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भारत में फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों का बनता कल्चर, क्या कुछ लोगों की गिरफ़्तारी से रोकथाम संभव है?

भारत में फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों का बनता कल्चर, क्या कुछ लोगों की गिरफ़्तारी से रोकथाम संभव है?

भारत में अफ़वाहें कोरोना वायरस से कहीं अधिक तेज़ी से फैल रही हैं। सोशल मीडिया पर झूठे संदेशों की भरमार है। वायरस की कैसे और कहां से शुरूआत हुई, इसे फैलाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है और इसके पीछे क्या क्या साज़िशें हो रही हैं, यह सब पता लगाने के लिए और इस पर ज्ञान बांटने के लिए लोग व्हाट्सएप और फ़ेसबुक का सहारा ले रहे हैं।

दूसरी तरफ़ समस्या के स्रोत से निपटने के बजाय, पुलिस बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कर रही है। पुलिस के इस रवैये से स्पष्ट है कि मानवाधिकारों को नज़र अंदाज़ किया जा रहा है और अफ़वाहों को निंयत्रण करने में राज्य और केन्द्र सरकारें बुरी तरह से नाकाम हो गई हैं।

मिज़ोरम में सोशल मीडिया पर एक फ़ेक सर्कुलर साझा करके राज्य के बाहर रहने वालों से कहा गया कि वे तुरंत अपने घरों को वापस लौट आएं। इस अफ़वाह के आरोप में कम से कम 15 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ओडिशा में फ़ेसबुक पर फ़ेक न्यूज़ पोस्ट करने के लिए एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया, जिसने राज्य से बाहर के एक व्यक्ति के बारे में कोरोना वायरस से संक्रमित होने की अफ़वाह फैलाई थी।

राजस्थान में कोविड-19 मामलों की संख्या पर भ्रामक डेटा पोस्ट करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया गया। देश भर में इस तरह के हज़ारों मामले सामने आ रहे हैं।

फ़्रांस प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, हाल ही में भारत में कोरोना वायरस के बारे में ग़लत सूचनाएं साझा करने और अफ़वाहें फैलाने के आरोप में 100 से भी ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि भारत में अभी तक "फ़ेक न्यूज़" का कोई क़ानून नहीं है, इसलिए अधिकांश मामले मौजूदा प्रावधानों जैसे कि भारतीय दंड संहिता और 1897 महामारी अधिनियम के तहत दर्ज किए गए हैं।

केवल महाराष्ट्र राज्य ने विशेष रूप से कोरोना वायरस से संबंधित आदेश पारित किए हैं। राज्य सरकार का कहना है कि वायरस से संबंधित किसी भी जानकारी के प्रसार से पहले सरकारी माध्यमों से उसकी पुष्टि करना ज़रूरी है।

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के अध्ययन के लिए रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक रासमस नील्सन का कहना है कि असामान्य परिस्थितियों में असाधारण उपायों की ज़रूरत होती है, लेकिन यह उपाय आज़ाद और विश्वसनीय सूचनाओं के लिए सकारात्मक निवेश होने चाहिएं न कि इन उपायों से ग़लत सूचनाओं को रोकने में तो कोई मदद नहीं मिले, बल्कि उनसे मौलिक अधिकार ही ख़तरे में पड़ रहे हों।

भारत में फ़ेक न्यूज़ और ग़लत अफ़वाहों का जैसे एक कल्चर सा बन गया है। इसकी एक असली वजह फ़ेक न्यूज़ फैलाने वालों को प्रभावशाली संगठनों और राजनीतिक पार्टियों का शरण हासिल है। आप एक व्यक्ति को रोकेंगे तो कोई दूसरा उसे अंजाम देने लगेगा। अगर माहौल ही ऐसा बन गया है तो यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।

हाल ही में आरएसएस और बीजेपी के कई नेताओं ने लोगों को सलाह दी थी कि कोरोना वायरस का मुक़ाबला करने के लिए गाय के गोबर और पेशाब का इस्तेमाल करें। व्हाट्सएप पर समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे और मांस से परहेज़ करने की सलाह जैसे संदेशों की बाढ़ सी आ गई है। इसी के साथ इस तरह का जमकर प्रचार किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन के दौरान ताली और थाली बजाने की अपील इसलिए की थी, क्योंकि इससे कंपन पैदा होगा, जिससे वायरस भाग जाएगा। इसी तरह यह भी दावा किया गया कि लाइट बंद करके दिया जलाने की अपील भी कोरोना वायरस को भगाने के लिए की गई थी।

इसी तरह से सोशल मीडिया और यहां तक कि मेन स्ट्रीम मीडिया पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ जमकर दुष्प्रचार किया गया कि वे जानबूझकर वायरस फैला रहे हैं, जिसके बाद देश भर में मुसलमानों पर हमले शुरू हो गए।

फ़ैक्ट चेकिंग साइट ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक और संपादक प्रतीक सिन्हा का कहना है कि "जब आप लोगों को गिरफ्तार करना शुरू करते हैं तो आप बग़ैर सोचे समझे लोगों को उठा लेते हैं। सोशल मीडिया के युग में आप कभी भी यह पता नहीं लगा सकते कि इसे किसने पोस्ट किया है।  आप पोस्ट करने वाले दो या तीन लोगों को चिन्हित करेंगे और उन्हें उठा लेंगे, लेकिन एक वायरल मैसेज को लाखों या करोड़ों बार फ़ॉर्वर्ड किया जाता है, क्या आप उन सबी को जेलों में ठूसेंगे। नहीं, आप कुछ ही लोगों को चुनेंगे और उन्हें जेल में डाल देंगे। कई बार आप राजनीतिक कारणों से केवल विरोधियों को निशाना बनाते हें।

लेकिन अगर झूठी सूचनाओं के प्रसार से सरकार को ही फ़ायदा पहुंच रहा हो तो फिर उनकी रोकथाम के लिए कौन क़दम उठाएगा? 


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