सैयद हसन नस्रुल्लाहः

अमेरिका और इस्राईल के पास ईरान पर हमला करने की हिम्मत नहीं।

अमेरिका और इस्राईल के पास ईरान पर हमला करने की हिम्मत नहीं।

हिज़्बुल्लाह के जनरल सेक्रेटरी हसन नस्रुल्लाह ने एक इंटरव्यू में ईरान को मिलने वाली अमेरिकी और ज़ायोनी धमकियों के बारे में कहा कि यह धमकियाँ ईरान और सुप्रीम लीडर के विरुद्ध एक मानसिक युद्ध का हिस्सा हैं। ज़ायोनी और अमेरिकन सेना में इतना दम नहीं है कि वह ईरान के विरुद्ध किसी सैन्य अभियान का सोच सकें।

हिज़्बुल्लाह के जनरल सेक्रेटरी हसन नस्रुल्लाह ने एक इंटरव्यू में ईरान को मिलने वाली अमेरिकी और ज़ायोनी धमकियों के बारे में कहा कि यह धमकियाँ ईरान और सुप्रीम लीडर के विरुद्ध एक मानसिक युद्ध का हिस्सा हैं। ज़ायोनी और अमेरिकन सेना में इतना दम नहीं है कि वह ईरान के विरुद्ध किसी सैन्य अभियान का सोच सकें। यह धमकियाँ इसलिए भी हैं कि साम्राज्यवादी ताक़तें समझ गई हैं कि इस क्षेत्र में उनके दिन लद चुके हैं और ईरान इस क्षेत्र की शक्ति है तथा वह अकेला नहीं है। उन्होंने लेबनान को दी जाने वाली ज़ायोनिस्ट धमकियों के जवाब में कहा कि हम इस्राईल के जन्म से ही यह धमकियाँ सुनते आ रहे हैं। ज़ायोनी शासन साल, दो साल में ऐसी धमकियाँ देता रहा है लेकिन कल जैसे लेबनानी जंग के नाम से डरते थे वह ड़र अब इस्राईल में भी पाया जाता है। उन्होंने कहा कि हम पर लादी जाने वाली किसी भी जंग का परिणाम ३३ दिवसीय युद्ध से बड़ी विजय के रूप में सामने आएगा हम डर को पीछे छोड़ चुके हैं अब डर ज़ायोनिस्ट लोगों को है हम हर परिस्थिति का सामना करने के लिए सदैव तैयार हैं । ३३ दिवसीय युद्ध में हम अपने नागरिको के मारे जाने पर भी उनके शहरों को निशाना नहीं बनाते थे हम हैफा में उनके अमोनिया भंडार को निशाना बना सकते थे लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा के अनाधिकृत भूमि में कई ऐसे स्थान हैं जिन्हें निशाना बनाने पर एक बड़ी त्रासदी को रोका नहीं जा सकता। ज़ायोनिस्ट सत्ता अगर लेबनान पर हमल या अतिक्रमण का सपना देख रही है तो जान ले इस बार हमारे लिए कोई रेड लाइन नहीं होगी। उन्होंने मिडिल ईस्ट के भविष्य पर बात करते हुए कहा कि क्षेत्र में साम्प्रदायिक कार्ड साम्राज्यवाद का आखरी दांव था जो नाकाम हो गया है मिडिल ईस्ट में तकफ़ीरी और ज़ायोनी ताक़तें कमज़ोर होंगी तथा इस्लामी गणतंत्र एवं हमारे सहयोगी देश तथा प्रतिरोधी आंदोलन का दबदबा बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि ईरान फिलिस्तीन आंदोलन का केंद्र बिंदु है इस्लामी क्रांति के जनक आयातुल्लाह खुमैनी और सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह खामेनई की इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका है। उन्होंने बैतुल मुक़द्दस और फिलिस्तीन की आज़ादी को प्रतिरोध आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य बताते हुए क्षेत्र के कुछ देशों के डर के बारे में कहा कि यह देश अमेरिकी साम्राज्यवाद के एजेंट हैं हम किसी देश को टारगेट नहीं करते हमारा उद्देश्य सिर्फ फिलिस्तीन की आज़ादी है। हम बातचीत द्वारा क्षेत्र की समस्याओं का समाधान चाहते हैं लेकिन दूसरा पक्ष हमारे देशों को वीरान करने तथा हमारे नागरिकों के जनसंहार में लगा हुआ है।
उन्होंने ज़ायोनी राष्ट्र के मुद्दे पर कहा कि क़ानूनी,बौद्धिक,धार्मिक, आधिकारिक, किसी भी दृष्टि से इस्राईल का वजूद वैध नही है। जो काम आईएस और दूसरे आतंकी संगठन आज कर रहे हैं वही काम इस्राईल १९४८ से क्षेत्र के लोगों विशेष कर फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ करता आ रहा है।
उन्होंने फिलिस्तीन मुद्दे पर दो राष्ट्र समाधान नीति को ज़ायोनिस्ट और अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नकार दिए जाने पर कहा कि यह फिलिस्तीनियों के खिलाफ चली आ रही मक्कारी और फरेब का खात्मा है ज़ायोनी कभी फिलिस्तीनी राष्ट्र के पक्षधर थे ही नहीं।
उन्होंने अमेरिका द्वारा हिज़्बुल्लाह को आतंकी ग्रुप बताने पर कहा कि किसी आतंकी को यह अधिकार नहीं है कि वह बैठकर दूसरे लोगों को आतंकवादी बताये अमेरिका वैश्विक आतंकवाद का मुखिया है और ज़ायोनी सरकार आतंकवाद का जीता जागता रूप।
उन्होंने सीरिया युद्ध को अमेरिकी और सऊदी योजना का अंग बताते हुए कहा कि इस जंग का उद्देश्य इस्राईल को लाभ पहुँचाना था। हमने सीरिया सरकार से विचार विमर्श के बाद धीरे धीरे इस जंग में भाग लिया ताकि शत्रु के उद्देश्यों को असफल किया जा सके। उन्होंने कहा कि सीरिया में तकफ़ीरी आतंकवाद की कमर टूट गई है अब जबकि सीरिया में विजय निश्चित है अमेरिका अपने सैनिकों को भेजकर इस युद्ध का भागीदार बनना चाहता है जिसमे वह वर्षों तक आतंकवादियों का पालक पोषक रहा है।


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