?>

बहरैन, फ़िलिस्तीनी काॅज़ का दूसरा ग़द्दार, फ़िलिस्तीन के साथ ही बहरैनी जनता के आंदोलन में आया नया मोड़

बहरैन, फ़िलिस्तीनी काॅज़ का दूसरा ग़द्दार, फ़िलिस्तीन के साथ ही बहरैनी जनता के आंदोलन में आया नया मोड़

ज़ायोनी शासन के साथ इमारात द्वारा संबंध स्थापित किए जाने के लगभग एक महीने बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने ही बहरैन और ज़ायोनी शासन के बीच संबंध स्थापना के समझौते की भी ख़बर दी है।

ट्रम्प ने 23 अगस्त को ज़ायोनी शासन के साथ इमारात के संबंध स्थापित होने के समझौते की सूचना दी थी। इस समझौते के बाद इस बात की अटकलें लगाई जा रही थीं कि बहरैन भी जल्द ही इस्राईल से संबंध स्थापित कर लेगा। मनामा और तेल अवीव के बीच संबंध स्थापना के समझौते में कुछ बातें ध्यान योग्य हैंः

  • इस समझौते की घोषणा अरब लीग की बैठक के दो ही दिन बाद कर दी गई। अरब संघ ने 9 सितम्बर की अपनी बैठक में न केवल यह कि इस्राईल से इमारत के संबंध स्थापित होने की आलोचना नहीं की बल्कि सांकेतिक रूप से उसका समर्थन भी किया। इस बैठक के बाद बहरैन-इस्राईल संबंधों के समझौते की घोषणा, अरब लीग की कमज़ोरी का खुला प्रमाण है।
  • इमारात-इस्राईल के बीच संबंध स्थापना के समझौते के विपरीत, जिसमें इमारात के युवराज मुहम्मद बिन ज़ायद ने दावा किया था कि यह समझौता, पश्चिमी तट को इस्राईल से जोड़ने की योजना को रद्द करने के बदले में किया गया है, मनामा-तेल अवीव के समझौते में सांकेतिक रूप से भी इस तरह का कोई इशारा नहीं किया गया है। इससे पता चलता है कि मुहम्मद बिन ज़ायद का दावा झूठा था और ज़ायोनी शासन ने इन समझौतों के बदले में इमारात व बहरैन को कुछ नहीं दिया है।
  • ज़ायोनी शासन के साथ बहरैन के समझौते की घोषणा भी इमारात-इस्राईल समझौते की तरह अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने की है। इससे पता चलता है कि इन अरब देशों के पास व्यवहारिक रूप से अपनी विदेश नीति के बारे में फ़ैसला करने की कोई स्वाधीनता नहीं है।
  • बहरैन व इस्राईल के बीच संबंध स्थापना का समझौता भी यह सिद्ध करता है कि इन छोटे अरब देशों के यह समझौते, कोई विशेष उपलब्धि नहीं रखते बल्कि यह राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की मदद के लिए हैं। आले ख़लीफ़ा का यह क़दम, ट्रम्प के लिए चुनावी तोहफ़ा है। अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव में दो महीने से भी कम वक़्त बचा है और अपने सत्ता काल में ट्रम्प विदेश नीति के क्षेत्र में कोई ख़ास उपलब्धि हासिल नहीं कर सके थे। बहरैन व इमारात के समझौते, ट्रम्प की विदेश नीति की उपलब्धियों के रूप में सामने आए हैं।
  • इमारात के विपरीत, बहरैन की अर्थव्यवस्था मज़बूत नहीं है और उसे अनेक आर्थिक समस्याओं का सामना है और इसी के साथ आले ख़लीफ़ा के विरोधियों की बहरैन में काफ़ी मज़बूत पकड़ है। 14 फ़रवरी 2011 से बहरैन में आले ख़लीफ़ा सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन चल रहा है। इस लिए आले ख़लीफ़ा सरकार, अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए अमरीका के आदेशों के पालन पर मजबूर है लेकिन दूसरी तरफ़ इस्राईल के साथ होने वाला यह समझौता उसके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है और बहरैनी जनता के आंदोलन में एक नया मोड़ आ सकता है।

इस आधार पर कहा जा सकता है कि बहरैन की सरकार ने ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापना का समझौता करके एक रणनैतिक ग़लती कर दी है और हो सकता है कि उसकी यह ग़लती, आले ख़लीफ़ा के शासन को हमेशा के लिए ख़त्म कर दे। एक अहम बात यह है कि बहरैन ने इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करके सऊदी अरब के लिए रास्ता और ज़्यादा साफ़ कर दिया है और संभव है कि रियाज़ और तेल अवीव के बीच संबंधों के सामान्य होने की घोषणा भी जल्द ही कर दी जाए। 


अपना कमेंट भेजें

आपका ईमेल शो नहीं किया जायेगा. आवश्यक फ़ील्ड पर * का निशान लगा है

*