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बिहार के युवा मोदी से क्यों हैं नाराज़? तेजस्वी के आगे नीतीश का रंग क्यों पड़ता जा रहा है फीका? सटीक मुद्दों ने वादों को निकाली हवा!

बिहार के युवा मोदी से क्यों हैं नाराज़? तेजस्वी के आगे नीतीश का रंग क्यों पड़ता जा रहा है फीका? सटीक मुद्दों ने वादों को निकाली हवा!

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा का पहले चरण का मतदान पूरा हो चुका है और अब दूसरे चरण के मतदान के लिए तैयारी पूरे ज़ोरो-शोर से जारी है। वैसे दूसरे चरण का चुनाव प्रचार का समय भी समाप्त हो गया है पर पार्टियां अब भी अपने-अपने दांव-पेंच लगाने में व्यस्त हैं। बिहार चुनाव में के बात जो साफ दिखाई दे रही है वह है धर्म के रंग पर भारी पड़ता रोज़गार और विकास। लेकिन इन सबके बीच एक और प्रमुख मुद्दा है जिसको लगभग सभी पार्टियों ने भुला दिया है।

वैसे तो बिहार चुनाव कई प्रमुख मुद्दों पर लड़ा जा रहा है लेकिन इनमें से एक प्रमुख मुद्दा कृषि का है जिसे किसी भी राजनीतिक दल ने ज़ोरदार ढंग से फोकस नहीं किया है। यह स्थिति तब है जब बिहार की लगभग आधी आबादी खेती-बारी से जुड़ी है ऐसे में बिहार में कृषि सुधार जो एक सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा होना चहिये वही नहीं हुआ ऐसा क्यों? इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक अगर किसी मुद्दे को सत्ता व विपक्ष दोनों ओर से उछाला जाता तो वह है कृषि सुधार बिल। लोगों को बिल की जानकारी दोनों ही पक्ष अपने-अपने तरीक़े से देते अपने पाले में करने की कोशिश करते पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बता दें कि संसद में कुछ ही दिनों पहले कृषि सुधार बिल पास किया गया है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता, पूर्व उपमुख्यमंत्री व लालू प्रसाद यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव ने ज़ोरदार तरीक़े से इस बिल का विरोध किया। तेजस्वी व तेजप्रताप दोनों भाईयों ने इसके विरोध में ट्रैक्टर पर बैठ कर भारी समर्थकों के साथ प्रदर्शन भी किया था। इससे सत्ता पक्ष को भारी चुनौती मिलने के आसार थे। कांग्रेस भी इस मुद्दे को काफ़ी उछाल रही थी। लेकिन चुनाव के समय इस मुद्दे को भुला दिया गया। जानकारों का मानना है कि एनडीए जानबूझकर दूसरे मुद्दों को हवा देकर इस मुद्दे को चुनाव से ग़ायब कराने में कामयाब हो गई है, क्योंकि अगर नए कृषि क़ानून के मुद्दे को सही ढंग से बिहार चुनाव में उठाया जाता तो एनडीए को इससे काफ़ी नुक़सान पहुंचता।

वहीं दूसरी ओर बिहार चुनाव में पहली बार यह देखने को मिल रहा है कि जब जाति-धर्म-वर्ण से ज़्यादा बड़ा मुद्दा बेरोज़गारी है। भारतीय बुद्धिजीवियों की हमेशा से यह इच्छा रही है कि देश में चुनाव जाति-धर्म से ऊपर उठ कर बेरोज़गारी, महंगाई, अशिक्षा आदि पर लड़ा जाना चाहिए। इनमें से एक इच्छा इस बार उन बुद्धिजीवियों की ज़रूर पूरी होगी, क्योंकि इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक आम जनता का मुद्दा है बेरोज़गारी। कोरोना वायरस के संक्रमण, लॉकडाउन और प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी के बाद बिहार में बेरोज़गारी सबसे बड़ी समस्या बन कर उभर रही है। इस मुद्दे को विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल आरजेडी ने अपना हथियार बना लिया है। आपको बता दें कि लॉकडाउन और इसके बाद बिहार में देश भर से क़रीब 26 लाख युवा अपना रोज़ी-रोटी छोड़ कर लौट आये हैं, जो फिलहाल अपने राज्य में बेरोज़गार और तंगहाली में गुज़र बसर कर रहे है। तेजस्वी ने इन युवाओं के लिए एक वेबसाइट भी लांच की है, जिसमें पांच लाख से ज़्यादा बेरोज़गार युवाओं ने रजिस्ट्रेशन कर लिया है। तेजस्वी ने दावा किया कि आरजेडी सत्ता में आयी तो इनको रोज़गार देगी।

