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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 14

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 14

क़ुरआने मजीद के सूरए साफ़्फ़ात की आयत क्रमांक 109 से लेकर 112 तक में कहा गया हैः "सलाम हो इब्राहीम पर, हम इस प्रकार भलाई करने वालों को पारितोषिक प्रदान करते हैं।

निश्चित रूप से इब्राहीम हमारे मोमिन बंदे थे। और हमने उन्हें इस्हाक़ की शुभ सूचना दी जो भले लोगों में से एक पैग़म्बर थे।" क़ुरआने मजीद की कुछ आयतें उन अनुकंपाओं की तरफ़ इशारा करती हैं जो दयालु व कृपालु ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान की हैं। ईश्वरीय नेमतें या अनुकंपाएं हर पल इंसानों पर बरसती रहती हैं और क़ुरआने मजीद के शब्दों में उनकी संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें गिनना संभव ही नहीं है। नेमतों का असीम होना कभी कभी इंसानों को निश्चेतना में डाल देता है।

इन्हीं अनुकंपाओं में से एक भली संतान है जिसकी इन आयतों में ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को शुभ सूचना दी है और इसका कारण हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की भलाई और पक्के ईमान को बताया है। ये आयतें इस बात का उल्लेख करती हैं कि यद्यपि हज़रत इब्राहीम, अपने बेटे हज़रत इस्माईल को ज़िबह करने की परीक्षा में कामयाब रहे लेकिन यह कृपा हज़रत इब्राहीम से विशेष नहीं है बल्कि जो भी अपनी जान और अपने माल में से ईश्वर की राह में जितना भी ख़र्च करेगा, उतना ही वह ईश्वरीय पारितोषिक का पात्र बनेगा। जो लोग ईमान वाले हों और ईश्वर की बंदगी के मार्ग में उसके आदेशों का आंख बंद करके पूरी निष्ठा से पालन करें, वे भी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तरह ईश्वर की कृपा व दया का पात्र बनेंगे। यह परंपरा इतिहास के आरंभ से रही है और अब भी जारी है। क़ुरआने मजीद ईश्वरीय दया व उसके सलाम का पात्र बनना, वह इनाम है जो हम भलाई करने वालों को प्रदान करते हैं।

संगीत

ईश्वर, उस जीवन साथी व संतान को, जो इंसान के लिए शांति, संतोष, प्रसन्नता व अच्छे नाम का कारण बने, बड़ी नेमत या अनुकंपा बताता है। इसी लिए इस अनुकंपा का पात्र बनने वाले को ईश्वर का कृतज्ञ रहना चाहिए। सूरए नह्ल की आयत नंबर 72 में कहा गया हैः और ईश्वर ने तुम्हीं में से तुम्हारा जोड़ा बनाया है और उसी जोड़े से संतान तथा उनकी संतान बनाई है और तुम्हें पवित्र वस्तुओं में से आजीविका प्रदान की है तो क्या वे (फिर भी) ग़लत बात पर ही ईमान रखते हैं और ईश्वरीय अनुकंपा का इन्कार करते हैं?

हर जीव, चाहे अनचाहे में अपने वंश व जाति को बढ़ाने की कोशिश करता है। अपनी जाति को बाक़ी रखना, यद्यपि अनेक जीवों में एक नियम व ईश्वरीय परंपरा के अंतर्गत होता है और सभी की प्रवृत्ति में प्राकृतिक आवश्यकता के रूप में रखा गया है लेकिन इंसानों में इसका एक अलग ही अर्थ है क्योंकि उनके पास इच्छा व चयन का अधिकार है। इस्लाम की नज़र में संतान पैदा करना, परिवार की मज़बूती व स्थिरता का कारण है और पवित्र व अच्छा वंश छोड़ना हर मुसलमान के लिए एक अच्छा व वांछित काम समझा जाता है। उचित नहीं है कि कोई भी मुसलमान अपनी इच्छा से निर्वंश रहे। क़ुरआने मजीद ने संतान के लिए "भली धरोहर" शब्द का प्रयोग किया है और इसी तरह धन व संतान को सांसारिक जीवन का अलंकार बताया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके पवित्र परिजनों के कथनों में संतान के लिए आंखों की ठंडक, आंखों का नूर, रहमत, नेमत, प्रलय का इनाम और ख़ुशी का कारण जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए हैं।

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वंश बढ़ाने के संबंध में क़ुरआने मजीद में एक बहुत अहम व मूल बिंदु यह है कि अच्छे व ईमान वाले लोगों की संख्या में वृद्धि होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में जो चीज़ अहम है वह अच्छे व भले लोगों की संख्या में वृद्धि है। संतान चाहने का महत्व इस लिए है कि इंसान का वंश जारी रहे न यह कि केवल हमारा नाम जीवित रहे। अगर हमने अच्छी संतान का प्रशिक्षण किया तो हमारे सद्कर्म समाप्त नहीं होते बल्कि मरने के बाद भी उनके अच्छे परिणाम हमें मिलते रहते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया हैः "जब भी कोई इंसान मरता है तो उसके कर्म भी रुक जाते हैं लेकिन तीन रास्ते हैं जिनके माध्यम से उसके कर्म जारी रहते हैं, ऐसा दान जो जारी रहे, ऐसा कर्म जिससे लोग लाभ उठाते रहें और अच्छी संतान जो उसके लिए दुआ करे।" हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, हालांकि वृद्ध हो गए थे लेकिन उन्हें संतान और इस ईश्वरीय अनुकंपा को हासिल करने का शौक़ था।

