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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 16

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 16

दोस्तो आज के कार्यक्रम में हम आपको यह बतायेंगे कि रोज़ा एक ऐसी उपासना है जो इस्लाम से पहले प्राचीन समय में भी थी।

इस संबंध में महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरए बक़रा की आयत नंबर 183 में कहता है" हे ईमान लाने वालो तुम पर रोज़ा अनिवार्य किया गया है जिस तरह तुम से पहले वालों पर अनिवार्य किया गया था" पवित्र क़ुरआन की इस आयत से स्पष्ट है कि रोज़ा इससे पहले दूसरे ईश्वरीय धर्मों में भी था। इंजील और तौरात के अध्ययन से इस बात का पता चलता है कि रोज़ा ईसाईयों और यहूदियों के अलावा दूसरी जातियों व क़ौमों में भी प्रचलित था। तौरात में आया है कि हज़रत मूसा ने 40 दिनों तक रोज़ा रखा था। इसके अलावा तौरात में हम पढ़ते हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम कहते थे कि जब मैं पहाड़ पर आया ताकि उस वचन को लूं जो ईश्वर ने तुमसे वादा किया है तो वह मुझे दिया गया और चालिस दिन -रात मैं पहाड़ पर रहा, न रोटी खाया न पानी पिया और चालिस दिनों तक रोज़ा रखा। इसी तरह जब यहूदी जाति महान ईश्वर के समक्ष अधिक विनम्रता प्रकट करना चाहती थी तो रोज़ा रखती थी ताकि वह अपने पापों को स्वीकार करे और तौबा व प्रायश्चित करके महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करे। साल में एक बार यहूदियों के मध्य महाव्रत या विशेष रोज़े का चलन था जबकि साल के दूसरे दिनों में छोटा रोज़ा भी होता था। यहूदियों के अलावा ईसाईयों में भी रोज़े का चलन था। जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आत्मा की शक्ति से मरूस्थल में गये और इबलीस ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो उन्होंने चालीस दिन- रात रोज़ा रखा। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के हवारी भी यानी उनके विशेष अनुयाई उनके बाद रोज़ा रखते थे।

यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि यद्यपि इस्लाम से पहले वाली जातियों में भी रोज़ा था परंतु समय और स्थान की दृष्टि से उसकी शर्तें भिन्न थीं। मिसाल के तौर पर इस्लाम से पहले के ईश्वरीय धर्मों के मानने वाले जब रोज़ा रखते थे तो वे मांस खाने और दूध पीने से भी परहेज़ करते थे। पवित्र कुरआन में भी हज़रत ज़करिया और हज़रत मरियम के रोज़ा रखने की बात का उल्लेख है। यही नहीं ग़ैर ईश्वरीय धर्मों के मानने वालों के मध्य भी रोज़ा प्रचलित था।

अब सवाल यह पैदा होता है कि रोज़ा और रोज़ा रखने के रहस्य क्या हैं? इसका तर्क क्या है? पवित्र क़ुरआन के सूरए बक़रा की 183वीं आयत में महान ईश्वर ने कहा है कि हे ईमान लाने वालो तुम पर रोज़ा अनिवार्य किया गया है जिस तरह तुम से पहले वालों पर अनिवार्य किया गया था ताकि तुम मुत्तक़ी अर्थात सदाचारी बन सको। यद्यपि रोज़े के बहुत अधिक अध्यात्मिक और ग़ैर अध्यात्मिक लाभ हैं और उनका वर्णन भी इस्लामी रिवायतों में हुआ है परंतु पवित्र कुरआन ने सबसे अधिक पवित्रता और सदाचारिता पर बल दिया है। उसकी वजह यह है कि जब इंसान में महान ईश्वर से भय उत्पन्न होगा तो दूसरी नैतिक व मानवीय विशेषताएं स्वयं इंसान में पैदा हो जायेंगी।

तक़वा अर्थात महान ईश्वर से भय वह चीज़ है जिसके अनगिनत लाभ हैं और पवित्र कुरआन में बारमबार उसका वर्णन हुआ है। सबसे पहले इंसान के मस्तिष्क में यह सवाल पैदा होता है कि तक़वे का अर्थ क्या है? इसके जवाब में कहा जाता है कि तक़वा वह आंतरिक शक्ति है जो इंसान को बुराइयों, पापों और ग़लत इच्छाओं व कार्यों से रोकती है। इसी प्रकार यह आंतरिक शक्ति इंसान को शैतानी उकसावे से मुकाबला करने की क्षमता प्रदान करती है। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते थे" जिसे तक़वा धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाये उसे लोक- परलोक की भलाई प्रदान कर दी गयी है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम भी फ़रमाते हैं" बेशक तक़वा सच्चाई और प्रलय के दिन की पूंजी की कुंजी है और हर प्रकार की दासता से आज़ादी और बर्बादी से बचने का कारण है"

 

जिन लोगों को महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है तक़वा ही वह चीज़ है जिसके माध्यम से वे लोग वहां पहुंचे हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई इंसान तक़वे के बिना महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त कर ले। तक़वा ही सज्जन व भले इंसान का आभूषण है। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन में कहता है"जान लो कि जो लोग तक़वा करते हैं यानी ईश्वर से डरते हैं उनके दिल में किसी प्रकार का भय नहीं है। लोक- परलोक में उनके लिए उनके शुभ सूचना है और ईश्वर के वादे में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं है और यह बहुत बड़ी सफ़लता है।

