे और रोज़े की विदित और गुप्त बातों पर ध्यान दे, वह न केवल अपने शरीर और शरीर के अंगों को हर प्रकार के पापों से दूर रखता है बल्कि पाप की कल्पना भी उसके मन में नहीं आती और पवित्र रमज़ान के स्वर्णिम अवसरों से लाभ उठाते हुए ईश्वरीय भय के साथ अधिक से अधिक ईश्वर से निकट हों, शायद यही वजह है कि महापुरुषों ने इस प्रकार के रोज़े को विशेष लोगों के रोज़े का नाम दिया है।

 

जी हां दोस्तो अब हम आपको रोज़े के सार्थक और प्रशिक्षण संबंधी आयामों के बारे में बताएंगे। रोज़े का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव, उपासना की संस्कृति पैदा करना है, अर्थात रोज़ेदार एक महीने के दौरान ईश्वरीय आदेशों पर अमल करते हुए और उसके द्वारा मना की गयी चीज़ों से दूर रहकर उपासना की संस्कृति को उजागर करते हैं। हदीसे क़ुदसी में ईश्वर फ़रमाता है कि हे मेरे बंदे मेरा अनुसरण करो ताकि मैं तुझे अपने जैसा बना दूं। मैं जो कहता हूं वह हो जाती है, तो भी मेरी तरह जो कुछ कहेगा, वैसा ही हो जाएगा।

निसंदेह बंदे को इस प्रकार का विशेष स्थान प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि उसमें विशेष प्रकार के गुण और विशेषताएं पायी जाएं। पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं कि ईश्वर का वास्तविक बंदा वही है जो ईश्वर के अदेशों का अनुसरण करे, उसके पास ईश्वर से प्रेम भाव प्रकट करने के अलावा कोई आनंद न हो, अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यकता मुक्त ईश्वर की ओर हाथ बढ़ाए, ईश्वर से अपना दर्दे दिल बयान करे, ईश्वर पर भी भरोसा करे और उस पर विश्वास करे।

पवित्र रमज़ान का महीना, ईश्वर की उपासना के अभ्यास का महीना है और यह महीना इस विशेषता को पैदा करने और उसे उजागर करने में प्रभावी भूमिका अदा कर सकता है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जो भी ईश्वर की इबादत का हक़ अदा करता है, तो ईश्वर उसकी कामना से अधिक उसे प्रदान करता है।

इमामत और नबूअत के केन्द्र में प्रशिक्षण पाने वाली पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा फ़रमाती हैं कि जो व्यक्ति अपनी निष्ठापूर्ण उपासना ईश्वर की ओर भेजता है तो कृपालु और दयालु पालनकार बेहतरीन और अच्छी युक्ति और उसकी ओर भेजता है।

 

पवित्र रमज़ान के प्रशिक्षण संबंध आयामों में से एक धैर्य और इरादे को मज़बूत करना है। जहां कहीं भी इन दोनों चीज़ों का असर होगा वहां पर निश्चित रूप से परिणमा अशाजनक और प्रकाशमयी होंगे। पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं कि जिस प्रकार से संकल्प और इरादा रखने वाले ईश्वरीय दूतों ने धैर्य किया तुम भी धैर्य और संयम से काम लो।

वास्तव में रोज़ा संकल्प और विनम्रता का अभ्यास है क्योंकि रोज़ेदार अपने इरादे से यह फ़ैसला करता है कि रोज़ा रखने के दौरान अपनी सारी आंतरिक इच्छाओं से मुक़ाबला करेगा और उन पर संयम से काम लेगा।


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