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मोदी सरकार के विवादित नए कृषि क़ानून को लेकर कुछ ऐसे सवाल जिसके जवाब का इंतेज़ार कर रहें किसान! क्या भारत बंद की सफलता नए क़ानून में बदलाव का रास्ता साफ़ करेगा?

मोदी सरकार के विवादित नए कृषि क़ानून को लेकर कुछ ऐसे सवाल जिसके जवाब का इंतेज़ार कर रहें किसान! क्या भारत बंद की सफलता नए क़ानून में बदलाव का रास्ता साफ़ करेगा?

भारत के किसानों ने मोदी सरकार से पूछा है कि जो उनकी सरकार की ओर से नया कृषि क़ानून बनाया गया है क्या भारतीय किसानों की तरफ़ से ऐसा कोई क़ानून बनाने की मांग उठी थी? और क्या किसानों से इस नए क़ानून के बारे कोई सलाह ली गई? किसानों का आरोप है कि मोदी सरकार इसके ज़रिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एवं मंडियों की स्थापित व्यवस्था को ख़त्म करना चाह रही है। किसान एमएसपी को क़ानूनी अधिकार बनाए जाने की मांग कर रहे हैं।

पिछले 10 दिनों से भी अधिक समय से भारत के विभिन्न हिस्सों में किसान मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें पंजाब और हरियाणा के किसानों ने अग्रणी भूमिका निभाई है और वे इसके विरोध में कड़कड़ाती ठंड में भी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर धरना दे रहे हैं। किसानों का सरकार से मूलभूत सवाल यह है कि क्या किसी किसान आंदोलन में कभी भी यह तीन क़ानून बनाने की मांग उठी थी? क्या क़ानून बनाते समय किसी किसान संगठन से विचार विमर्श किया गया था? आख़िर क्यों आनन-फानन में कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के बीच इन क़ानूनों को लाया गया? यदि यह क़ानून किसानों के हित में है, तो क्यों कोई भी बड़ा किसान संगठन इसके पक्ष में नहीं है? वैसे तो भारत के केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर समेत बीजेपी के तमाम नेता इन सवालों से बचने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि क़ानून को लेकर मोदी सरकार और किसान के बीच पांच राउंड की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई प्रभावी निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। भारतीय किसानों की मांग है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानूनी अधिकार बनाए, ताकि कोई भी ट्रेडर या ख़रीददार किसानों से उनके उत्पाद एमएसपी से कम दाम पर न ख़रीद पाए। यदि कोई ऐसा करता है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। भारतीय किसानों का आरोप है कि सरकार इन तीन क़ानूनों के ज़रिये एमएसपी एवं मंडियों की स्थापित व्यवस्था को ख़त्म करना चाह रही है, जिसका सीधा लाभ सिर्फ़ और सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों और ट्रेडर्स को होगा और इसके चलते किसान उनके रहम पर जीने पर विवश हो जाएंगे।

 

वैसे तो मोदी सरकार का दावा है कि वह इन तीनों नए क़ानूनों के ज़रिये किसानों के लिए एक विशाल कृषि बाज़ार तैयार कर रही है, जहां वह अपनी इच्छा के अनुसार अपनी पसंद की जगह पर बिक्री कर सकेंगे। इसके साथ ही भारत सरकार की दलील है कि एपीएमसी व्यवस्था में बिचौलियों के चलते किसानों का नुक़सान हो रहा था, इसलिए उन्होंने कृषि बाज़ार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है। हालांकि किसान एवं कृषि संगठन कहते हैं कि यह बात सही है कि एपीएमसी मंडियों में समस्याएं थीं, लेकिन उन्हें सुधारने के बजाय सरकार किसानों के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा कर रही है। इस नई व्यवस्था से बड़े उद्योगपतियों और ट्रेडर्स को ही फ़ायदा पहुंचने वाला है, किसानों को नहीं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि नए क़ानून के कारण यदि मंडियां ख़त्म होती हैं तो एमएसपी भी अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगा। इन एपीएमसी मंडियों के बाहर भी ख़रीद-बिक्री के छोटे स्थानों पर उत्पादों के मूल्य मंडी भाव के आधार पर तय होते हैं। इस तरह किसानों को उचित दाम दिलाने में इन मंडियों की प्रमुख भूमिका है। इसलिए किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार एक कानून लाए कि मंडी या मंडी से बाहर एमएसपी से नीचे की ख़रीद ग़ैरक़ानूनी होगी। कृषि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मोदी सरकार द्वारा बनाया गया नया क़ानून बड़े ट्रेडर्स को जमाखोरी की छूट देगा, जिससे वह मार्केट में इन चीज़ों की कमी करके रेट बढ़ाएंगे और मुनाफ़ा कमाएंगे। इससे ग़रीब एवं मध्यम वर्ग को नुक़सान होने की संभावना है।

वहीं भारत की राजधानी दिल्ली के बॉर्डरों पर लाखों की संख्या में मोदी सरकार द्वारा बनाए गए विवादित नए कृषि क़ानून का का विरोध कर रहे किसानों ने पांच दौर की बातचीत से न निकलने वाले नतीजों को देखते हुए 8 दिसंबर मंगलवार को भारत बंद का आह्वान किया है। जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार किसानों से वादे तो कर सकती है लेकिन वह उन्हें लिखित आश्वासन नहीं देगी। वहीं किसानों का आरोप है कि अब तक मोदी सरकार ने जिस-जिस से जो वादा किया है उसको पूरा नहीं किया है इसलिए वह वादों के जाल में नहीं फंसना चाहते हैं और उनका कहना है कि हमे जवाब हां या नहीं में ही चाहिए। इस बीच कई टीकाकारों का यह भी कहना है कि 5 नवंबर को किसानों और केंद्र सरकार के बीच हुई बातचीत में कोई नतीजा निकल सकता था, लेकिन उसको जानबूझकर टाला गया है। टीकाकारों के अनुसार मोदी सरकार 8 दिसंबर को किसानों द्वारा भारत बंद की सफलता को देखना चाहती है। अगर भारत बंद का असर पूरे भारत में देखने को मिला तो मोदी सरकार ज़रूर थोड़ा पीछे हटेगी और किसानों को लिखित आश्वासन दे सकती है। जबकि कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि मोदी सरकार के पास इस विवादित क़ानून को वापस लेने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है। अगर केंद्र सरकार ने इस विवादित क़ानून को वापस नहीं लिया तो उसके हाथ से कई राज्य की सरकारें जा सकती हैं। वहीं भारत बंद का कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियों ने भी समर्थन करने का एलान किया है। अब देखना है कि कृषि प्रधान देश भारत में किसानों और सरकार के बीच जारी संघर्ष में कौन विजयी होता है। जहां किसानों के साथ लड़ाई में भारत की आम जनता उनका साथ दे रही है वहीं मोदी सरकार के साथ गोदी मीडिया के नाम से जाना जाने वाला भारत का विशाल मीडिया तंत्र और इस देश के बड़े कॉर्पोरेट घराने खड़े दिखाई दे रहे हैं।


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