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बाइडन के सामने बड़ी चुनौतियां तो हैं मगर बड़ा सवाल यह है कि ट्रम्प और उनकी लाल सेना क्या करने वाली है? हमें लगता है कि अमरीका का संकट और गहरा होगा!

बाइडन के सामने बड़ी चुनौतियां तो हैं मगर बड़ा सवाल यह है कि ट्रम्प और उनकी लाल सेना क्या करने वाली है? हमें लगता है कि अमरीका का संकट और गहरा होगा!

अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के सामने आने वाले चार वर्षों में कई बड़ी चुनौतियां हैं।

उन्हें बुरी तरह विभाजित हो चुके देश और समाज को एकजुट करना है, आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना है, घातक कोरोना वायरस के प्रसार पर अंकुश लगाना है, अमरीका की नाकाम साबित हो रही राजनैतिक व्यवस्था और लोकतंत्र में लोगों का विश्वास बहाल करवाना है, मध्यपूर्व से अमरीकी सेनाओं को वापस बुलाना है, यमन में सऊदी अरब की जंग रुकवाना है, चीन के तेज़ रफ़तार फैलाव को रोकना है, पुतीन के ख़तरे से निपटना है जिसे बाइडन सबसे बड़ा दुशमन मानते हैं, इसके अलावा ईरान के परमाणु समझौते में वापस लौटना है। इन सबके साथ साथ बाइडन को यह अनुमान भी लगाना है कि हारे हुए ट्रम्प वाइट हाउस से निकलने के बाद क्या करेंगे।

निर्वाचित राष्ट्रपति की गरदन पर बहुत भारी ज़िम्मेदारियां हैं और अमरीका के राजनैतिक पटल पर जारी उथल पुथल को देखते हुए यही लगता है कि बाइडन का रास्ता बहुत कठिन होगा लेकिन हमें यह आशंका भी है कि ट्रम्प जिन्होंने हार मानने से इंकार कर दिया और अब भी कहे जा रहे हैं कि वही विजेता हैं, अपने समर्थकों के साथ मिलकर विनाशकारी हरकतें शुरू कर सकते हैं।

ट्रम्प और बाइडन दोनों के पास एक दूसरे के ख़िलाफ़ इतने ज्वलंत मुद्दे हैं कि वह आग लगा देने की क्षमता रखते हैं। ट्रम्प जो स्कैंडलों के व्यक्ति माने जाते हैं क़ानूनी लड़ाई केवल चुनाव के नतीजों तक सीमित नहीं रखेंगे बल्कि हो सकता है कि वह एक टीवी चैनल खोलकर बैठ जाएं और उन सभी लोगों पर ज़ोरदार हमले करें जिन्होंने उन्हें धोखा दिया है। इनमें सबसे पहला नाम इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू का है जिन्होंने चुनावी कैंपेन के दौरान ट्रम्प के समर्थन में एक भी बयान नहीं दिया। ट्रम्प अपनी पार्टी के उन नेताओं पर भी हमले कर सकतें हैं जिन्होंने उन्हें वोट दने के बजाए बाइडन को वोट दिया और इसका एलान भी कर दिया। इसमें जार्ज बुश, जान बोल्टन, कोलिन पावेल और दूसरे कई जनरलों के नाम हैं।

जीत हासिल करने के बाद जो बाइडन ने संकल्प लिया कि वह अमरीका को एकजुट करेंगे और सारे अमरीकियों के राष्ट्रपति होंगे मगर संकल्प करना एक चीज़ है और उसे लागू कर पाना दूसरी बात है। ट्रम्प के अड़ियल समर्थक आसानी से बाइडन को अपना राष्ट्रपति मानने के लिए तैयार नहीं होंगे।

अमरीकी यहूदी बहुत चालाक निकले उन्होंने ट्रम्प के चुनावी कैंपने की अरबों डालर की मदद की लेकिन ख़ुद को दो ख़ैमों में बांट लिया। एक ख़ैमें ने वैचारिक रूप से ट्रम्प का समर्थन किया और दूसरे ने बाइडन को यहूदियों का 77 प्रतिशत वोट दिलवा दिया। नेतनयाहू ने तो ग़द्दारी का सबसे भयानक रुप पेश किया और बाइडन को मुबारकबाद देने वालों में दूसरों से आगे निकल गए।

दो प्रकार के मामले और दस्तावेज़ हैं जो आने वाले सालों में सबको चौंका देंगे।

एक मामला तो सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या कांड से जुड़ा है जिससे संबंधित दस्तावेज़ों पर ट्रम्प ने पर्दा डाले रखा। इसी तरह वह दस्तावेज़ भी सामने आ सकते हैं जो सऊदी इंटेलीजेन्स के वरिष्ठ अधिकारी सअद अलजब्री अमरीका ले गए हैं। उनके पास ट्रम्प और मुहम्मद बिन सलमान के बीच संबंधों और व्यापार से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज़ बताए जाते हैं।

दूसरा मामला उन दस्तावेज़ों का है जो ट्रम्प के पास मौजूद हो सकते हैं और जिन्हें वह बाइडन के ख़िलाफ़ प्रेशर टूल के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि ट्रम्प को नेतनयाहू पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा है और वह नेतनयाहू की बेइज़्ज़ती करने के बारे में सोच रह हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन, तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, उत्तरी कोरिया के शासक किम जोंग उन और सऊदी नरेश व क्राउन प्रिंस ने अब तक बाइडन को मुबारकबाद नहीं दी है। हर एक की अपनी अलग वजह है। इन नेताओं से जुड़े मुद्दे वह हैं जो नए राष्ट्रपति की विदेश नीति और विदेशी विवादों का प्रारूप तय करेंगे।

इस बार के चुनावों से अमरीका गहरे घाव लेकर बाहर निकला है, जातीय, वैचारिक और नस्लीय रूप से देश इस तरह बट चुका है कि उसे एकजुट कर पाना बहुत कठिन है। ट्रम्प के चार साल के शासन ने जो घाव लगाए हैं वह अनुमान से कहीं ज़्यादा गहरे हैं। अमरीका का संकट अब और भी गंभीर चरण में पहुंच रहा है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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