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मुहम्मद बिन सलमान, ईरान से संबंधों की बात करने लगे!

मुहम्मद बिन सलमान, ईरान से संबंधों की बात करने लगे!

ईरान के बारे में सऊदी अरब के युवराज का नया व सकारात्मक रुख़ उस समय सच माना जाएगा जब वह अमरीका व इस्राईल से अलग हट कर अपनाया गया होगा जो हमेशा तेहरान व रियाज़ के संबंधों में बाधाएं डालते रहते हैं।

मुहम्मद बिन सलमान ने मंगलवार को सऊदी अरब के अलअरबिया टीवी चैनल से बात करते हुए कहा कि ईरान हमारा पड़ोसी देश है और हमें जिस बात की अपेक्षा है वह यह है कि हमारे और उनके बीच अच्छे संबंध रहें। उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि ईरान के हालात कठिन हों बल्कि हम इस देश की प्रगति चाहते हैं, ईरान का विकास चाहते हैं क्योंकि यह बात उनके भी और हमारे भी पक्ष में है ताकि क्षेत्र और दुनिया को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा सकें। अलबत्ता बिन सलमान ने अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए यह दावा भी किया कि ईरान के साथ हमारी समस्या, इस देश का नकारात्मक रवैया है, चाहे वह उसका परमाणु कार्यक्रम हो, कुछ क्षेत्रीय देशों के क़ानून से इतर काम करने वाले संगठनों का समर्थन और बेलिस्टिक मीज़ाइल कार्यक्रम है। इसी लिए हम अपने क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय घटकों के साथ मिल कर इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद है कि हम इस चरण से गुज़र जाएंगे और एक दूसरे के साथ अच्छे संबंध रखेंगे जो सभी के पक्ष में होगा।

 

मुहम्मद बिन सलमान ने 2017 के अंत में ट्रम्प सरकार और नेतनयाहू के ईरान विरोधी सुर में सुर मिलाते हुए क्षेत्र में ईरानी के विरोधी मोर्चे का नेतृत्व संभाला और दावा किया कि वे युद्ध को ईरान के अंदर पहुंचाने का इरादा रखते हैं। यद्यपि दावा यह किया जाता है कि तेहरान में सऊदी अरब के दूतावास पर कुछ अतिवादी लोगों का हमला, तेहरान व रियाज़ के कूटनैतिक संबंधों की समाप्ति का कारण था लेकिन सच्चाई यह है कि ट्रम्प के अमरीका में सत्ता में आने, परमाणु समझौते को तबाह करने के लिए नेतनयाहू से उनके समन्वय और इसी तरह सऊदी अरब के युवराज के रूप में उनके द्वारा बिन सलमान का समर्थन इस बात का कारण बना कि सऊदी युवराज अपने पद को बचाए रखने के लिए अमरीका व ज़ायोनी शासन के प्रतिनिधित्व में क्षेत्र में ईरान विरोधी मोर्चे का नेतृत्व करें और क़तर के साथ तनाव के दौरान दोहा से अपने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए रखी गई 13 शर्तों में से एक यह रखें कि वह ईरान से अपने संबंध तोड़ ले।

 

आले सऊद ने सीरिया व इराक़ को भी ईरान से दूर करने की बहुत कोशिश की लेकिन अमरीका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव में बिन सलमान की आशा के विपरीत जो बाइडन जीत गए और ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की नीति अपनाने वाले ट्रम्प हार गए। अमरीका को कूटनीति में वापस लाने की पैरवी करने वाले जो बाइडन वाइट हाउस में पहुंच गए और इसमें कोई शक नहीं कि ट्रम्प की हार का एक बड़ा कारण उनका ईरान विरोधी रुख और बिन सलमान का अंध समर्थन था। इसी वजह से बाइडन ने वाइट हाउस में पहुंचते ही यमन युद्ध में सऊदी गठबंधन के समर्थन पर पुनर्विचार किया और इस युद्ध को तुरंत बंद किए जाने की मांग की। इसी के साथ अमरीका की नई सरकार परमाणु समझौते में वापसी के लिए ईरान से बातचीत की मांग कर रही है। ये सारी बातें इस बात का चिन्ह हैं कि सऊदी अरब के युवराज एक नई परिस्थिति में पहुंच गए हैं। दूसरी ओर कहा जा रहा है कि अमरीका पश्चिमी एशिया पर अपना ध्यान कम करके चीन को नियंत्रित करने के लिए पूर्वी एशिया पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और संभव है कि ईरान के बारे में बिन सलमान के रुख़ में बदलाव के पीछे अमरीकी हों, अगर ऐसा है तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्र में सऊदी अरब की नीति स्वाधीन नहीं है।

 

सच्चाई यह है कि ईरान व सऊदी अरब इलाक़े के दो अहम देश हैं और इन दोनों का सहयोग अमरीका व ज़ायोनी शासन के हस्तक्षेप से दूर रहते हुए क्षेत्र के लिए शांति व स्थिरता का कारण बन सकता है और साथ ही क्षेत्र के लिए व्यापक विकास का रास्ता खोल सकता है लेकिन यह बात तभी संभव होगी जब सऊदी अरब, अमरीका व ज़ायोनी शासन के पाले में न रहे और ईरान को क्षेत्र के मैदान से बाहर करने की कोशिश न करे। इसी स्थिति में ईरान से संबंधों को बेहतर बनाने की बिन सलमान की बात को सकारात्मक नज़र से देखा जा सकता है।


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