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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 12

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 12

क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों के अनुसार इस संसार के संचालन में ऐसे अनेक तत्वों की भूमिका है जो जाने- पहचाने भौतिक तत्वों से इतर हैं।

क़ुरआन ने मनुष्य के रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई न देने वाले और महसूस न होने वाले इन तत्वों को ग़ैब अर्थात गुप्त या अदृश्य का नाम दिया है। इस ईश्वरीय किताब ने अनेक अवसरों पर ईमान वालों से कहा है कि वे ग़ैब पर ईमान रखें और ग़ैब की दुनिया से ईमान वालों के जीवन पर प्रभाव डालने वाली सहायताओं को अवश्य दृष्टिगत रखें। ग़ैब पर ईमान या आस्था का एक भाग, ईश्वर की गुप्त सहायताओं के बारे में है। पूरे इतिहास में ये ईश्वरीय सहायताएं यथासंभव बेहतरीन तरीक़ों से मनुष्यों को मिलती रहीं हैं और उन्हें तबाही से बचाती आई हैं।

क़ुरआने मजीद इस मामले में ईमान वालों को शुभ सूचना देता है और उन्हें निश्चिंत करने व उनके ईमान को मज़बूत करने के लिए अनेक अवसरों पर इन सहायताओं का उल्लेख भी करता है। जैसे कि सूरए आले इमरान की आयत नंबर 125 और 126 में कहा गया हैः क्यों नहीं, (आज भी) अगर तुम संयम रखो और ईश्वर से डरते रहो, और जब भी शत्रु तीव्रता के साथ क्रोध में तुम पर आक्रमण करेगा, तो तुम्हारा पालनहार अपने पांच हज़ार विशेष फ़रिश्तों द्वारा तुम्हारी सहायता करेगा। और ईश्वर ने (शत्रु के साथ युद्ध में फ़रिश्तों को) तुम्हें शुभसूचना देने के लिए उतारा ताकि तुम्हारे हृदय इससे शांत व संतुष्ट हो जाएं (और तुम जान लो कि) सहायता और विजय केवल प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी ईश्वर की ओर से ही है।

संसार के सभी धार्मिक व राजनैतिक मत, अपने मानने वालों की भावनाओं को मज़बूत बनाने और उनकी आशाओं को जगाए रखने के लिए एक उज्जवल भविष्य का चित्रण करते हैं और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम, नीतियां व रणनीतियां तैयार करके अपने लक्ष्यों व उमंगों को व्यवहारिक बनाने की कोशिश करते हैं। आसमानी धर्म भी न केवल यह कि इस नियम के अपवाद नहीं हैं बल्कि वे अन्य मतों से अधिक इस अहम विषय की प्राप्ति की कोशिश करते हैं। दूसरे शब्दों में जिस दिन से ईश्वरीय पैग़म्बरों ने अपना आंदोलन आरंभ किया, उसी दिन से सत्य व असत्य के मोर्चों के बीच एक कड़ा व अनवरत संघर्ष शुरू हो गया।

इस संघर्ष में एक तरफ़ पैग़म्बर और उनके सच्चे अनुयाइयों ने एकेश्वरवाद पर आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की तो दूसरी ओर अनेकेश्वरवादी और अत्याचारी शासनों ने सिर उठाया। इस निर्णायक टकराव में अगर आशाजनक भविष्य का अस्तित्व न होता तो संघर्ष की भावना कमज़ोर पड़ जाती, आशा, निराशा में बदल जाती और सत्य के मोर्चे के अनुयाई पराजित हो जाते। महान ईश्वर ने सत्य के मोर्चे के अनुयाइयों के समक्ष ख़तरनाक चुनौतियों व बड़े ख़तरों को रोकने के लिए अपनी गुप्त सहायताओं के माध्यम से और आशाजनक आयतें भेज कर हमेशा उनसे मदद का वादा किया है ताकि वे थोड़ी सी भी शंका के बिना एक उज्जवल भविष्य और आदर्श समाज के गठन के लिए संघर्ष जारी रखें और इस बात पर विश्वास रखें की कि अंतिम विजय सत्य के मोर्चे की ही होगी।

क़ुरआने मजीद में "गुप्त सहायता" शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन अनेक आयतों में ईश्वर की गुप्त सहायताओं की तरफ़ इशारा ज़रूर किया गया है। जैसे अदृश्य सेना भेजना, फ़रिश्तों के माध्यम से ईमान वालों की मदद करना, ईमान वालों के दिलों में शांति पैदा करना, दुश्मन की सेना को कम दिखना, पक्षियों का लश्कर भेजना इत्यादि। अलबत्ता क़ुरआने मजीद की आयतें इस बिंदु पर बल देती हैं कि ईश्वर की मदद तभी मिलेगी जब सत्य के मार्ग पर चलने वाले कठिनाइयों को सहन करेंगे, असत्य के मोर्चे के मुक़ाबले में कमज़ोरी नहीं दिखाएंगे और अपने लक्ष्यों पर कड़ाई से डट रहेंगे।

