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यमन के जनांदोलन अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुट घोषित करना, एक बड़ी ग़लती होगी, लेकिन क्यों?: थिंक टैंक ब्रूकिंग्स

यमन के जनांदोलन अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुट घोषित करना, एक बड़ी ग़लती होगी, लेकिन क्यों?: थिंक टैंक ब्रूकिंग्स

एक अमेरिकी थिंक टैंक ने डोनल्ड ट्रम्प प्रशासन के नवीनतम क़दम का विरोध करने का कारण बताते हुए कहा है कि, यमन के जनांदोलन असारुल्लाह को आतंकवादी गुट घोषित करने की व्हाइट हाउस की संभावित योजना एक बड़ी ग़लती होगी।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन अमेरिकन सेंटर फॉर मिडिल ईस्ट पॉलिसी के नॉन रेज़िडेंट  सदस्य, ग्रेगरी जॉनसन ने अपने लेख में यमन और इस देश के लोकप्रिय जनांदोलन अंसारुल्लाह के बारे में ट्रम्प सरकार की नीति के संबंध में लिखा है कि, विदेश नीति के क्षेत्र में ट्रम्प के सबसे पहले निर्णयों में से एक यह था कि उन्होंने अमेरिका की नौसेना की एक विशेष टुकड़ी को इस बात की इजाज़त दी कि वह यमन पर हमले की रणनीति बनाए। इस आदेश पर उन्होंने खाने की मेज़ पर हस्ताक्षर किए थे। एक बहुत ही कमज़ोर, ख़तरनाक और जल्दबाज़ी में बनाई गई योजना थी। जिसका परिणाम, कुछ आम यमनी नागरिकों की मौत, जिनमें 10 मासूम बच्चे और एक अमेरिकी सैनिक की मौत निकला। इस रिपोर्ट में आगे आया है कि अब जब ट्रम्प अपनी सरकार के अंतिम दिन गिन रहे हैं तो उन्होंने एक बार फिर यमन के बारे में ग़ैर ज़रूरी और ग़लत फ़ैसला लेने का मन बनाया है। ट्रम्प ने फ़ैसला किया है कि वह यमन के सबसे लोकप्रिय जनांदोलन अंसारुल्लाह, कि जिसका यमन के उत्तरी इलाक़े पर नियंत्रण है, उसको आतंकवादी गुट घोषित करे। यह एक ख़तरनाक और ग़लती भरा क़दम होगा।

थिंक टैंक ग्रेगरी जॉनसन ने लिखा है कि, यमन के आम लोगों को यह समझाने की कोशिश कि अंसारुल्लाह आतंकवादी गुट है, असंभव है। क्योंकि वे कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि अंसारुल्लाह आतंकवादी संगठन है। उन्होंने आगे लिखा है कि, इस तरह का निर्णय अंत में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी ख़तरनाक साबित होगा। जॉनसन लिखते हैं कि, यह ऐसा क़दम है कि जो बाइडेन का हाथ उनके राष्ट्रपति पद के शपद लेने से पहले ही बांध देगा। जबकि ट्रम्प और उनके क़रीबी अधिकारी यह पहले से ही चाहते हैं कि वह बाइडेन को जितना हो सके सीमित रख सकें, ताकि वर्ष 2024 के चुनाव में इसका लाभ उठा सकें। इस रिपोर्ट में यह भी आया है कि, 6 वर्षों पहले, ओबामा की सरकार में और ट्रम्प की सरकार में भी अमेरिका, सऊदी अरब द्वारा यमन के ख़िलाफ़ शुरू किए गए पाश्विक और ख़ूनी युद्ध में उसका बराबर का सहयोगी बन गया। अमेरिका ने सऊदी अरब के पायलेटों को ट्रेनिंग दी, अरबों डॉलर के हथियार उसको बेचे, सऊदी युद्धक विमान जब यमन की आम जनता के सिरों पर बम बरसा रहे होते हैं तो अमेरिका उन लड़ाकू विमनों में तेल भर रहा होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यमन के आम नागरिकों के बहते ख़ून में अमेरिका के हाथ भी रंगीन हैं।

