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भारत में कोरोना महामारी के बहाने मुसलमानों से छुटकारा पाने की एक बड़ी साज़िश

भारत में कोरोना महामारी के बहाने मुसलमानों से छुटकारा पाने की एक बड़ी साज़िश

भारत में मुसलमानों पर कोरोना वायरस महामारी फैलाने का आरोप लगाकर बली का बकरा बनाया जा रहा है।

पहले से ही बड़े पैमाने पर ज़ुल्म और भेदभाव का शिकार अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय इस महामारी के बाद नए सिरे से कट्टरपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों के निशाने पर है।

अंबरीन ख़ान एक नर्स हैं, जो पंजाब के एक अस्पताल में सेवा करती थीं। 10 अप्रैल को जब वे अस्पताल में अपनी शिफ़्ट के बाद घर वापस लौट रही थीं, तो उनके मोहल्ले में ही हिंदू भीड़ ने उनकी कार को घेर लिया, जो लोहे की रॉड और लाठी डंडों से लैस थी। उस भीड़ में कई तो ऐसे चेहरे थे, जिन्हें अंबरीन वर्षों से पहचानती थीं। लेकिन अब यह केवल हिंदू हिंसक भीड़ में बदल चुके थे और मिस ख़ान को लातों और घूसों से मार रहे थे और उनकी गाड़ी पर लोहे की रॉड से हमला कर रहे थे।


पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक़, भीड़ ने अंबरीन ख़ान को उनकी कार से नीचे खींच लिया और उनका शारीरिक शोषण किया। वे रहम की भीख मांगती रहीं और हमलावरों को अपना पहचान पत्र दिखाती रहीं, उन्होंने लोगों से कहा कि उनके पास लॉकडाउन के दौरान भी काम पर जाने की अनुमति है, लेकिन भीड़ ने ताना मारते हुए कहाः पाकिस्तान जाओ और वहां जाकर सेवा करो।

अस्पताल में मरीज़ों का धर्म और जात देखे बिना उनकी सेवा करने वाली अंबरीन अब बहुत ही डरी और सहमी हुई हैं। उनका कहना है कि उनकी जान को गंभीर ख़तरा है। क्योंकि उनके काम की वजह से कल तक जिन आंखों में उनके लिए सम्मान था, अब उन्हीं आंखों नफ़रत झलक रही है।

भारत में सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह को यूं तो काफ़ी लंबे समय से सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हाशिए पर रखा गया है। लेकिन 2014 में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन के बाद से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई और गहरी हो गई है। उसके बाद से लगातार मुसलमानों पर विभिन्न बहानों से हमले किए जा रहे हैं, लेकिन कोरोना वायरस ने नफ़रत की इस आग को और ज़्यादा भड़का दिया है।

24 मार्च को प्रधान मंत्री मोदी ने देश में कोरोना वायरस महामारी को फैलने से रोकने के लिए तीन हफ़्तों के लॉडाउन की घोषणा कर दी, उसके बाद उसे 19 दिनों के लिए और बढ़ा दिया। रातों-रात करोड़ों मज़दूर, भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का चक्का घुमाने वाले, बेरोज़गार हो गए। हालांकि महामारी से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी और तेज़ी से मोदी के ऊपर से जनता का भरोसा उठता जा रहा था, लेकिन कोरोना वायरस महामारी ने जैसे उन्हें जीवनदान दे दिया, इसलिए कि समस्त असुविधाओं और समस्याओं के लिए मुसलमानों को बलि का बकरा बना दिया गया।

