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फ़िलिस्तीनी मिसाइलों में नेतनयाहू और उनके जनरलों के लिए क्या हैं चौंका देने वाले संदेश? क्या आयरन डोम की क़ब्र बनाने का समय आ गया है? यमन की तरह फ़िलिस्तीन में भी बदलने वाले हैं सारे समीकरण

फ़िलिस्तीनी मिसाइलों में नेतनयाहू और उनके जनरलों के लिए क्या हैं चौंका देने वाले संदेश? क्या आयरन डोम की क़ब्र बनाने का समय आ गया है? यमन की तरह फ़िलिस्तीन में भी बदलने वाले हैं सारे समीकरण

फ़िलिस्तीनी संगठनों के मिसाइल इस बार की लड़ाई में बैतुल मुक़द्दस तक पहुंचे और मंगलवार को ग़ज़्ज़ा पट्टी के उत्तर में स्थित एशदूद और असक़लान शहरों में १३७ मिसाइल गिरे जिन्होंने कई इमारतों को ध्वस्त कर दिया।

इन हमलों में कई ज़ायोनी मारे गए और दर्जनों घायल हो गए। बीस लाख इस्राईलियों को भूमिगत शरण स्थलों में जाकर छिपना पड़ा। यह फ़िलिस्तीनियों और इस्राईल की जंग में बहुत बड़ा बदलाव है।

हम यह कहना चाहते हैं कि फ़िलिस्तीनी संगठन विशेष रूप से हमास की क़स्साम ब्रिगेड इस बार की लड़ाई में सिज्जील नाम मिसाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं जिस पर वारहेड लगता है और भारी विध्वंसक शक्ति रखता है। यह गाइडेड मिसाइल है जो इस्राईली मिसाइल ढाल सिस्टम आयरन डोम को आसानी से डाज देता है। इसके अलावा भी बहुत सारे मिसाइल हैं जिनकी सूची काफ़ी लंबी है।

एश्दूद और असक़लान शहरों में पहुंचने वाले मिसाइल जो बहुत जल्द बिन गोरियन एयरपोर्ट तक भी पहुंचेंगे जैसा कि हमें फ़िलिस्तीनी संगठनों से जुड़े क़रीबी सूत्र ने बताया है नेतनयाहू, उनके जनरलों और यहूदी बस्तियों में रहने वालों के लिए ख़ास संदेश रखते हैं कि ग़ज़्ज़ा पट्टी पर होने वाले हर हमले और वहां के हर शहीद का इंतेक़ाम हम ज़रूर लेंगे। यह शुरुआत है आगे अभी और भी बहुत कुछ सामने आना बाक़ी है।

कुछ समय पहले तक फ़िलिस्तीनी संगठनों की स्ट्रैटेजी यह होती थी कि उनके हमलों में आम नागरिक न मारे जाएं बल्कि केवल सैनिकों को निशाना बनाया जाए और डराया जाए मगर अब दो वजहों से यह रणनीति बदल गई है। एक तो ईरान के नेतृत्व वाले प्रतिरोधक मोर्चे से ग़ज़्ज़ा पट्टी के फ़िलिस्तीनी संगठनों को बहुत सारे सटीक मिसाइल मिल गए हैं। दूसरी वजह इस्राईल को इस हालत में पहुंचाना है कि वह फ़िलिस्तीनी आम नागरिकों की हत्या करने के पहले हज़ार बार सोचे। ताकि २०१४ की लड़ाई की तरह अब फ़िलिस्तीनियों को भारी जानी नुक़सान न उठाना पड़े।

इस समय हमास का नेतृत्व और पालीसी मेकिंग प्रोसेस क़स्साम ब्रिगेड के हाथ में है। यहया सिनवार और मुहम्मद ज़ैफ़ अब रणनीति बना रहे हैं। यह सब इस समय भूमिगत वार रूम में मौजूद हैं और किसी भी तरह का इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम प्रयोग नहीं करते। उनकी संपर्क और सूचना प्रक्रिया बेहद जटिल है ताकि इस्राईल उनका सुराग़ न लगा सके।

धीरे धीरे चरम की ओर बढ़ रही इस लड़ाई में हर क़दम बहुत सोच समझ कर उठाया जा रहा है। अब अरब मध्यस्थों के लिए भी सारे दरवाज़े बंद कर दिए गए हैं क्योंकि साबित हो चुका है कि वह इस्राईल के हितों की सेवा करते हैं।

जेहादे इस्लामी संगठन के प्रमुख ज़ियाद नुख़ाला मध्यस्थों को बेनक़ाब कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि यह अरब मध्यस्थ नेतनयाहू की सरकार बचाने के लिए काम करते हैं और जब इस्राईल समझौतों की धज्जियां उड़ाता है तो ख़ामोश हो जाते हैं। नुख़ाला ने कहा है कि वह किसी भी अरब नेता की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि उनका संगठन एक ही सुराख़ से दो बार डसा जाना पसंद नहीं करता।

नेतनयाहू धमकियां दे रहे हैं, ग़ज़्ज़ा के इलाक़े के क़रीब टैंकों की लाइन लगा दी गई है लगता है कि वह  भी वही ग़लती दोहराने जा रहे हैं जो उनके पूर्ववर्ती एहूद ओलमर्ट ने की थी जब दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्लाह की ताक़त आंकने में उनसे भरी ग़लती हुई और इस्राईल को इतनी बड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा जिसे वह कभी नहीं भूलेगा।

नेतनयाहू की समझ में यह नहीं आ रहा है कि इस समय इंतेफ़ाज़ा आंदोलन की कमान उस नई नस्ल के हाथ में है जो इस्राईल से हर प्रकार के समझौते के ख़िलाफ़ है। इस नस्ल ने शहादत का रास्ता चुना है और अपमान के सारे बरसों का बदला चुकाने की ठान ली है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार


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