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पैग़म्बरे इस्लाम की पत्नी हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास की बरसी पर विशेष

पैग़म्बरे इस्लाम की पत्नी हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास की बरसी पर विशेष

बेसत का दसवां वर्ष और रमज़ान की दसवीं तारीख़ अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम के लिए दुख भरी थी, इस दिन हर क़दम पर पैग़म्बरे इस्लाम का साथ देने वाली उनकी जीवन साथी इस दुनिया से सिधार गई थीं।

ख़दीजा को भी इस बात पर विश्वास था। वास्तव में हज़रत ख़दीजा की श्रेष्ठा का कारण भी उनकी दूरगामी और खुली सोच थी, उन्होंने यह समझ लिया था कि मोहम्मद एक ऐसा सूर्य हैं जो दिल को उज्जवल करता है और अपने गुणों से मानवता को अर्थ प्रदान करता है। पैग़म्बरे इस्लाम से ख़दीजा का बेहद विनम्रतापूर्ण व्यवहार और उनकी महानता का सम्मान इतना अधिक था कि क़ुरैश की महिलाएं इसके लिए उनकी आलोचना करती थीं, इसलिए कि यह महिलाएं अमानतदारी, सच्चाई और नैतिक गुणों से अपरिचित थीं। एक समृद्ध महिला का एक ग़रीब पुरुष से विवाह का फ़लसफ़ा उनकी समझ से बाहर था। इसीलिए वे ख़दीजा पर कटाक्ष करती थीं और उन्हें दुख पहुंचाती थीं। इन समस्त नादानियों का जवाब, ख़दीजा के पास केवल यह था कि वे अपने पति के साथ रहकर प्रतिरोध करती रहें। वे आलोचकों से पूछती थीं, क्या कोई पूरे अरब में भलाई, अच्छे व्यवहार, गुणों और सज्जनता में मोहम्मद के समान है?

हालांकि उससे पहले ख़दीजा ने अपना जीवन का अधिकांश समय अज्ञानता के युग में बिताया था। लेकिन समस्त रुकावटों के बावजूद उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और इस्लाम के प्रारम्भिक छोटे से समूह में शामिल हो गईं। उनकी विशिष्टता सत्य को पहचानने और इस्लाम स्वीकार करने में सबसे आगे रहना है। ऐसे समय में कि जब लोग अज्ञानता के दौर की परम्पराओं में डूबे हुए थे, ख़दीजा ने समझदारी और बहुत तेज़ी से सत्य को पहचान लिया था। उस समय भी कुछ लोग समझ गए थे कि मोहम्मद सत्य हैं, लेकिन उनमें इसे स्वीकार करने का साहस नहीं था, हालांकि ख़दीजा ने पूरे साहस के साथ ग़लत परम्पराओं को पैरों तले रौंद दिया और एक साहसी महिला के रूप में प्रारम्भिक तीन वर्षों में कि जब इस्लाम का निमंत्रण गुप्त था, इस्लाम पर अपने ईमान को स्पष्ट कर दिया।

पैग़म्बरे इस्लाम को अपने प्रयासों एवं प्रयत्नों में ख़दीजा के सहयोग से हिम्मत मिलती थी। डा. बिन्तुश्शाती का कहना है कि क्या किसी पत्नी में इतनी योग्यता थी कि जब उसका पति हिरा ग़ुफ़ा से ऐतिहासिक दावत के साथ बाहर निकले तो उसके स्वागत के लिए आगे बढ़े और उसके दिल में इसकी ज़रा सी भी शंका न हो कि ईश्वर उसे अकेला छोड़ देगा। क्या हज़रत ख़दीजा के अलावा बहुत ही नाज़ और नख़रे का जीवन बिताने वाली कोई महिला ख़ुशी ख़ुशी अपने समस्त धन धौलत को नज़र अंदाज़ कर सकती है, ताकि अपने पति के साथ कठिन जीवन व्यतीत कर सके और सत्य की प्राप्ति में अपने पति का भरपूर सहयोग करे निःसंदेह हज़रत ख़दीजा ऐसी ही हस्ती थीं और अन्य महिलाएं ऐसी नहीं हैं।

हज़रत ख़दीजा ने अपनी आयु के अंतिम तीन साल मक्का शहर में शेबे अबू तालिब नामक स्थान में अन्य मुसलमानों के साथ परिवेष्टन में गुज़ारे। अंततः रमज़ान की दसवीं तारीख़ को इस महान महिला ने 65 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत ख़दीजा के निधन से इतने अधिक दुखी हुए कि उन्होंने कि उस साल का नाम दुख का साल रख दिया। दूसरी ओर हज़रत ख़दीजा के साथ गुज़ारे गए पलों और उनकी सेवाओं की मीठी यादें पैग़म्बरे इस्लाम के लिए इतनी मूल्यवान थीं कि उनका नाम हमेशा उनकी ज़बान पर रहता था। इस संदर्भ में तबरसी लिखते हैं, पैग़म्बर के दो भरोसेमंद साथी एवं सहयोगी ख़दीजा और अबू-तालिब एक ही साल में इस दुनिया से चले गए, इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम ने यह दो बड़े दुख झेले। ख़दीजा एक बुद्धिमान और साहसी सलाहकार थीं, जिनके अपार समर्थन और सहयोग से पैग़म्बरे इस्लाम ने बड़ी बड़ी कठिनाईयों का सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की।