कट्टरपंथी हिंदुओं का कहना है कि मुसलमान जानबूझकर कोरोना वायरस फैला रहे हैं, ताकि बहुसंख्यक हिंदुओं के ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ सकें। नई दिल्ली स्थित राजनीतिक टीकाकार ज़ैनब सिकंदर का कहना है कि इस तरह की सोच को न केवल सामान्य बनाया जा रहा है, बल्कि बीजेपी सरकार द्वारा मुसलमानों के ख़िलाफ़ उसे जमकर प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इस नफ़रत और भेदभाव के रथ पर बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय जैसे राजनेता सवार हैं। मार्च में मालवीय ने ट्वीट किया: दिल्ली का घुप अंधेरा फट रहा है! पिछले तीन महीनों में दिल्ली ने इस्लामी बग़ावत देखी, पहले सीएए विरोधी धरना प्रदर्शनों के बहाने शाहीन बाग़ से लेकर जामिया तक, जाफ़राबाद से लेकर सीलमपुर तक। और अब मर्कज़ में कट्टरपंथी तब्लीग़ी जमात का अवैध जमावड़ा। इसे ठीक करने की ज़रूरत है!

भारत के समाचार टीवी चैनल जो पहले से ही मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए बदमान हैं, तुरंत मैदान में कूद पड़े। एंकरों ने जमातियों पर "जानबूझकर" वायरस फैलाने का आरोप लगाया। उन्हें "वायरस विलेन" और "मानव बम" तक कहा। इसी विषय पर प्राइम-टाइम समाचार और विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए गए, ताकि कोरोना वायरस के मुस्लिम चरित्र को स्थापित किया जा सके। यहां तक कि एक बॉलीवुड स्टार की बहन और मोदी भक्त रंगोली चंदेल ने मुसलमानों को गोली मार देने तक की अपील कर डाली।

भारत की स्टार रेसलर और बीजेपी नेता बबीता फोगाट ने भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरा ट्वीट करते हुए कहा था कि कोरोना वायरस से बड़ी समस्या तबलीग़ी जमात वायरस है, हमें पहले इससे निपटना होगा।

मेरठ में कैंसर के एक अस्पताल ने मुसलमान मरीज़ों का इलाज करने से इनकार कर दिया तो अहमदाबाद के एक अस्पताल में कोरोना के मुसलमान मरीज़ों को हिंदू मरीज़ों से अलग एक वार्ड में रखा गया। बीजेपी नेताओं ने भी कोरोना वायरस महामारी के बहाने जमकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ आग उगली।

इससे पहले भी मुसलमानों पर आतंकवाद के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप लगाकर उन्हें परेशान किया जाता रहा था, लेकिन शायद ही इतने खुलकर उनके ख़िलाफ़ नफ़रत का इज़हार किया गया हो। आज जीवन के हर पहलू में स्पष्ट रूप से भेदभाव देखा जा सकता है। सहकर्मियों और पड़ोसियों द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, धर्म के कारण नौकरियों और मोहल्लों से उन्हें बाहर किया जा रहा है। मुसलमानों का भविष्य धुंधला दिखाई दे रहा है और आम लोग डरे हुए हैं।

मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का व्यापक प्रभाव पहले से ही देश भर में देखने को मिल रहा है। उदाहरण के लिए कई शहरों के आवासीय क्षेत्रों में मुसलमानों के प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव लव अग्रवाल, जो दैनिक कोरोना वायरस अपडेट देते हैं, इस बात पर ज़ोर देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत में वायरस फैलाने के लिए मुसलमान ज़िम्मेदार हैं।

इस साल दिल्ली में मुस्लिम विरोधी हिंसा की लहर के बाद यह सब और अधिक चिंताजनक है। मुसलमानों को अपमानित किया जा रहा है और उनके मूल अधिकारों से वंचित करने की एक बड़ी साज़िश रची जा रही है। कुछ लोगों ने चेतावनी दी है कि जो परिस्थितियां बन रही हैं, उनके नतीजे में बड़े पैमाने पर मुसमलानों का नरसंहार किया जा सकता है। द स्टार ऑफ़ मैसूर मुसलमानों का ज़िक्र करते हुए एक संपादकीय लिखा कि "ख़राब सेबों द्वारा उत्पन्न की गई समस्या से छुटकारे का आदर्श समाधान उनसे छुटकारा पाना है।"


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