इस बीच जिस तरह महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार,तेजस्वी यादव ने रोज़गार पर अपना ध्यान केंद्रित किया है उसी तरह यह उम्मीद की जा रही थी कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी रोज़गार के मुद्दे को लेकर अपने रैलियों को संबोधित करेंगे। हालांकि मोदी के भाषणों में धारा 370,  पाकिस्तान और कश्मीर जैसे मुद्दे ही हावी रहे। इस बीच जबकि 15 वर्षों से बिहार में बीजेपी के साथ मिलकर नीतीश कुमार सत्ता में हैं तब भी नीतीश कुमार का कहना है कि अगर लोग एनडीए को सत्ता में लाते हैं तो बिहार का विकास होगा। उन्होंने ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार को एक विकसित राज्य बना देंगे, अगर जनता एनडीए को सत्ता में लाती है।" वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में लालू-राबड़ी कुशासन के 15 साल से लेकर अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की ज़्यादतर बातें गिनाते रहे, लेकिन ऐसा लगा कि उन्होंने अपने तीन चुनावी सम्मेलनों में रोज़गार और आजीविका के अवसरों जैसे मुद्दे को भूला दिया है। यह स्थानीय लोगों, ख़ासकर नौजवानों को रास नहीं आया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 15 वर्षों से तो आप सरकार चला रहे हैं तो इतने लंबे समय में आपकी सरकार ने क्या किया आप उसके बारे में क्यों नहीं बताते हैं। जानकारों के अनुसार, मोदी और नीतीश जानबूझकर लालू राज के 15 वर्षों की बातें करके आम लोगों को इस बात से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वह नीतीश कुमार के 15 वर्षों का हिसाब किताब न मांगे।

उल्लेखनीय है कि जिस तरह महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार,तेजस्वी यादव ने रोज़गार पर अपना ध्यान केंद्रित किया है,उम्मीद की जा रही थी कि उसी तरह मोदी भी रोज़गार के मुद्दे को लेकर अपने रैलियों को संबोधित करेंगे। तेजस्वी यादव की चुनावी सभा में भारी भीड़ के आकर्षित होने के पीछे की वजह यही माना जा रहा कि उन्होंने अपने गठबंधन के सत्ता में आने पर दस लाख रोज़गार देने का वादा किया है। बिहार की जनता भारतीय प्रधानमंत्री की तरफ़ से रोजगार के मुद्दे को दरकिनार किये जाने को लेकर सवाल कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी रैली में कहा, “बिहार को भी रोज़गार पाने और कारोबार करने का हक़ है। मगर,यह कौन तय करेगा? वे लोग,जो सरकारी नौकरी को रिश्वत कमाने का ज़रिया मानते हैं या वे लोग,जो बिहार में कारोबार को आसान करने और कौशल को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” एक नौजवान,रितेश कहते हैं कि मोदी के पास सरकारी नौकरी देने की कोई योजना तो है नहीं और वह अब हमें बताने चले हैं कि सरकारी नौकरी रिश्वत कमाने का एक तरीक़ा है। यह तो सरकारी नौकरियों के लिए कोशिश करने वाले हर नौजवान का अपमान है। 


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