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मानवाधिकार के संबंध में अमरीकी दोग़लापन और आतंकवाद का समर्थन, अमरीकी लक्ष्य को आगे बढ़ाने का हथकंडा

मानवाधिकार के संबंध में अमरीकी दोग़लापन और आतंकवाद का समर्थन, अमरीकी लक्ष्य को आगे बढ़ाने का हथकंडा

इस्लामी गणतंत्र ईरान में 6 तीर माह से 12 तीर माह अर्थात 27 जून से 3 जुलाई के बीच को अमरीकी मानवाधिकार सप्ताह क़रार दिया गया है।

यह नाम रखे जाने का कारण यह है कि यह तारीख़ें, ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के पहले दशक में ईरानी राष्ट्र के विरुद्ध कई मानवता विरोधी अपराध किए गये और आतंकवादी घटनाएं घटी हैं। इन घटनाओं में अमरीका परोक्ष व अपरोक्ष रूप से लिप्त रहा है। इस सप्ताह की पहली घटना, छह तीर 1360 बराबर 27 जून 1981 को सुप्रीम लीडर पर जानलेवा हमले से शुरू होती है। उसके बाद 7 तीर बराबर 28 जून को अमरीका समर्थित आतंकवादी गुट एमकेओ ने जम्हूरी इस्लामी पार्टी के मुख्यालय में बम धमाका किया।

छह साल बाद 7 तीर 1366 हिजरी शम्सी अर्थात 28 जून 1987 को भी सद्दाम शासन द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के दौरान ईरान के सीमावर्ती क्षेत्र पर रासायनिक बमबारी की गयी। इसके एक साल बात  12 तीर माह 1367 हिजरी शम्सी अर्थात 3 जुलाई 1988 को फ़ार्स की खाड़ी में मौजूद अमरीकी युद्धपोत से जानबूझकर ईरान के यात्री विमान पर हमला किया गया जो मानवता के माथे पर कलंक था। इन घटनाओं पर नज़र डालने से दो महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं? पहला यह है कि यह अपराध और आतंकवादी कार्यवाहियां किस लक्ष्य के तहत अंजाम दी गयीं, इससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि क्षेत्र और दुनिया में मानवता के विरुद्ध होने वाले ज़्यादातर अपराध अमरीकी हस्तक्षेप की वजह से अंजाम पाए हैं और वऑशिंग्टन किस दलील और तर्क की वजह से ख़ुद को मानवाधिकारों का रक्षक समझता है?

इन सवालों का जवाब हासिल करने के लिए हमको एक लंबी चौड़ी बहस करनी पड़ेगी लेकिन हम आपको इसका जवाब संक्षेप में बताने की कोशिश करेंगे और अमरीका की ईरान दुश्मनी और मानवाधिकार के खोखले दावे के विषय पर आपका ध्यान आकृष्ट कराएंगे।

27 और 28 जून 1981 का आतंकवादी हमला,ऐसी स्थिति में हुआ कि ईरान, इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के आरंभिक वर्षों में विभिन्न प्रकार के षड्यंत्रों का सामना कर रहा था और इराक़ द्वारा थोपे गये युद्ध से तो इसके आयाम और भी विस्तृत हो गए थे।  इन हालात में ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों ने देश के भीतर अशांति का माहौल बनाकर तथा महत्वपूर्ण हस्तियों की टारगेट किलिंग करके और बम धमाके करके इस्लामी शासन व्यवस्था को गिराने की साज़िश की। जैसे ही ये षड्यंत्र शुरू हुए अमरीका ने ईरान से दुश्मनी का खेल शुरू कर दिया।

