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भारतीय किसानों का नया कारनामा, अन्नदाता अब बना रोज़गारदाता, मोदी ने छीना किसानों ने दिया

भारतीय किसानों का नया कारनामा, अन्नदाता अब बना रोज़गारदाता, मोदी ने छीना किसानों ने दिया

भारत की राजधानी दिल्ली के बोर्डरों पर किसानों का आंदोलन चल रहा है। हज़ारों की संख्या में किसान वहां कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ धरना दे रहे हैं, लेकिन उनकी रोज़मर्रा की जरूरतें भी हैं। वहां चल रही दुकानों में बहुत से लोगों को रोज़गार भी मिला है।

भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार के बाद से लगातार बेरोज़गारी बढ़ रही है। हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई थी जिसके अनुसार पिछले 70 वर्षों में इस समय भारत में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी है। वहीं पिछले 70 वर्षों में अब तक का सबसे बड़ा किसान आंदोलन भी भारत में चल रहा है। किसान अन्नदाता कहे जाते हैं और इसकी वजह उनके द्वारा की जाने वाली खेती है, लेकिन अब भारत का किसान बेरोज़गारों को रोज़गार भी देने लगा है। काफ़ी दिनों से रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहे एक व्यक्ति ने बताया कि उसे किसान आंदोलन में खाना बनाने, बर्तन धोने और अन्य कामों के बदले 500 रुपये दिहाड़ी मिलती है। वह कहता है कि जैसे ही उसके गांव के युवाओं को पता चला कि किसान आंदोलन में रोज़गार भी मिल रहा है वह दिल्ली की सीमाओं पर आयोजित किसान आंदोलन में पहुंच गए और देखते ही देखते सभी युवाओं को रोज़गार मिल गया। इन्हीं युवाओं में से उत्तरप्रदेश के शामली ज़िले के निवासी शेखर शर्मा जो पहले एयरपोर्ट पर नौकरी करते थे बताते हैं कि, कोरोना काल में उनको नौकरी से निकाल दिया गया था जिसके बाद बाद वह बेरोज़गार हो गए थे, लेकिन किसान आंदोलन में उन्हें रोज़गार मिला और वह अब यहां रोज़ की दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आगे बताया, "मैं बीते तीन साल से एयरपोर्ट पर काम करता था, लेकिन कोरोना काल में कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया। घर में पिता नहीं है। मेरी मां और भाई हैं, उनका ध्यान रखने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा।"

शेखर शर्मा ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी किसान आंदोलन से ही अपना घर चला रहे हैं। बीते 82 दिनों से कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन जारी है। ऐसे में हर कोई अपने हिसाब से आंदोलन का हिस्सा बन रहा है। कोई लंगर की सेवा देकर आंदोलन का हिस्सा है तो कोई यहां काम करके, लेकिन कुछ लोगों के लिए आंदोलन उनके घर के अन्य लोगों के पेट पालने का सहारा बना हुआ है। दरअसल किसान आंदोलन में पहले दिन से ही लंगर चल रहा है पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के किसानों ने आंदोलन स्थलों पर लंगर सेवा शुरू की हुई है। सभी किसान अपने साथ महीनों के हिसाब से राशन लेकर आए हैं और लगातार आना जारी है। सभी बॉर्डर पर रोज़ाना सैकड़ों किसानों और अन्य लोगों का खाना बनता है, जगह जगह लंगर सेवा चल रही है। लाखों लोगों का खाना आंदोलन स्थल पर बैठे किसान खुद ही बना रहे हैं, लेकिन कहीं बावर्चियों और मज़दूरों की भी मदद ली जा रही है। गाज़ीपुर बॉर्डर पर भी कुछ इसी तरह का नज़ारा है, जहां एक तरफ़ किसान ख़ुद ही लंगर चला रहे हैं, तो कुछ लंगरों पर बाहर से बावर्ची खाना बना रहे हैं, जिसके लिए उन्हें रोज़ाना के हिसाब से पैसे मिलते हैं।

उल्लेखनीय है कि, भारत की मोदी सरकार द्वारा तीन नए विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसान पिछले साल 26 नवंबर से इस देश की राजधानी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि सरकार और किसान संगठनों के बीच 12 दौर की वार्ता हुई, लेकिन सभी बैठकें बेनतीजा रहीं। जहां मोदी सरकार हमेशा की तरह अपने विवादित फ़ैसले पर अड़ी हुई है वहीं इस बार किसान भी अपनी मांगों को लेकर अड़े गए हैं। सरकार इन विवादित क़ानूनों को कुछ समय के लिए स्थगित करने और उसमें संशोधन करने की बात तो कर रही है, लकिन क़ानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है। मोदी सरकार के अड़ियल रवैये के कारण किसान दिल्ली के बोर्डरों से उठने का नाम नहीं ले रहे हैं, किसान संगठन साफ कर चुके हैं कि जब तक क़ानून वापसी नहीं तब तक घर वापसी नहीं। 


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