?>

भारत को कोविड-19 के बढ़ते केस के बीच ऑक्सीजन की घातक कमी का सामना क्यों हैॽ

भारत को कोविड-19 के बढ़ते केस के बीच ऑक्सीजन की घातक कमी का सामना क्यों हैॽ

भारत के, नाकाफ़ी फ़न्ड की समस्या से जूझते स्वास्थ्य सिस्टम के बीच, मेडिकल ऑक्सीजन में कमी के कारण पर नज़र

कोरोना वायरस के ख़तरनाक हद तक बढ़ते केस ने भारत के ख़स्ताहाल स्वास्थ्य इन्फ़्रास्ट्रक्चर और ऑक्सीजन की लंबे समय से कमी को जगज़ाहिर कर दिया, जो कोविड-19 के गंभीर रूप से मरीज़ों के इलाज के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

ऑक्सीजन की आपूर्ति में अत्यंत कमी के बीच, भारत का कोविड-19 की नई लहर से संघर्ष करने का मतलब, मुनाफ़ाख़ोरों की चांदी, हालांकि कुछ युवा स्वयंसेवी सोशल मीडिया पर लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

कोविड के मरीज़ों के लिए ऑक्सीजन क्यों इतनी ज़रूरीॽ

कोविड-19 के गंभीर मरीज़ों के लिए जिन्हें हाइपॉक्सीमिया की मुश्किल है, जिसमें ख़ून में ऑक्सीजन का लेवल कम हो जाता है, ऑक्सीजन थ्रेपी जीवनदान की तरह है।

कम्युनिटी हेल्थ स्पेशलिस्ट रजीब दासगुप्ता ने एएफ़पी न्यूज़ एजेंसी को बतायाः “कुछ क्लीनिकल स्टडीज़ में यह बात देखी गयी कि अस्पताल में कोविड-19 के भर्ती होने वाले क़रीब एक चौथाई मरीज़ों और आईसीयू के दो-तिहाई मरीज़ो को ऑक्सीजन थ्रेपी की ज़रूरत होती है। इसलिए अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई का सिस्टम होना ज़रूरी है, क्योंकि यह बामारी ख़ास तौर पर फेफड़ों को नुक़सान पहुंचाती है।”

क्या भारत काफ़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्पादन करता हैॽ

एक शब्द में इसका जवाब हां है।

टीकाकारों का कहना है कि 1.3 अरब की आबादी वाला भारत, हर दिन 7000 टन ऑक्सीजन का उत्पादन करता है जो काफ़ी है। इसका बड़ा भाग औद्योगिक इस्तेमाल के लिए होता है, लेकिन इसका रुख़ स्वास्थ्य उद्देश्य के लिए मोड़ा जा सकता है।

ट्रांस्पोर्ट और भंडार करने में रुकावटें

तरल ऑक्सीजन को कम टम्प्रेचर पर क्रायोजेनिक टैंकर्ज़ में डिस्ट्रीब्यूजर्ज़ को भेजा जाता है, जो इसे सिलेंडर भरने के लिए गैस में बदलता है।

लेकिन भारत के पास क्रायोजेनिक टैंकर्ज़ की कमी है। इस तरह के विशेष टैंकर्ज़ जब भरे होते हैं, तो उसे सुरक्षा कारणों से सड़क के ज़रिए पहुंचाया जाता है, हवाई जहाज़ से नहीं।

भारत में ऑक्सीजन के ज़्यादा तक उत्पादक पूरब में हैं, जबकि इसकी बढ़ती मांग वित्तीय केन्द्र मुंबई सहित पश्चिमी शहरों में और उत्तर में राजधानी दिल्ली में हैं।

क्या हो रहा हैॽ

सरकार मोबाइल ऑक्सीजन प्लांट और टैंकर्ज़ आयात कर रही है। 500 से ज़्यादा नए प्लांट लगा रही और पोर्टेबल ऑक्सीजन कन्सनट्रेटर्ज़ ख़रीद रही है।

सरकार ने उद्योगों को तरल ऑक्सीजन के इस्तेमाल से रोक दिया है।

दूसरे देशों से लिक्विड ऑक्सीजन, क्रायोजेनिक टैंकर्ज़, कन्सन्ट्रेटर्ज़ और वेन्टिलेर्ज़ की शक्ल में आपात मेडिकल मदद हवाई जहाज़ से पहुंचायी जा रही है।

ज़मीनी हक़ीक़त क्या हैॽ

सप्लाई, ट्रांस्पोर्ट और भंडारण बढ़ाने के उपाय के बावजूद, उन जगहों पर ऑक्सीजन की कमी का असर दिखने में आ रहा है जो सबसे ज़्यादा कोविड-19 की चपेट में हैं।

इस तरह की रिपोर्टें सामने आयी हैं कि अस्पताल मरीज़ों के घर वालों से अपने अपने ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतेज़ाम ख़ुद करने के लिए कह रहे हैं और ऑक्सीजन की कम सप्लाई की वजह से मरीज़ मर रहे हैं।

सोशल मीडिया ऐसी पोस्टों से भरे हुएं हैं जिनमें हताश परिवार सिलेंडर और रिफ़िल की कोशिश में लगे हुए हैं।

इस बीच सिलेंडर और कन्सन्ट्रेटर्ज़ की कालाबाज़ारी बढ़ गयी है। ये चीजें ख़ुद्रा मूल्य से बहुत ज़्यादा क़ीमत पर बेचे जा रही हैं।

नई दिल्ली में सप्लाई में कमी की वजह से लोगों में हताशा व क्रोध है।

सेल्स इक्ज़ेक्यूटिव प्रभात कुमार ने एएफ़पी से कहाः “सरकार ने वक़्त पर योजना नहीं बनायी। अगर पहले से तय्यारी की होती तो हम बेड और ऑक्सीजन के लिए इस तरह परेशान न होते।” (साभारः अल्जज़ीरा)


अपना कमेंट भेजें

आपका ईमेल शो नहीं किया जायेगा. आवश्यक फ़ील्ड पर * का निशान लगा है

*