उस संवेदनशील चरण में इराक़ के बासी शासन ने युद्ध क्षेत्र में मुंह की खाने के बाद जंग को नागरिक क्षेत्र की ओर ले जाने की कोशिश की और सरदश्त जैसे ईरान के शहरों पर रासायनिक बमबारी और मीज़ाइल हमले किए। बासी शासन ने यह हमले करके ईरान के संघर्षकर्ताओं और प्रतिरोधकर्ताओं के प्रतिरोध और उनके डटे रहने में विघ्न उत्पन्न करने का प्रयास किया। हमलावर सद्दाम शासन ने तेल टैंकरों पर हमला करके विदेशी सैनिकों के हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त किया। 12 तीर माह सन 1367 हिजरी शम्सी बराबर 3 जुलाई 1988 को फ़ार्स की खाड़ी में मौजूद अमरीकी युद्धपोत वेन्सन से जानबूझकर ईरान के यात्री विमान पर हमला किया गया।

अमरीका ने ईरान के यात्री विमान को निशाना बनाकर एसी स्थिति में यह अपराध किया है कि अमरीका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने स्वीकार किया था कि इस अपराधिक कृत्य का राजनैतिक लक्ष्य, युद्ध समाप्त करने के लिए अमरीका और इराक़ की शर्ते स्वीकार करने के लिए ईरान को मजबूर करना था। रासायनिक बमबारी करना, प्रतिबंधित हथियारों को इराक़ के हवाले करना और अमरीका तथा कुछ यूरोपीय देशों की अर्थपूर्ण चुप्पी ने अमरीका और उसके यूरोपीय घटकों के मानवाधिकारों के बारे में लंबे लंबे दावों की पोल खोल दी और पता चलता है कि पश्चिम मानवाधिकारों का केवल ढिंढोरा पीटता है।                                    

 विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियां वास्तव में मानवाधिकार को साफ़्ट वॉर की परिधि में दूसरे देशों पर दबाव डालने के हथकंडे के रूप में प्रयोग करते हैं ताकि अपने वर्चस्ववादी लक्ष्यों को हासिल कर सके। इस्लामी गणतंत्र ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पैग़म्बरी की आधिकारिक घोषणा के अवसर पर अपने बयान में वास्तविकता को उलटा दिखाने को दुश्मनों के साफ़्ट वॉर का हिस्सा क़रार दिया और सबसे बड़ा परमाणु भंडार रखना, अमरीका के परमाणु बम द्वारा 2 लाख 20 हज़ार लोगों का जनसंहार, सामूहिक हथियारों के ख़िलाफ़ होने का दावा और दाइश जैसे आतंकवादी गुट का अमरीका द्वारा समर्थन, आधुनिक मीडिया का साम्राज्य होने और साथ ही आतंकवाद से संघर्ष के दावे जैसा विषय, वास्तविकताओं को तोड़ मरोड़कर पेश करना है।

अमरीका के मानवाधिकारों को उजागर करने के लिए इस सप्ताह का नाम रखना, हमारे लिए इस बात की भूमिका प्रशस्त करता है ताकि अमरीकी शासन के मानवता विरोधी अपराधों का मुद्दा हमेशा मेज़ पर खुला रहे और अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, यमन, सीरिया जैसे विभिन्न देशों में बेगुनाह लोगों के जनंसहार तथा अपने ही देश के अश्वेत नागरिकों के बारे में हिंसक बर्ताव और अमरीका में नस्लभेद के विरुद्ध प्रदर्शन करने वालों का दमन, दुनिया के कानों तक पहुंचे और लोगों के सामने यह सारी बातें उजागर हों।

निसंदेह यह सारे अपराध और जुर्म और अमरीका समर्थित आतंकवाद की भेंट चढ़ने वाले लोगों की याद, कभी भी ईरानी राष्ट्र के मन से नहीं निकलेगी। अगर अमरीका और सद्दाम के सारे समर्थक, इन अपराधों में सद्दाम का साथ न देते तो न केवल सरदश्त में बल्कि हलब्चे में भी हज़ारों बेगुनाह लोग रासायनिक हथियारों की भेंट न चढ़ते।

तेहरान विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों के प्रोफ़ेसर और गार्जियन काउंसिल के क़ानूनी मामलों के सदस्य अब्बास अली कदख़ुदाई दोहरा मापदंड, अमरीका और पश्चिम का सौतेला बर्ताव शीर्षक के अंतर्गत एक लेख में लिखते हैं कि कुछ साल पहले सद्दाम शासन के युद्धोन्मादी अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि ईरानी जनता के विरुद्ध थोपे गये युद्ध के दौरान रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया और सबसे खेद की बात यह है कि यह प्रतिबंधित रासायनिक हथियार सैनिकों पर गिराए जाते और आम नागरिकों पर भी गिराए गये।

