हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. की वसीयत और शहादत।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. की वसीयत और शहादत।

आपकी वसीयत के अनुसार आपका जनाज़ा रात को उठाया गया, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ग़ुस्ल और कफ़न का इंतेज़ाम किया केवल बनी हाशिम और सलमान फ़ारसी, मिक़दाद और अम्मार जैसे ईमानदार और वफादार साथियों के साथ नमाज़े जनाज़ा पढ़कर ख़ामोशी के साथ दफन कर दिया

अहलेबैत न्यूज़ एजेंसी अबनाः हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) ने औरतों के लिए पर्दे के महत्व को उस समय भी बयान किया जब आप दुनिया से रुख़्सत होने वाली थीं। एक दिन आप बहुत परेशान थीं तो आपकी चची अस्मा बिन्ते उमैस ने कारण पूछा तो आपने फ़रमाया कि मुझे अंतिम संस्कार में जनाज़ा उठाए जाने का यह तरीक़ा अच्छा नहीं लगता कि औरत के जनाज़े को भी तख़्त पर उठाया जाता है जिससे उसका शरीर और डीलडौल दिखाई देता है असमा ने कहा कि मैंने हबशा में एक दूसरी तरह से जनाज़ा उठाते हुए देखा है वह शायद आपको पसंद आए, उसके बाद उन्होंने ताबूत की एक तस्वीर बना कर दिखाई जिसे देखकर हज़रत ज़हरा स. बहुत खुश हुईं।
और अपने बाबा हज़रत मुहम्मद स. के बाद सिर्फ़ पहला ऐसा समय था जब आपके होंटों पर मुस्कुराहट आ गई। इसलिए आपने वसीयत की कि आपका जनाज़ा भी इसी तरह के ताबूत में उठाया जाए।
इतिहासकारों ने लिखा है कि पहला जनाज़ा जो ताबूत में उठा है वह हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. का था, इसके अलावा आपकी यह वसीयत भी थी कि आपका अंतिम संस्कार रात के अंधेरे में किया जाए और उन लोगों को पता न चले कि जिनके बर्ताव और बुरे व्यवहार से आपके दिल को ठेस पहुंची है, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. उन लोगों से बेहद नाराजगी की हालत में इस दुनिया से विदा हुईं।
शहादतः
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स. अपने बाबा रसूले ख़ुदा स. की वफ़ात के बाद केवल 3 महीने ज़िंदा रहीं और 3 जमादिउस्सानी को मदीने में आपकी शहादत हुई इन तीन महीनों में आपको बहुत सी मुसीबतों का सामना करना पड़ा आपके घर के दरवाज़े पर आग लगाई गई और जलता हुआ दरवाज़ा आपके ऊपर गिराया गया जिसके नतीजे में आपका बच्चा भी शहीद हो गया आपकी पसलियां टूट गईं और सिर्फ़ 18 साल की उम्र में आप इस दुनिया से विदा हो गईं आपकी वसीयत के अनुसार आपका जनाज़ा रात को उठाया गया, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ग़ुस्ल और कफ़न का इंतेज़ाम किया केवल बनी हाशिम और सलमान फ़ारसी, मिक़दाद और अम्मार जैसे ईमानदार और वफादार साथियों के साथ नमाज़े जनाज़ा पढ़कर ख़ामोशी के साथ दफन कर दिया।
आपके दफ़्न की ख़बर भी आम तौर पर लोगों को नहीं हुई, जिसके वजह से यह नहीं मालूम हो सका कि आप जन्नतुल बक़ी में दफ़्न हैं या अपने ही मकान में, जो बाद में मस्जिदे नबवी का एक हिस्सा बन गया। जन्नतुल बक़ी में जो आपका रौज़ा बना था वह भी बाकी नहीं रहा। इस मुबारक रौज़े को 8 शव्वाल सन 1344 हिजरी क़मरी में आले सऊद ने अहलेबैत अ. के दूसरे रौज़ों के साथ गिरा दिया।


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