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मुसलमान बनाम हिंदुत्वा, कहां तक जाएगी यह लड़ाई?

मुसलमान बनाम हिंदुत्वा, कहां तक जाएगी यह लड़ाई?

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कश्मीर में तीन विरोधाभासी नीतियों पर काम कर रही है।

पहली नीति है बहुसंख्यकों को हथियार देना और पूरे समाज पर बहुसंख्यकवाद थोपना। दूसरी नीति है बहुसंख्यक कट्टरपंथियों को क़ानून का उल्लंघन करने के लिए उकसाना जबकि दूसरी ओर हिंसा का निशाना बनने वालों को क़ानून का पालन करने पर मजबूर करना और तीसरी नीति है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रदर्शन और विरोध के समर्थन का दावा लेकिन यदि कोई मुसलमान या ईसाई इस अधिकार का प्रयोग करना चाहे तो उसे आतंकवादी क़रार देना।

इसके साथ साथ हिंदुत्ववादी शक्तियां समाज में नफ़रत भी फैला रही हैं। इन नीतियों का मक़सद है कश्मीर में विरोध को कुचल देना और कशमीरियों को घुटने टेकने पर मजबूर करना। वैसे पूरे भारत में मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों के जीवन पर इसका बहुत गहरा असर पड़ रहा है।

हिंदुत्ववादी एजेंडा एक तरफ़ तो यह प्रचार करता है कि हम सब एक हैं लेकिन साथ ही उसका ज़ोर है कि केवल हिंदुत्ववादी कल्चर और जीवनशैली ही एकमात्र विकल्प है जो भारत जैसे बहुलतावादी देश में असंभव है।

हिंदुत्ववादी तत्व खुलकर कहते हैं कि भारत में सबको एकसमान अधिकार नहीं हैं। भाजपा नेता सुब्रामण्यम स्वामी ने मुसलमानों के लिए खुलकर कहा कि वह दूसरों के बराबर नहीं हैं हालांकि यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14 के बिलकुल ख़िलाफ़ है।

मगर भारतीय जनता पार्टी ने साबित किया है कि उसके एजेंडे के सामने संविधान की कोई हैसियत है न क़ानून का कोई महत्व, वह जिस क़ानून को भी अपने एजेंडे में रुकावट के रूप में देखती है उसका जमकर उल्लंघन करती है। कश्मीर के मामले में भाजपा ने यही किया है।

हिंदुत्व की हिंसा की भेंट चढ़ने वालों को क़ानूनी रास्ते पर चलने का सुझाव दिया जाता है और अदालतों से कभी भी उन्हें इंसाफ़ नहीं मिल पाता।

हिंदुत्ववादी ताक़तें भारत की सहिष्णुता का बड़ा गुणगान करती हैं लेकिन वह मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं।

भाजपा की सरकार में बड़े योजनाबद्ध तरीक़े से मुसलमानों को हाशिए पर डालने की साज़िश चल रही है। मुसलमानों को फ़ोर्सेज़ में दाढ़ी रखने की अनुमति नहीं है मगर सिखों को यह अनुमति हासिल है।

स्रोतः अलजज़ीरा


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