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यूरोपी तिकड़ी को परमाणु समझौते से निकालना ही बेहतर होगा!

यूरोपी तिकड़ी को परमाणु समझौते से निकालना ही बेहतर होगा!

परमाणु समझौते से अमरीका के निकल जाने के बाद यूरोपीय ट्राॅयका का क्रियाकलाप और अमरीकी चुनाव में बाइडन की जीत के बाद तीनों देशों की नीति का जर्मन विदेश मंत्री की ओर से उल्लेख यह दिखाता है कि अगर परमाणु समझौते में कोई बदलाव होना है तो वह यह हो कि यूरोपी तिकड़ी को इस समझौते से अलग कर दिया जाए।

अगर यह तय हो कि ट्रम्प के जाने के बाद यूरोप उनकी भूमिका निभाने लगे तो फिर बेहतर यही होगा कि ट्रम्प के साथ यूरोपी ट्राॅयका यानी ब्रिटेन, फ़्रान्स और जर्मनी भी चले जाएं और इन तीन बेकार सदस्यों की परमाणु समझौते को ज़रूरत नहीं है। परमाणु समझौते में इनकी उपस्थिति से सिर्फ़ अमरीका की बात आगे बढ़ाई जाती है और ईरान पर दबाव डाला जाता है। जब मई 2018 में अमरीका परमाणु समझौते से निकल गया था तो यूरोपीय संघ ने एक बयान जारी करके कहा था कि यह समझौता एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है और इससे न तो एकतरफ़ा तौर पर बाहर निकला जा सकता है और न ही एकतरफ़ा तौर पर ख़त्म किया जा सकता है। परमाणु समझौते के अंतर्गत यूरोपीय संघ की जो 11 प्रतिबद्धताएं हैं उनमें विभिन्न क्षेत्रों में ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को बढ़ाना, ईरान के साथ लेन-देन के लिए प्रभावी आर्थिक चैनलों का जारी रखना, ईरान के तेल, गैस व पेट्रोकेमिल वस्तुओं के निर्यात को जारी रखना, ईरान में पूंजीनिवेश का समर्थन करना और अमरीकी प्रतिबंधों के मुक़ाबले में विदेशी कंपनियों का समर्थन करना शामिल है लेकिन यूरोप ने अब तक अपनी इन प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं किया है। यूरोपीय संघ ने सिर्फ़ इस बात का इंतेज़ार किया है कि अमरीकी प्रतिबंधों के सामने ईरान घुटने टेक दे या फिर किसी दूसरे समझौते के लिए तैयार हो जाए।

 

सच्चाई यह है कि यूरोपीय संघ ने परमाणु समझौते के अंतर्रगत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करना तो दूर की बात है, पिछले दो साल से उसके साथ अपना आर्थिक सहयोग भी बंद कर दिया है और वह केवल खोखले वादे करके चाहता है तेहरान परमाणु समझौते का निरंतर पालन करता रहे। हाल ही में फ़्रान्स के राष्ट्रपति मैक्रां ने कहा है कि हम भी परमाणु समझौते में बदलाव चाहते हैं और चाहते हैं कि ईरान के मीज़ाइल कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय भूमिका को भी इस समझौते के अनुच्छेदों में शामिल किया जाए। फ़्रान्स ने यूरोपी ट्राॅयका के प्रवक्ता के रूप में यह सिद्ध कर दिया है कि यूरोप और अमरीका में कोई फ़र्क़ नहीं है। अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडन के जीतने के बाद से ही इस तरह की बातें की जा रही हैं कि अमरीका परमाणु समझौते में लौट सकता है। इस बात से फ़ायदा उठा कर यूरोपीय देशों ने अपनी मांग में और शिद्दत पैदा कर दी है। जर्मनी के विदेश मंत्री हाइको मास ने भी कहा कि सिर्फ़ अमरीका का परमाणु समझौते में लौटना काफ़ी नहीं है बल्कि एक पूरा परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने चाहिए जिसमें ईरान के मीज़ाइल कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय भूमिका को भी शामिल किया जाए।

 

सच्चाई यह है कि जबसे अमरीका परमाणु समझौते से निकला है, तब से यूरोप में कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह इस समझौते के अंतर्गत अपने वादों का पूरा करे बल्कि उसने अमरीका की अनुपस्थिति में उसके हितरक्षक की भूमिका निभाई है। बहरहाल ईरान हमेशा की तरह पूरी ताक़त के साथ अपने हितों की रक्षा के लिए डटा हुआ है और उसने आर्थिक दबावों को आर्थिक स्वावलंबन व स्वाधीनता के अवसरों में बदलने का काम निरंतर जारी रखा है। ईरान के पास तेल व गैस समेत अनेक बेजोड़ संभावनाएं हैं जिनके लिए उसकी मंडी खुली हुई है। ईरान ने चीन व रूस के साथ बड़े बड़े समझौते करके इन देशों की कंपनियों को पूंजीनिवेश के लिए प्रेरित किया है। ये अमरीका व यूरोप की कंपनियां हैं जो ईरान में पूंजी निवेश और इस देश से लेन-देन से वंचित हो चुकी हैं और उन्हें हर साल अरबों डाॅलर का नुक़सान हो रहा है। 


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