पैग़म्बरे इस्लाम ने हमेशा अपनी इस पत्नी के बलिदान को याद रखा और उनकी प्रशंसा की। उनके निधन के बाद हज़रत ने रोते हुए फ़रमाया, ख़दीजा की तरह कोई महिला नहीं है, उन्होंने ऐसे समय में मेरी पुष्टि की, जब लोग झुटला रहे थे और ईश्वर की राह में मेरा समर्थन किया अपनी दौलत को इस्लाम की राह में ख़र्च किया, ईश्वर ने भी मुझे यह आदेश दिया कि मैं उन्हें यह शुभ सूचना दूं कि वे स्वर्ग में रहेंगी, जहां उन्हें किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं होगी।

हज़रत ख़दीजा ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में पैग़म्बरे इस्लाम से वसीयत करते हुए कहा, हे ईश्वरीय दूत, अगर मैंने आपके साथ कोई कमी की हो तो मुझे मांफ़ कर दीजिए। पैग़म्बर ने कहा, मैंने तुम्हारी ओर से कोई कमी नहीं देखी, तुमने अपना अथक प्रयास किया। मेरे घर में तुम्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, जबकि तुमने अपनी दौलत ईश्वर की राह में ख़र्च कर दी। ख़दीजा ने कहा, हे ईश्वरीय दूत, मेरी दूसरी वसीयत यह है कि मेरी बेटी फ़ातेमा का ख़याल रखना। इसलिए कि वह मेरे बाद अकेली और यतीम हो जाएगी। कहीं क़ुरैश के लोग उसे दुख न पहुंचाएं।

उन्होंने आगे कहा कि मेरी तीसरी वसीयत यह कि वहय या ईश्वरीय वाणी के समय जो वस्त्र आपने धारण किए हुए थे उसमें मुझे कफ़न दिया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम ने जब वह वस्त्र ख़दीजा को दिया तो वे बहुत प्रसन्न हुईं। जब उनका निधन हो गया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें ग़ुस्ल व कफ़न दिया। उस समय जिबरईल स्वर्ग से कफ़न लेकर पहुंच गए और उन्होंने कहा, हे ईश्वरीय दूत, ईश्वर ने आपको सलाम भेजा है और फ़रमाया है कि ख़दीजा ने अपनी दौलत हमारी राह में ख़र्च कर दी इसलिए उनके कफ़्न दफ़्न की ज़िम्मेदारी भी हमारी है।

निसंदेह हज़रत ख़दीजा की महत्वपूर्ण भूमिका के बिना इस्लाम के प्रारम्भिक इतिहास की समीक्षा अधूरी होगी। वे एक विशिष्ट एवं पवित्र महिला थीं, जिन्हें क़ुरैश की महत्वपूर्ण हस्तियों में गिना जाना था। ईश्वर ने उन्हें और भी उच्च स्थान प्रदान करना चाहा तो उनका परिचय पैग़म्बरे इस्लाम (स) से करवा दिया।

प्रसिद्ध इतिहासकारों ने सत्य, भलाई, मानवीय सद्गुणों और एक पवित्र महिला के रूप में उनकी प्रशंसा की है और उन्हें क़ुरैश की रानी का नाम दिया है। हज़रत ख़दीजा उच्च नैतिक गुणों से सुसज्जित थीं और उनकी वित्तीय स्थिति भी काफ़ी अच्छी थी। वे एक समृद्ध महिला थीं और व्यापारिक कारवानों को विभिन्न क्षेत्रों के लिए रवाना करती थीं। हालांकि पैग़म्बरे इस्लाम के पास अधिक धन नहीं था, लेकिन लोग अमीन या अमातदार कहकर बुलाते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम के इन गुणों को देखते हुए हज़रत ख़दीजा ने हज़रत अबू-तालिब के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और पैग़म्बर को अपने व्यापारिक कारवान का नेतृत्व सौंप दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने शाम की अपनी यात्रा के दौरान प्रबंधन की अपनी भरपूर योग्यता का प्रदर्शन किया और उनके कारवान ने अच्छा लाभ हासिल किया। इस प्रकार यह दो महान हस्तियां एक दूसरे से अधिक परिचित हुईं और परिणाम स्वरूप दोनों ने शादी कर ली।

हज़रत अबू तालिब ने निकाह के समय अपने भतीजे हज़रत मोहम्मद (स) का कुछ इस तरह से परिचय करवाया। मेरे भतीजे मोहम्मद की क़ुरैश के किसी भी व्यक्ति से तुलना की जाएगी तो सद्गुणों की दृष्टि से वह श्रेष्ठ है और हां उसके पास इस दुनिया की दौलत नहीं है, क्योंकि यह दौलत उस छाया की तरह है जो समाप्त हो जाती है, लेकिन उसके गुण और उसका मूल हमेशा बाक़ी रहेगा।


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