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भारत भी कर रहा है तालेबान से बातचीत और कुछ वजहों से यह है स्वागत योग्यः वाशिंग्टन पोस्ट

भारत भी कर रहा है तालेबान से बातचीत और कुछ वजहों से यह है स्वागत योग्यः वाशिंग्टन पोस्ट

पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने वाशिंग्टन पोस्ट में एक लेख लिखा है जिसमें उनका कहना है कि बीस साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि तालेबान और अमरीका के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होंगे।

इसी तरह इस समय यह यक़ीन करना मुश्किल है कि भारत जैसा लोकतांत्रिक देश लोकतंत्र से नफ़रत का इज़हार करने वाले तालेबान से बातचीत कर रहा है।

हालिया दिनों मीडिया में यह रिपोर्टें आईं कि भारत और तालेबान के बीच गुप्त संपर्क है हालांकि भारतीय अधिकारी इस बारे में खुलकर बयान नहीं दे रहे हैं मगर कुछ बड़े कारण हैं जिन्हें देखते हुए लगता है कि दोनों के बीच संपर्क है।

हामिद मीर के अनुसार तालेबान से भारत के संपर्क का पुराना इतिहास है और इस चीज़ से पाकिस्तान को परेशानी है जो अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका को समेटना चाहता है। भारतीय अधिकारियों ने पहली बार तालेबान से संपर्क 2013 में किया जब नई दिल्ली ने तालेबान नेता अब्दुस्सलाम ज़ईफ़ को विचार विमर्श के लिए भारत बुलाया। ज़ईफ़ अतीत में पाकिस्तान में तालेबान के राजदूत का कार्यभार संभाल चुके हैं। मगर 11 सितम्बर के हमलों के बाद पाकिस्तान सरकार ने ज़ईफ़ को गिरफ़तार कर लिया और उन्हें अमरीका के हवाले कर दिया। उसके बाद ज़ईफ़ ने 2010 में भारत में अपनी किताब प्रकाशित की तालेबान के साथ मेरा जीवन।

इसके बाद ज़ईफ़ का नाम संयुक्त राष्ट्र संघ की आतंकवादियों की सूची से निकाल दिया गया। ज़ईफ़ भारत यात्रा के लिए क्यों तैयार हुए और भारत ने उन्हें इसकी अनुमति क्यों दी? इसके जवाब मे हामिद मीर का कहना है कि 11 सितम्बर के बाद तालेबान के बारे में पाकिस्तान का स्टैंड बदला तो यह बात तालेबान को पसंद नहीं आई। ज़ईफ़ ने अपनी किताब में पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के बारे में लिखा कि उनके यहां एक मुंह में दो ज़बानें हैं। उनके एक सिर पर दो चेहरे लगे हैं ताकि वह हर किसी से उसके हिसाब से बात करें और सबको धोखा दें।

तालेबान के नेता अब्दुल ग़नी बरादर को 2010 में पाकिस्तान में गिरफ़तार कर लिया गया। यह गिरफ़तारी नया मोड़ साबित हुई। बरादर के पूर्व अफ़ग़ान राष्ट्रपति करज़ई से संबंध थे जो ख़ुफ़िया तौर पर रूस, ईरान और भारत पर ज़ोर दे रहे थे कि वह तालेबान के साथ वार्ता शुरू करें। पाकिस्तान को करज़ई से बरादर का संपर्क पसंद नहीं आ रहा था इसलिए उन्हें गिरफ़तार कर लिया गया। इसके बाद तालेबान ने नाराज़ होकर रूस, ईरान और भारत के साथ अपने संपर्क चैनल खोल लिए। तालेबान ने रूस और भारत को यह यक़ीन दिलाया कि दाइश का रास्ता केवल तालेबान ही रोक सकते हैं।

भारत इसलिए तालेबान से संपर्क करने में दिलचस्पी लेने लगा क्योंकि अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी तालेबान के ख़िलाफ़ कोई मज़बूत संयुक्त मोर्चा बना पाने में नाकाम रहे।

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है अब अगर तालेबान से अपने रिश्ते सुधारने के लिए भारत ठोस क़दम नहीं उठाता है तो उसका सारा निवेश बर्बाद हो जाएगा। ख़ुद अमरीका ने भारत को तैयार किया कि वह तालेबान से बात करे। भारत के अधिकारी अपनी इस चिंता के बारे में बता चुके थे कि अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने के बाद कश्मीर में अलगाववाद की लहर और भी तेज़ होगी।

तालेबान ने कहा है कि वह कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। वैसे तालेबान को यह पता था कि भारत अशरफ़ ग़नी सरकार की सैनिक मदद कर रहा है और इस बारे में उन्होंने भारत को चेतावनी भी दे दी थी।

पाकिस्तान में लोगों का यह ख़याल है कि तालेबान से भारत का संपर्क इस्लामाबाद को कूटनैतिक पटल पर अफ़ग़ानिस्तान से आउट करने की नई दिल्ली की योजना है। भारत पहले तालेबान को आतंकी कहता था मगर अब अफ़ग़ानिस्तान में हालात बदले नज़र आ रहे हैं।

हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल ही में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में सबसे बड़ी शिकस्त भारत की हुई है मगर अब इस बात को सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध शुरू न हो।

अगर भारत तालेबान से बात कर रहा है तो यह अफ़ग़ानिस्तान की स्थिरता के लिए अच्छा है और पाकिस्तान को भी चाहिए कि इस प्रक्रिया में मदद करे।


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