सूरए आले इमरान की आयत नंबर 125 और 126 में बद्र के युद्ध में फ़रिश्तों के माध्यम से इस्लाम के सैनिकों की मदद का उल्लेख किया गया है। इस युद्ध को क़ुरआने मजीद में विशेष अहमियत हासिल है और इसी लिए ईश्वर ने कई आयतों में इस युद्ध का उल्लेख किया है। बद्र का युद्ध, इस्लामी शासन के झंडे तले मुसलमानों का पहला युद्ध था। मुसलमानों के पास न तो ध्यान योग्य हथियार व घोड़े थे और न ही दुश्मन की तुलना में उनके पास ध्यान योग्य संभावनाएं थीं। उनके सिपाहियों की संख्या भी दुश्मन के मुक़ाबले में बहुत कम थी लेकिन ईश्वर की गुप्त सहायता की छाया में और फ़रिश्तों की मदद के चलते मुसलमानों ने दुश्मन को पराजित कर दिया। इस युद्ध में मुसलामनों ने अपनी आंखों से ईश्वर की सहायता देखी थी। ईश्वर अपनी इस मदद से संघर्षकर्ताओं को ख़ुश करता है और इस ख़ुशी के माध्यम से उनकी शक्ति में वृद्धि होती है और वे अधिक ताक़त के साथ जेहाद के लिए तैयार हो जाते हैं क्योंकि जेहाद के मैदान में शक्ति बहुत ज़रूरी है।

क़ुरआने मजीद की दृष्टि में ईश्वरीय सहायता हासिल करने के लिए चार शर्तें हैं। ईमान,  जेहाद व संघर्ष, निष्ठा और संयम व प्रतिरोध। जब भी ईमान वाले कोशिश व युक्ति के बाद, जो कि उनका दायित्व है, संघर्ष व निष्ठा के साथ सत्य के मार्ग पर क़दम बढ़ाएं और इस राह पर प्रतिरोध से काम लें तो उन्हें ईश्वर की मदद हासिल होगी। जिन आयतों में ईश्वर ने बद्र के युद्ध में फ़रिश्तों को भेजने की बात कही है, उनमें इस बात की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि ईश्वरीय फ़रिश्तों को भेजे जाने की शर्त धैर्य व ईश्वर से डरना है। ईश्वर की मदद की शर्त ईमान वालों का एक दूसरे की मदद करना, धैर्य से काम लेना और ईश्वर से डरना है।

ईश्वर कहता है कि ईमान वालों के लिए यह सहायता भेजने का उद्देश्य उनके दिलों में शांति व संतोष पैदा करना है क्योंकि शक व संदेह की हालत में मनुष्य दुश्मन से सही मुक़ाबले की क्षमता खो बैठता है लेकिन जब उसका दिल संतुष्ट होता है तो उसे एक विशेष शक्ति हासिल हो जाती है। संतोष एक असाधारण आत्मिक स्थिति व ईश्वरीय अनुंकपा है जिसके सहारे इंसान कठिन से कठिन घटनाओं को भी सहन कर लेता है और इन कठिनाइयों के बावजूद अपने दिल में शांति का आभास करता है। यह संतोष, आस्था में ढिलाई व डगमगाहट को भी दूर करता है और इंसान को शांति व स्थिरता प्रदान करता है।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी एक किताब में कहा है कि जो चीज़ भी इंसान सीखता है वह आरंभ में ज्ञान के चरण में होती है और अगले चरण में ईमान व आस्था में बदल जाती है। ईमान वह ज्ञान है जो दिल पर छप जाता है और दिल उसे मान लेता है। इंसान में ज्ञान मज़बूत होने के बाद वह तीसरे चरण यानी संतोष के चरण तक पहुंचता है। संतोष, वह चीज़ है जिसकी दुआ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से की थी। उन्होंने कहा थाः प्रभुवर! मुझे दिखा कि तू किस प्रकार मुर्दों को ज़िंदा करता है। ईश्वर ने उनके जवाब में कहा कि क्या तुम्हें इस पर ईमान नहीं है? हज़रत इब्राहीम ने जवाब दिया था कि ईमान तो है लेकिन मैं संतोष तक पहुंचने के लिए ऐसा चाहता हूं। अगले चरण में इंसान एक शक्ति देखता है जिसका ईश्वर ने इस दुनिया में प्रदर्शन किया है। जब भी इंसान सही रास्ते पर डटा रहता है, ईश्वर उसकी मदद करता है और यह मदद दो रूप में उसके जीवन में भूमिका निभाती है, एक ख़ुश व आशावान रहना और दूसरे दिल का संतोष व संदेह का पूरी तरह से ख़त्म हो जाना।

 

इस आधार पर ईश्वर व बंदे के बीच और हमारे व गुप्त संसार के बीच जो संपर्क स्थापित होता है उसे विशेष महत्व हासिल है। धर्म एक तरफ़ तो हमें अमल व प्रयास के लिए प्रेरित करता है और दूसरी तरफ़ यह याद दिलाता है कि ग़ैब व हमारी दुनिया के बीच आध्यात्मिक संपर्क, व्यक्ति के ईमान व ईश्वर से उसके भय पर निर्भर है। ईमान वाला इंसान एक गुप्त मार्ग से जिसे वह ख़ुद भी नहीं जानता, लक्ष्य व मंज़िल तक पहुंच जाता है। क़ुरआने मजीद की आयतों में कहा गया है कि हे इंसान! तू ईश्वर की मदद कर तो वह भी ऐसे गुप्त मार्ग से तेरी सहायता करेगा जिसका तुझे ज्ञान भी नहीं होगा। अपने कामों में ईश्वर से मदद मांगो, तुम देखोगे कि वह निर्धारित समय पर ग़ैब से तुम्हारी मदद करेगा।

 


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