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बग़दाद में सऊदी अरब और ईरान की ख़ुफ़िया वार्ता की रिपोर्टों के खंडन पर इतना ज़ोर क्यों? इतनी तेज़ इस दिशा में रियाज़ सरकार के जाने की वजह क्या है? क्या बड़ा नीतिगत बदलाव होने जा रहा है?

बग़दाद में सऊदी अरब और ईरान की ख़ुफ़िया वार्ता की रिपोर्टों के खंडन पर इतना ज़ोर क्यों? इतनी तेज़ इस दिशा में रियाज़ सरकार के जाने की वजह क्या है? क्या बड़ा नीतिगत बदलाव होने जा रहा है?

बीती शताब्दी के 70 के दशक में बुज़ुर्ग सऊदी पत्रकार तुर्की सुदैरी ने अलरियाज़ समाचार पत्र में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने सरकारी सऊदी मीडिया की आलोचना की थी कि सऊदी अरब और अरब जगत में घटने वाली घटनाओं की कवरेज का उसका तरीक़ा बहुत ख़राब है क्योंकि पत्रकार बड़ी बंदिश में काम करते हैं।

उन्होंने उस समय सऊदी मीडिया को खंडन मीडिया की संज्ञा दी थी। क्योंकि उस समय जब भी सऊदी अरब से जुड़ी कोई ख़बर बाहर आती थी तो सरकारी मीडिया उसके खंडन में जुट जाता था। सुदैरी ने यह लेख लिख तो दिया मगर फिर उन्हें नौकरी भी गवांनी पड़ी अलबत्ता एक साल तक सऊदी शाही ख़ानदान की नाराज़गी झेलने के बाद उन्हें दोबारा अपने दफ़तर में वापसी का मौक़ा मिल गया था।

हमें सुदैरी की याद इसलिए आ गई कि हम सऊदी अधिकारियों की ओर से लगातार खंडन की ख़बरें देख रहे हैं। वह ईरान और सऊदी अरब के अधिकारियों के बीच बग़दाद में होने वाली मुलाक़ात की रिपोर्टों का खंडन करने में जुटे हुए हैं। रिपोर्ट यह थी कि दोनों देशों के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के बीच बग़दाद में महत्वपूर्ण बैठक हुई है। सऊदी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व इंटेलीजेन्स चीफ़ ख़ालिद बिन अली अलहमीदान ने किया और ईरान के प्रतिनिशिमंडल का नेतृत्व इस देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली शमख़ानी ने किया। रोयटर्ज़, फ़्रांस प्रेस, फ़ायनैन्शियल टाइम्ज़ और कई अरब सरकारों ने इस मुलाक़ात की सूचना दी जिसके नतीजे में सुरक्षा समितियों के गठन पर सहमति बनी है। यह समितियां दोनों देशों के बीच लंबित लेबनान और यमन जैसे मामलों के समाधान के बारे में वार्ता को आगे बढ़ाएंगी।

सऊदी अरब अगर नियोम में नेतनयाहू और बिन सलमान की मुलाक़ात की रिपोर्टों का खंडन करे तब तो समझ में आने वाली बात है क्योंकि यह मक्का और मदीना की धरती है जिस पर नेतनयाहू से किसी भी मुलाक़ात को इस्लामी जगत सहन नहीं करेगा। मगर बग़दाद में ईरान और सऊदी अरब के बीच वार्ता का इतनी मेहनत से खंडन करने का कोई तुक समझ में नहीं आता।

जब अमरीका जैसी ताक़त यूरोपीय देशों के माध्यम से ईरान के साथ वार्ता कर रही है और ईरान के सामने अपना स्टैंड भी नर्म करने के इशारे दे रही है तो फिर सऊदी अरब इसी रास्ते पर क्यों नहीं चल सकता?

यह कोई राज़ तो नहीं है कि सऊदी अरब यमन युद्ध के दलदल में कूद पड़ा और इस युद्ध ने सऊदी अरब को थका मारा है। यमनी मिसाइल और ड्रोन अब सऊदी अरब के शहरों पर आग बरसा रहे हैं। सऊदी अरब ख़ुद को इस मुसीबत से निकालने के लिए रास्ता तलाश कर रहा है।

ईरानी अधिकारियों के साथ बग़दाद में बल्कि सऊदी अरब के भीतर मुलाक़ात करना और सभी लंबित मामलों के समाधान के लिए बातचीत एक नए सऊदी अरब की तसवीर पेश करती है जो अपनी अड़ियल नीतियों के चलते अब तक 700 अरब डालर से ज़्यादा की रक़म बर्बाद कर चुका है।

रिपोर्टें हैं अमरीका ने यूरोपीय देशों की मदद से ईरान को वार्ता के लिए तैयार किया है तो सऊदी अरब अगर इराक़ की मदद से यही काम कर रहा है तो इसमें बुराई क्या है?

हम इस मुलाक़ात का समर्थन करते हैं और आशा करते हैं कि यह सऊदी अरब की रणनीतियों में बुनियादी बदलाव की शुरूआत होगी।

ईरान मुस्लिम देश है वहां के लोग अल्लाह की इबादत करते हैं। इस देश के सुप्रीम लीडर का वंश भी अरब है जिसका संबंध पैग़म्बरे इस्लाम के ख़ानदान से है। ईरान एक क्षेत्रीय ताक़त है जो अपने बनाए हुए हथियारों से दुशमनों का मुक़ाबला करता है जिसने चालीस साल तक अमरीका की नाकाबंदी का डटकर सामना किया है। आज हालत यह है कि दुनिया की बड़ी ताक़तें उसे लुभाने की कोशिश में लगी हैं। अगर कोई ईरान से प्रतिस्पर्धा के बारे में सोचता है तो सबसे पहले चाहिए कि वह आत्म निर्भर बनने की कोशिश करे।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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