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रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 11

रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 11

दोस्तो आज के कार्यक्रम में भी हम नमाज़ के बारे में चर्चा करेंगे।

नमाज़ पढ़ने वालों की एक एक चिंता यह होती है कि उनकी नमाज़ कबूल हुई या नहीं? इस सवाल का जवाब देने के लिए हम उन मापदंडों को बयान करेंगे जिनका उल्लेख पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के कथनों में हुआ है। उनमें से हम कुछ का उल्लेख यहां करेंगे कृपया सदा की भांति आज भी कार्यक्रम में हमारे साथ बने रहें।

नमाज़ क़बूल होने की पहली और बुनियादी शर्त यह है कि इंसान महान ईश्वर द्वारा भेजे गये दूतों के नेतृत्व को दिल से स्वीकार करता हो और उनके प्रति आस्था रखता हो। महान ईश्वर ने इंसानों के पथप्रदर्शन के लिए जो दूत और इमाम भेजे हैं उनका स्थान लोगों के मध्य ऐसा ही है जैसे इंसान के शरीर में दिल। अगर इंसान के शरीर में दिल न हो तो न केवल पूरे शरीर बल्कि शरीर के किसी भी अंग में रक्त का संचार नहीं होगा। दूसरे शब्दों में इंसान एक क्षण के लिए भी जीवित नहीं रह सकता। यह दिल ही है जो इंसान के पूरे शरीर में रक्त का संचार करता है। ठीक उसी तरह महान ईश्वर द्वारा भेजी गयी महान हस्तियों को दिल से स्वीकार करना वह आस्था है जो नमाज़ के क़बूल होने में बुनियादी भूमिका रखती है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” नमाज़ के क़बूल होने की सबसे बुनियादी भूमिका हम अहलेबैत से प्रेम और हमारे दुश्मनों से दूरी है।“

नमाज़ के क़बूल होने की दूसरी शर्त यह है कि नमाज़ी तक़वा रखता है यानी महान ईश्वर से डरता हो। तक़वा वह आंतरिक्ष चीज़ है जो इंसान को पापों से दूर रखती है। तक़वा इतना महत्वपूर्ण है कि पूरे क़ुरआन में उसका उल्लेख 100 से अधिक बार हुआ है। इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” इतना अधिक नमाज़ पढ़ो और रोज़ा रखो कि तुम्हारा शरीर झुक जाये तब भी ईश्वर उसे स्वीकार नहीं करेगा मगर यह कि तक़वा धारण करो।

इस संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” हर तक़वा रखने वाले इंसान को नमाज़, ईश्वर से निकट करती है। संगीत

ज्ञान वह चीज़ है जो न केवल नमाज़ बल्कि इंसान के समस्त कार्यों को महत्व प्रदान करती है। पैग़म्बरे इस्लाम और समस्त ईश्वरीय दूतों का एक उद्देश्य लोगों को अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश में लाना था और समस्त ईश्वरीय दूत ज्ञान के प्रज्वलित चेराग़ हैं। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” जो इंसान ईश्वर की महानता को जानकर एक रकत नमाज़ पढ़ता है उसकी यह नमाज़ उस व्यक्ति की एक हज़ार रकत नमाज़ से बेहतर है जो ईश्वर की महानता से अनभिज्ञ है।“

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जो इंसान महान ईश्वर और उसके दूतों को मानता है वह इस बात का प्रयास करेगा कि उसके अमल दूसरों के लिए आदर्श बनें और वह स्वयं को मानवीय और अध्यात्मिक सदगुणों से सुसज्जित करने का प्रयास करेगा।

नमाज़ क़बूल होने के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” बेशक मैं यानी ईश्वर उसकी नमाज़ स्वीकार करूंगा जो मेरी महानता के समक्ष स्वयं से विन्रमता दिखायेगा और मेरी प्रसन्नता के लिए अपनी इच्छाओं से परहेज़ करेगा और पूरा दिन मेरी याद में गुज़ारेगा”

यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि नमाज़ पढ़ने वाला इंसान कभी यह न सोचे कि उसने नमाज़ पढ़ लिया और महान ईश्वर से उसका संपर्क है तो यही उसके लिए काफी है बल्कि सच्चे नमाज़ी व उपासक को चाहिये कि वह महान ईश्वर के दूसरे बंदों के प्रति अपने दायित्वों का आभास करें। इसीलिए रिवायत में आया है कि मैं उसकी नमाज़ कबूल करूंगा जो लोगों के मुकाबले में स्वयं को श्रेष्ठ न समझे। भूखे का पेट भरे, वस्त्रहीन को कपड़ा दे, जिन्हें पीड़ा व आघात पहुंचा है उनका खयाल रखे, प्रेम व दया का व्यवहार करे और बेसहारे को आश्रय दे। इस प्रकार का बंदा अपने अध्यात्मिक प्रकाश से सूरज की भांति चमकता है।“

 

यद्यपि नमाज़ पढ़ने वाले इंसान को चाहिये कि वह महान ईश्वर और लोगों के समक्ष अपनी ज़िम्मेदारी का आभास करे और कौन का कार्य करना चाहिये और कौन सा नहीं करना चाहिये इसके प्रति कटिबद्ध रहना चाहिये परंतु इन सबके मध्य मां- बाप को इस्लाम में विशेष महत्व प्राप्त है और उनके महत्व की सीमा यह है कि महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में जहां यह कहा है कि इंसान को मेरी उपासना करनी चाहिये वहीं मां -बाप के साथ भलाई करने और उनके साथ अच्छाई से पेश आने के लिए भी कहा है। अपनी उपासना के तुरंत बाद महान ईश्वर द्वारा मां- बाप के साथ भलाई करने का आदेश देना जहां उनके स्थान का सूचक है वहीं इस बात का भी परिचायक है कि नमाज़ और दूसरी उपासनाओं के क़बूल होने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। मां- बाप के महत्व के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं” जो अपने मां- बाप को क्रोध की दृष्टि से देखेगा यद्यपि उन्होंने उस पर अत्याचार ही क्यों न किया हो तो ईश्वर उसकी नमाज़ को क़बूल नहीं करेगा। सारांश यह कि इस्लाम में दूसरों के अधिकारों पर ध्यान रखने पर बहुत बल दिया गया है और शायद पूरे विश्वास से कहा जा सकता है कि इस्लाम में दूसरे की बुराई करने को बहुत बड़ा पाप कहा गया है जबकि दूसरे धर्मों में ऐसा नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” मुसलमान पुरुष या महिला में से जो भी किसी मुसलमान की पीठ पीछे बुराई करे तो चालिस दिन तक उसकी नमाज़ और रोज़ा क़बूल नहीं होगा किन्तु यह कि जिस व्यक्ति की बुराई की गयी है वह बुराई करने वाले से प्रसन्न हो जाये और उसने जो बुराई की है उस माफ़ कर दे।

यहां जिस चीज़ का उल्लेख ज़रूरी है वह नमाज़ का ध्यान रखना है। यानी इस तरह से उसका ख़याल रखना चाहिये कि किसी चीज़ से उसे आघात न पहुंचे। जैसे नमाज़ पढ़ने में सुस्ती व आलस्य से काम लेना। इस प्रकार के कार्यों से नमाज़ के महत्व और उसकी गरिमा को आघात पहुंचता है और इंसान को इस प्रकार के कार्यों से दूरी करना चाहिये।

नमाज़ को सही समय पर पढ़ने पर बहुत बल दिया गया है। यह वह चीज़ है जिसे समस्त नमाज़ियों को ध्यान में रखना चाहिये और छोटे- मोटे कामों का बहाना बनाकर इसे पढ़ने में विलंबित नहीं करना चाहिये। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से रिवायत है कि प्रलय के दिन उस व्यक्ति को हमारी शिफ़ाअत नहीं मिलेगी जो नमाज़ को हल्का समझेगा। नमाज़ को सही समय पर न पढ़ना भी एक प्रकार से उसे हल्का समझना है। नमाज़ को सही समय पर पढ़ने के महत्व को समझने के लिए यही काफी है कि ईश्वरीय दूतों ने नमाज़ को उस समय भी सही समय पर पढ़ा है जब घमासान का युद्ध जारी था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं” नमाज़ की सीमा का ध्यान रखो, उसकी सुरक्षा करो और उसे अधिक शौक व स्फूर्ति से पढ़ो और उसकी रोशनी में ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करो” पैग़म्बरे इस्लाम ने भी फरमाया है कि ईश्वर के निकट सबसे अच्छा कार्य सही समय पर नमाज़ का पढ़ना है।“     