                                   संगीत

दोस्तो अब हम आपको यह बतायेंगे कि इस्लाम धर्म में रोज़े की कुछ विशेषताएं हैं। रिवायत में है कि रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका प्रतिदान दूंगा। रोचक बात यह है कि आमतौर पर महान ईश्वर ने किसी भी उपासना के लिए इस प्रकार नहीं कहा है। इस संबंध में दो प्रकार की बातें कही जाती हैं। प्रथम यह कि समस्त उपासनाओं विशेषकर नमाज़, नमाज़े जमाअत, जुमे की नमाज़ और हज जैसी उपासना ऐसी होती है जब उसे अंजाम दिया जाता है तब दूसरे भी उससे अवगत हो जाते हैं और दिखावे की संभावना उसमें अधिक होती है परंतु रोज़ा एक ऐसी उपासना है  जिसे अंजाम भी दिया जा सकता है और उससे कोई अवगत भी न हो। इस दृष्टि से दूसरी उपासनाओं की अपेक्षा उसमें दिखावे की संभावना कम होती है। दूसरे शब्दों में दूसरी उपासनाओं की अपेक्षा रोज़े को अधिक निष्ठा के साथ अंजाम दिया जा सकता है और महान ईश्वर केवल उस कार्य व उपासना को स्वीकार करता है जिसे निष्ठा के साथ अंजाम दिया गया हो।

रोज़े के संबंध में दूसरी बात यह कही जाती है कि रोज़े की भांति कोई दूसरी उपासना नहीं है जो इंसान को बंदगी के उच्च शिखर पर पहुंचा दे। जो इंसान रोज़ा रखता है वह किसी प्रकार की चूं- चेरा के बिना महान ईश्वर ने जिन चीज़ों से मना किया है उन्हें अंजाम नहीं देता है और इसी प्रकार जिन चीज़ों को अंजाम देने के लिए कहा है उसे अंजाम देता है। इसीलिए कहा जाता है कि रमज़ान का पवित्र महीना महान ईश्वर की बंदगी के अभ्यास का महीना है। शायद इसी कारण महान ईश्वर ने कहा है कि रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका प्रतिदान दूंगा, मेरी बंदगी करो कि यह सीधा रास्ता है।

पैग़म्बरे इस्लाम रोज़ेदार के बारे में फ़रमाते हैं" जो गिरोह रमज़ान की गरिमा व महिमा की अनदेखी करके ख़ाना खायेगा उसके पास से कोई रोज़ेदार नहीं गुज़रेगा मगर यह कि उसके शरीर के समस्त अंग ईश्वर का गुणगान करेंगे और फरिश्ते उस पर दुरूद व सलाम भेजेंगे"

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" रोज़ेदार की नींद उपासना है, उसका मौन ईश्वर का गुणगान है और उसके अमल और दुआ क़बूल हैं" इस्लाम के अनुसार इंसान के हर अमल का बदला दिया जायेगा। इंसान छोटी से छोटी अच्छाई करेगा तो उसे उसके अमल का प्रतिदान दिया जायेगा। इसी प्रकार जो इंसान छोटा से छोटा बुरा व ग़लत कार्य करेगा उसे उसके बुरे कर्म का दंड दिया जायेगा। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर इतना दयावान है कि एक नेक काम के बदले कई गुना पुण्य प्रदान करेगा यही नहीं उसने कुरआन में यह भी कहा है कि कुछ लोगों को इतना अधिक पुण्य प्रदान करेगा कि उनका हिसाब- किताब भी नहीं होगा और वे हिसाब- किताब के बिना स्वर्ग में दाखिल होंगे।

इस्लामी रिवायत में है कि जो भी ईश्वरीय कारणों से रोज़ा रखे अगर उसे ज़मीन में मौजूद समस्त खदानों के बराबर सोना दे दिया जाये तब भी उसे उसके काम का पूरा बदला नहीं दिया गया है और केवल प्रलय के दिन उसे उसके कार्य का पूरा बदला मिलेगा।

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम रोज़ेदार को मिलने वाले पुण्य के बारे में कहते हैं" जो व्यक्ति ईश्वरीय प्रतिदान प्राप्त करने के लिए एक दिन रोज़ा रखता है तो ईश्वर उसके उसी एक रोज़े के बदले उसे स्वर्ग में दाखिल करेगा।"

यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि जब इंसान कोई अच्छा कार्य करता है तो महान ईश्वर उसका प्रतिदान देगा और यह प्रतिदान इंसान के प्रोत्साहन का कारण बनता है परंतु जो महान, रहस्यवादी और महान ईश्वर के विशेष और पहुंचे हुए बंदे होते हैं वे प्रतिदान की लालच या उसके दंड के भय से उपासना नहीं करते हैं। नेक कार्म और उपासना करने से उनका मूल उद्देश्य महान ईश्वर की प्रसन्नता और उसका सामाप्तिय प्राप्त करना होता है और उनका मूल उद्देश्य महान ईश्वर की प्रसन्नता करनी होती है और महान ईश्वर की प्रसन्नता से कोई भी चीज़ बड़ी नहीं है और यह वह चीज़ है जिसे सबसे बड़ी सफलता का नाम दिया गया है और किसी भी चीज़ की तुलना उससे नहीं की जा सकती और यह सबसे बड़ी सफलता है।


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