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फ़्रांसीसी राष्ट्रपति पर टूट पड़े अर्दोग़ान, बताया देश के लिए एक बोझ...क्या यूरोपीय प्रतिबंधों के एलान से पहले ही जवाबी हमला शुरू कर रहा है तुर्की? तुर्की-क़तर संबंधों के दायरे में इसका क्या है निहितार्थ?

फ़्रांसीसी राष्ट्रपति पर टूट पड़े अर्दोग़ान, बताया देश के लिए एक बोझ...क्या यूरोपीय प्रतिबंधों के एलान से पहले ही जवाबी हमला शुरू कर रहा है तुर्की? तुर्की-क़तर संबंधों के दायरे में इसका क्या है निहितार्थ?

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान ने फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां के ख़िलाफ़ बड़ा मोर्चा खोल दिया है। आया सोफ़िया मस्जिद में जुमे की नमाज़ अदा करने के बाद अर्दोग़ान ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मैं आशा करता हूं कि फ़्रांस को बहुत जल्द राष्ट्रपति मैक्रां के बोझ से निजात मिल जाएगी वरना येलो जैकेट प्रदर्शन रेड जैकेट प्रदर्शन में बदल जाएगा।

मैक्रां के ख़िलाफ़ अर्दोग़ान का आक्रोश समझ में आने वाली बात है। लीबिया, सीरिया, भूमध्यसागर और हालिया समय में कराबाख़ जैसे कई मुद्दों को लेकर दोनों राष्ट्रपतियों के बीच भीषण ज़ोर आज़माई हो रही है।

अर्दोग़ान के इस भयानक प्रहार का मैक्रां ने भी तत्काल जवाब दिया और तुर्क राष्ट्रपति से कहा कि इज़्ज़त से बात करें। उन्होंने अर्दोग़ान पर आरोप  लगाया कि तुर्क जनता की आज़ादी के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट अर्दोग़ान हैं।

इस स्तर पर इस तीव्रता के साथ जारी व्यक्तिगत शाब्दिक जंग उस समय छिड़ी है जब दोनों ही राष्ट्रपति, संकट में फंसे हुए हैं। अलबत्ता तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान का संकट ज़्यादा गंभीर है। क्योंकि वह एक साथ कई मोर्चों पर देश के बाहर भिड़े हुए हैं जबकि देश के भीतर भी उनके ख़िलाफ़ मज़बूत मोर्चा खुल गया है। उनके विरोधी दल एकजुट हो रहे हैं। अर्दोग़ान पर इन दलों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने देश के एक्सचेंज मार्केट का दस प्रतिशत शेयर 200 मिलियन डालर में क़तर की सरकार को बेच दिया। अर्दोग़ान के बेहद क़रीबी घटक रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री अहमद दाऊद ओग़लू की पार्टी इस्तेक़लाल ने देश के सबसे बड़े विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपल्ज़ पार्टी की आवाज़ से आवाज़ मिला दी है और इस डील पर बहुत तेज़ हमला किया है। यह हमला उस समय किया गया है जब तुर्की की अर्थ व्यवस्था पर कई तरफ़ से बहुत भारी दबाव पड़ रहा है जिसके नतीजे में तुर्क लीरे की क़ीमत तेज़ी से गिरी है और मुद्रा स्फीति की दर बढ़ गई है।

विदेशी मोर्चों की बात की जाए तो फ़्रांस और ख़ुद राष्ट्रपति मैक्रां व्यक्तिगत रूप से भी यूरोपीय संघ में तुर्क राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ पूरी तरह सक्रिय हैं। वह मांग कर रहे हैं कि यूरोपीय संघ तुर्की पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए क्योंकि यूनान और साइप्रस के साथ भूमध्यसागर में तुर्की के जो विवादित जलक्षेत्र हैं वहां कोई समझौता होने से पहले ही तुर्की ने तेल और गैस के भंडारों की खोज का काम शुरू कर दिया है। मैक्रां ने तुर्की के मुक़ाबले के लिए अपने युद्धक विमान, जंगी नौकाएं और सेनाएं यूनान भेज दीं।

इसमें तो कोई शक नहीं कि फ़्रांसीसी राष्ट्रपति पर यह तेज़ हमला करके इस्लामी जगत में अर्दोग़ान अपनी लोकप्रियता बढ़ा लेंगे क्योंकि मैक्रां ने पैगम्बरे इस्लाम की शान में गुस्ताख़ी की थी और अपमानजनक कार्टून के प्रकाशन का समर्थन किया था। मगर यूरोप की ओर से तुर्की की अर्थ व्यवस्थ पर जो प्रतिबंध लगने जा रहे हैं उनसे पहुंचने वाले नुक़सान और पैदा होने वाले ख़तरे की गंभीरता ज़्यादा है। दूसरी ओर सीरिया और लीबिया में अर्दोग़ान के ख़िलाफ़ लड़ाई तेज़ हो रही है और यह वह समय है जब जो बाइडन अमरीका की कमान संभाल रहे हैं। बाइडन को तुर्क राष्ट्रपति से किसी तरह की हमदर्दी नहीं है, वह उन कुर्द फ़ोर्सेज़ के पक्के समर्थक माने जाते हैं जो तुर्की से अलग होना चाहते हैं और जिन्हें अर्दोग़ान सरकार आतंकवादी कहती है।

आने वाले हफ़्तों और महीनों में अर्दोग़ान को कठिन हालात का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि फ़्रांसीसी राष्ट्रपति तुर्की से आयात और निवेश पर रोक लगवाने की कोशिश कर रहे हैं जो सालाना 100 अरब यूरो तक पहुंचता है।

पश्चिमी एशिया के इलाक़े में अर्दोग़ान की मित्र सरकारें उनसे मांग कर रही हैं कि कई मुद्दों पर वह अपनी क्षेत्रीय नीति पर पुनरविचार करें ताकि दुशमनों की सूची ज़रा कम हो और वह यूरोप के भारी दबाव का सामना कर सकें। मगर हाल में उनसे अंकारा में मुलाक़ात करने वाले एक इस्लामी स्कालर के अनुसार अर्दोग़ान इन सुझावों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अर्दोग़ान का मानना है कि आज़रबाइजान की तरह वह दूसरे मोर्चों पर भी आख़िरकार विजयी होकर निकलेंगे। अर्दोग़ान की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह केवल अपने मन की बात सुनते हैं और दूसरों की नसीहत सुनना उन्हें हरगिज़ पसंद नहीं है। यही वजह है कि अर्दोग़ान की आंतरिक और विदेशी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं और लीबिया और सीरिया में उन्हें लगातार नाकामियों का सामना करना पड़ रहा है। अगर फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े में क़तर और सऊदी अरब के बीच संधि करवाने की अमरीकी कोशिशें सफल हो गईं तो यहां भी अर्दोग़ान के लिए समस्याएं बढ़ जाएंगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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