हज़रत इब्राहीम व उनकी पत्नी सारा बहुत मेहमान नवाज़ थे। सारा कोशिश करती थीं कि भले कर्मों विशेष कर मेहमान के सत्कार में हज़रत इब्राहीम का भरपूर साथ दें। एक दिन दोनों घर में थे कि अचानक कुछ सुंदर व शक्तिशाली जवान उनके पास पहुंचे और सलाम किया। हज़रत इब्राहीम ने सलाम का जवाब दिया और बड़ी तेज़ी से उनके लिए खाने पीने का कुछ सामान ले कर आए। फिर उन्होंने उनके लिए एक भेड़ काटी और उसे भून कर ले आए। हज़रत सारा ने  भी खाना तैयार करने में अपने पति की मदद की। दोनों ने बड़ी हंसी ख़ुशी मेज़बानी का दायित्व निभाया। लेकिन वे लोग साधारण मेहमान नहीं थे बल्कि फ़रिश्ते थे जो इंसान के रूप में वहां पहुंचे थे, इसी लिए उन्होंने खाना नहीं खाया।

उस काल में खाना न खाना, एक प्रकार का ख़तरा समझा जाता था और इसी लिए हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम भरपूर साहस के बावजूद चिंतित हो गए। फ़रिश्तों ने उनसे कहा कि घबराइये मत, हम आपको यह ख़ुशख़बरी देने आए हैं कि ईश्वर जल्द ही आपको इस्हाक़ नाम का एक पुत्र प्रदान करेगा और वह भी पैग़म्बर होगा। हज़रत सारा, जो वहीं मौजूद थीं, यह ख़ुशख़बरी सुन कर आश्चर्य से हंसने लगीं और उन्होंने कहाः हाय मेरा अभाग्य! क्या (अब) मेरे संतान होगी जब मैं बूढ़ी हो चुकी हूं और ये मेरे पति भी बूढ़े हैं। सच में यह तो बहुत ही विचित्र बात है। फ़रिश्तों ने कहाः क्या तुम्हें ईश्वर के काम पर आश्चर्य हो रहा है? ईश्वर अत्यंत दयालु है और उसने तुम लोगों के बारे में ऐसा ही चाहा है। कुछ ही समय बाद, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के घर में हज़रत इस्हाक़ की किलकारियां सुनाई देने लगीं। हज़र इब्राहीम ने ईश्वर का आभार प्रकट किया और कहाः समस्त प्रशंसा उस ईश्वर के लिए है जिसने बुढ़ापे में मुझे इस्माईल व इस्हाक़ जैसी संतान प्रदान की।

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इस्हाक़, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दूसरे बेटे थे जो हज़रत इस्माईल के बाद पैदा हुए थे। ईश्वर ने उन्हें पैग़म्बर बनाने का वादा किया था। एक ऐसा पैग़म्बर जो अपने समय के सबसे भले व सद्कर्मियों में से होगा और ईश्वर की विशेष कृपा का पात्र बनेगा। क़ुरआने मजीद की शुभ सूचना में हज़रत इब्राहीम को संतान प्रदान करने से भी अधिक अहम जो बात है वह, पैग़म्बरी के पद और ईश्वरीय संदेश वहि के माध्यम से समाज के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है जो ईश्वर ने इब्राहीम व उनकी संतान के बाद भी उनके वंश में बाक़ी रखी है और उन्हें इस अहम व भारी दायित्व के पालन के योग्य समझा है। अलबत्ता यह बड़ा व अहम दायित्व ईश्वर की बंदगी से शुरू हुआ और ईश्वर के सामने पूरी तरह नतमस्तक रहने से जारी रहा।

ईश्वर ने अन्य पैग़म्बरों की तरह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को भी सलाम भेजा और उनसे वादा किया कि इतिहास में उन्हें अच्छे नाम से याद किया जाता रहेगा। आज काबे के तवाफ़ या परिक्रमा से लेकर सई व रमिये जमरात तकहज के सभी संस्कार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की याद दिलाते हैं और इतिहास में उनका अच्छा नाम बाक़ी रहने के चिन्ह हैं। अब जब हम दुआ व प्रार्थना के महीने में हैं तो हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हज़रत इब्राहीम ने पालनहार पर अपने गहरे ईमान के चलते न सिर्फ़ अपने पूरे अस्तित्व बल्कि अपने प्राणप्रिय बेटे इस्माईल की जान को भी ईश्वर के मार्ग में न्योछावर करने के लिए पेश कर दिया। यही कारण था कि अपने बच्चों व वंश के बारे में उनकी दुआ ईश्वर ने स्वीकार की और हज़रत इस्माईल व इस्हाक़ व उनके बाद की पीढ़ियां अनेक ईश्वरीय अनुकंपाओं का पात्र बनीं। हमें भी हमेशा अपने, अपने बच्चों व वंश के भले होने के लिए दुआ करनी चाहिए।


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