जॉनसन की रिपोर्ट में आया है कि, जब सऊदी अरब ने यमन के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किया था तो उसने इस युद्ध का नाम दिया था, निर्णायक तूफ़ान। उन्होंने इस काम को रियाज़ से नहीं किया था बल्कि वॉशिंग्टन से अंजाम दिया था। ताकि यह दिखा सकें कि उन्हें अमेरिका का पूरी तरह समर्थन प्राप्त है। इसके मुक़ाबले में अमेरिका ने भी रियाज़ में संयुक्त गुप्तचर विभाग स्थापित करने का एलान किया था। सऊदी अरब के अधिकारियों ने ओबामा सरकार से कहा था कि यह युद्ध बहुत ज़्यादा 6 महीने तक चलेगी, जबकि अब इस युद्ध को 6 वर्ष का समय हो रहा है। इस अवधि के दौरान अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा जो मरने वालों की संख्या बताई गई है वह बहुत तेज़ी से बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी, जो कई साल पहले मरने वालों के आंकड़े बताए थे, अब उसने भी आंखे मूंद ली हैं और उसका कहना है कि यमन इस समय मानव इतिहास की सबसे बुरी त्रास्दी से गुज़र रहा है। हलांकि इस मानवीय त्रास्दी को वजूद में लाने वाला स्वयं इंसान ही है। इस रिपोर्ट में आगे आया है कि, ईरान ने सना में अपने राजदूत की नियुक्ति की है  और साथ ही अंसारुल्लाह के नियंत्रण वाले इलाक़ो को मान्यता दी है। इसलिए ट्रम्प सरकार ने यह निर्णय लिया है कि वह जाते-जाते अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुटों की सूची में डाल दे। 

थिंक टैंक ग्रेगरी जॉनसन ने अपने लेख में लिखा है कि, ट्रम्प और उनके विदेश मामलों में मंत्री माइक पोम्पियो सऊदी अरब के युवराज की बातों पर विश्वास करके यह सोचते हैं कि उनके सख़्त रवैये से अंसारुल्लाह घुटने टेक देगा और वह हथियार डाल देगा, तो इस तरह उनका सोचना केवल ख़्याली सपनों जैसा है जो अपने साथ बहुत सारी समस्याएं लिए हुए है और इन समस्याओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह सपना पूरा होने वाला नहीं है। इस लेख के मुताबिक़, अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुट क़रार देने से उनके सदस्यों के अमेरिका में आने पर प्रतिबंध लग जाएगा और विदेशों में मौजूद उनकी संपत्तियां ज़ब्त हो जाएंगी। जबकि अंसारुल्लाह के तीन प्रमुख लोग जिनमें जनांदोलन के प्रमुख अब्दुल मलिक अलहौसी भी शामिल हैं उनपर पहले से ही संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतिबंध लगा हुआ है। वह अंतर्राष्ट्रीय यात्रा नहीं कर सकते हैं और उनकी संपत्तियां भी ज़ब्त की जा चुकी हैं। जॉनसन का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंधों को कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ है बल्कि इससे नुक़सान ही हुआ है। उनका कहना है कि खाद पदार्थों की कमी के बावजूद अंसारुल्लाह के प्रमुख सुरक्षित हैं लेकिन प्रतिबंधों से जो सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं वह है यमन की आम जनता। अब अगर अंसारुल्लाह पर को आतंकी गुट घोषित कर दिया जाएगा तो मानवता प्रेमी सहायता, उन 16 लाख लोगों तक नहीं पहुंच पाएगी जो अंसारुल्लाह के नियंत्रण वाले इलाक़ों में हैं। इनमें से ज़्यादा वे लोग हैं जो विदेश सहायता पर निर्भर हैं। इसी तरह अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुट घोषित करने से यमन में शांति के लिए कि यमन युद्ध को भड़का कर जल्द जीत का दावा करने वाला सऊदी अरब अब जब इस युद्ध के दलदल में फंस गया है और किसी भी तरह की कामयाबी उसके हाथ नहीं लगी है, वहीं ट्रम्प भी व्हाइट हाउस से जाने वाले हैं, तो रियाज़ चाहता है कि वह अंसारुल्लाह को आतंकवादी गुट घोषित कराके दुनिया को यह दिखा सके कि उसने बहुत बड़ी सफलता पा ली है, जबकि दुनिया यह देख रही है कि यमन युद्ध के आरंभ में जितना कमज़ोर था अब 6 वर्ष बीत जाने के बाद वह उतना ही मज़बूत हो गया है और सऊदी अरब के हर हमले का मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। (RZ)






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