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यह अर्दोग़ान को क्या हो गया? एक तरफ़ इस्राईल से रिश्ते बढ़ाने की चाह और दूसरी ओर अफ़ग़ानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप की उत्सुकता! तालेबान ने क्यों दी बड़ी धमकी?

यह अर्दोग़ान को क्या हो गया? एक तरफ़ इस्राईल से रिश्ते बढ़ाने की चाह और दूसरी ओर अफ़ग़ानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप की उत्सुकता! तालेबान ने क्यों दी बड़ी धमकी?

तालेबान ने फ़ौरन और कड़े स्वर में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान को चेतावनी दे दी जो अमरीका के साथ एक समझौता करना चाहते हैं जिसके तहत वह नैटो के सारे सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने के बाद भी अपने सैनिक इस देश में बाक़ी रखने का इरादा रखते हैं। तालेबान ने तुर्की को चेतावनी दी है कि इसके ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं।

तुर्की की यह पेशकश जिसे इस देश के रक्षा मंत्री ख़लूसी अकार ने बयान किया उस समय सामने आई है जब रजब तैयब अर्दोग़ान ने अपने इस्राईली समकक्ष इसहाक़ हर्तसोग को फ़ोन किया और कहा कि पश्चिमी एशिया की शांति व सुरक्षा के लिए इस्राईल और तुर्की के बीच दोस्ती महत्वपूर्ण है।

हमें यह नहीं पता कि तुर्की और अमरीका के बीच होने वाला समझौता किस प्रकार का है लेकिन इतना तो पता है कि यह केवल काबुल के अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का मामला नहीं बल्कि अमरीका की नुमाइंदगी में काम करने का विषय है और इसकी भारी क़ीमत तुर्की को चुकानी पड़ सकती है।

यह भी सही है कि अफ़ग़ानिस्तान में तुर्क सैनिकों की संख्या 500 से ज़्यादा नहीं है लेकिन संभावना है कि सैनिकों की संख्या बढ़ेगी और साथ ही भारी हथियार भी अफ़ग़ानिस्तान भेजे जाएंगे।

अफ़ग़ानिस्तान में इस समय गृह युद्ध के हालात बन रहे हैं। सवाल यह है कि तुर्की अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सैनिक उपस्थिति मज़बूत करना चाहता है या सीरियाई और तुर्कमन लड़ाकों को अफ़ग़ानिस्तान में तैनात करना चाहता है जैसा उसने लीबिया, सीरिया और आज़रबाइजान में किया?

तालेबान की कठोर प्रतिक्रिया का यह मतलब है कि अगर तुर्की ने अपने सैनिक तैनात किए तो उन पर तालेबान की ओर से हमले शुरू हो सकते हैं। तालेबान ने 20 साल से ज़्यादा समय तक नैटो सेनाओं से जंग की और उन्हें पराजित करके अफ़ग़ानिस्तान से निकलने पर विवश कर दिया।

दूसरी बात यह है कि तालेबान ने अब चीन, ईरान और रूस जैसे बड़े देशों से रिश्ते क़ायम कर लिए हैं। तालेबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि चीन अफ़ग़ानिस्तान का दोस्त मुल्क है।

अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिक तो निकाल लिए हैं लेकिन राजनैतिक मंच पर उसका हस्तक्षेप जारी रहेगा और इसके लिए वह भांति भांति की साज़िशों का सहारा लेगा जैसा कि उसने सीरिया, इराक़, लीबिया और मिस्र में किया।

अर्दोग़ान का मामला यह है कि लोकप्रियता बुरी तरह सीमित हो जाने के बावजूद वह किसी भी क़ीमत पर सत्ता में बने रहना चाहते हैं और उन्हें लगता है कि अमरीका और इस्राईल इस लक्ष्य के संदर्भ में सीढ़ी का रोल अदा कर सकते हैं और तुर्की की अर्थ व्यवस्था को डूबने से बचा सकते हैं। लेकिन अर्दोग़ान की यह कितनी बड़ी भूल है?!

यमन की तरह अफ़ग़ानस्तान भी सुपर पावरों का क़ब्रिस्तान है। यहां ब्रिटिश साम्राज्य को शिकस्त हुई, सोवियत युनियन तो एसा हारा कि बिखर ही गया और अब अमरीका शिकस्त खाकर बाहर निकला है।

हम अर्दोग़ान से बस इतना कहेंगे कि तुर्की को भिड़ों के छत्ते में मत झोंकिएं वरना इतने डंक लगेंगे कि पूरा देश इसकी पीड़ा महसूस करेगा।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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