 

दोस्तो कार्यक्रम के इस भाग में हम आपको नमाज़ के प्रभावों और परिणामों के बारे में बतायेंगे। नमाज़ का एक प्रभाव यह है कि जो इंसान नमाज़ पढ़ता है वह महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की उपासना करके यह बताता है कि वह महान ईश्वर के अलावा किसी की भी उपासना नहीं करता। यानी इंसान महान ईश्वर की उपासना करके यह बताता है कि हम उसकी उपासना करते हैं जिसने पूरे ब्रह्मांड और हर चीज़ की रचना की है हम उन चीज़ों की उपासना नहीं करते हैं जिन्हें इंसानों ने बनाया है बल्कि हम उसकी उपासना करते हैं जिसने इंसानों को बनाया है। जो इंसान अपनी बनाई हुई चीज़ों की उपासना करते हैं वास्तव में ये चीज़ें इंसान को एक प्रकार से वास्तविकता और सचाई के मार्ग से दूर करती हैं और उन्हें अपनी बंदगी के बंधन में बांध देती हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इस बारे में फ़रमाते हैं” नमाज़ का तर्क व रहस्य यह है कि केवल महान ईश्वर की उपासना की जाये और हर प्रकार की मूर्तिपूजा व अनेकेश्वरवाद से दूरी की जाये और केवल ब्रह्मांड के पालनहार के समक्ष नतमस्तक हुआ जाये और उससे अपनी ज़रूरत मांगी जाये और उससे क्षमा याचना की जाये कि वह हमारी ग़लतियों व पापों को माफ़ कर दे और इंसान को कभी भी अपनी रचना करने वाले को नहीं भूलना चाहिये और भौतिक संसार की चकाचौंध हमें उद्दंडी न बना दें।“

इस आधार पर जो सच्चा नमाज़ी होता है वह महान ईश्वर की आस्था के साथ जीवन गुज़ारता है और महान ईश्वर ने उस पर जो ज़िम्मेदारियां डाली हैं उनका निर्वाह करता है। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के माध्यम से यह संदेश दे दिया है कि नमाज़ पढ़कर मेरी याद में रहो। यानी जो वास्तविक नमाज़ी होगा वह नमाज़ के अलावा दूसरे समय में भी महान ईश्वर की याद में रहेगा। जो इंसान महान ईश्वर से डरेगा वह कभी भी ग़लत व बुरा कार्य नहीं करेगा। वास्तविक नमाज़ी इस बात का पक्का विश्वास रखता है कि महान ईश्वर उसके समस्त कायों का साक्षी है। यही नहीं जो वास्तव में महान ईश्वर से डरता है वह इस बात पर भी विश्वास रखता है कि महान ईश्वर जिस तरह इंसान और ग़ैर इंसान के समस्त कार्यों से पूर्णरूप से अवगत है उसी तरह वह सभी के दिलों के रहस्यों और उनके भेदों से भी पूरी तरह अवगत है। इस आधार पर जो सच्चा और वास्तविक नमाज़ी होगा, नमाज़ से उसका मूल उद्देश्य महान ईश्वर का सामिप्य होगा। इसलिए कि वास्तविक नमाज़ी इस बात को अच्छी तरह जानता है कि महान ईश्वर के सामिप्य से अधिक कोई भी चीज़ मूल्यवान नहीं है और वास्तविक नमाज़ उसी चीज़ की कामना व आकांक्षा करता है जो सबसे अधिक मूल्यवान होती है। जैसाकि महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरेह इन्शेक़ाक़ की 6ठी आयत में कहता है” हे इंसान तू अपने पालनहार की तरफ़ बढ़ रहा है और अंत में तू उससे मुलाक़ात करेगा।“

हज़रत अली अलैहिस्सलाम महान ईश्वर से सच्चे इंसान के प्रेम के बारे में कहते हैं” अगर मौत का समय निर्धारित न होता तो उनकी आत्मायें ईश्वर के प्रेम से और उसके दंड के भय से पलक झपकने भर भी उनकी शरीरों में बाक़ी न रहतीं।


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