उनका कहना था कि सद्दाम द्वारा थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के दौरान सद्दाम शासन ने 378 बार ईरान की जनता पर रासायनिक हमले किए। उनका कहना था कि सद्दाम शासन ने बाने, मरीवान, सरदश्त, पीरान्शहर और सूमार जैसे ईरान के शहरों तथा इराक़ के हलब्चे, फ़ाव, जज़ाएर, मजनून सहित कई शहरों पर रासायनिक बमबारी की। बताया जाता है कि आंकड़ों के आधार पर इन हमलों में 50 हज़ार से अधिक लोग शहीद और घायल हुए।

अमरीका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी करके तथा ईरान के यात्री विमान पर मीज़ाइल हमला करके अपने जुर्म के इतिहास में कई पन्ने जोड़ लिए जबकि ईरान और इराक़ की जनता के ख़िलाफ़ सद्दाम शासन की रासायनिक बमबारी में शामिल होकर उसने मानवता की सारी हदों को पार कर दिया।

अलबत्ता यह कोई नई बात नहीं है कि अमरीका ने सामूहिक विनाश के हथियारों का प्रयोग किया हो बल्कि अमरीका ने पहली बार 1763 ईसवी में रेड इंडियन्स के विरुद्ध रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया था। रेड इंडियन्स ही अमरीका के मुख्य मालिक और हक़दार हैं।

अमरीका ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 5 हज़ार टन से ज़्यादा रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करके रासायनिक हथियार बनाए। आंकड़ों से पता चलता है कि अमरीका ने वियतनाम युद्ध में वियतनाम के नागरिकों और ग्रामवासियों पर साढ़े 7 करोड़ लीटर से ज़्यादा विषैले और रासायनिक पदार्थ गिराए और हज़ारों हेक्टेयर जंगलों को तबाह व बर्बाद कर दिया।

ऑरेंज या नारंगी रंग के रासायनिक पदार्थों के प्रभाव की वजह से वियतनाम में 3 लाख लोग काल के गाल में समा गये जबकि लाखों लोगों को अपंग होना पड़ा और बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं। वास्तव में अमरीका और कुछ यूरोपीय देश, मानवाधिकारों की वास्तविकताओं को फेर बदल कर इस विषय को स्वतंत्र देशों के विरुद्ध इस मुद्दे को हथकंडे के रूप में प्रयोग करते हैं।

दुनिया की वर्चस्ववादी शक्तियों ने आजकल मानवता विरोधी अपनी कार्यवाहियों को आर्थिक क्षेत्र में भी विस्तृत कर दिया है और वे आर्थिक आतंकवाद द्वारा ईरानी जनता के स्वास्थ्य और उसकी अर्थव्यवस्था को निशाना बना रहे हैं। इन अमानवीय कृत्यों का मामला इतना बढ़ गया है कि कोरोना के फैलाव के काल में भी सभी देशों ने एक दूसरे की मदद की ताकि इस घातक बीमारी को फैलने से रोका जा सके लेकिन अमरीका और पश्चिमी देशों ने इस मामले में भी ईरान के साथ दोहरा रवैया अपनाए रखा।

अमरीका और पश्चिमी देशों ने ईरान में कोरोना वायरस के फैलाव के काल में तेहरान की मदद करने के बजाए इस देश को दवाओं की सप्लाई भी रोक दी, यहां तक कि उन देशों को भी निशाना बनाया जिन्होंने इस महामारी के काल में तेहरान की मदद की, उन पर प्रतिबंध भी लगा दिया ताकि उन्हें तेहरान की मदद करने से रोक सकें। अमरीका  और पश्चिमी देशों ने दूसरे देशों को ईरान की मानवता प्रेमी कार्यवाहियों से रोका और यह इन देशों का मानवाधिकार के बारे में दोहरा बर्ताव है।


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