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पैग़म्बरे इस्लाम और इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत

पैग़म्बरे इस्लाम और इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत

पैगम्बरे इस्लाम और उनके पौत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम के स्वर्गवास का दिन है इस दिन पूरी दुनिया में मुसलमान अंतिम ईश्वरीय दूत का शोक मनाते हैं।

ईश्वर ने जब यह दुनिया बनायी तो यहां रहने के लिए जिस तरह से ज़रूरी हर चीज़ भी पैदा की वैसे ही इन्सानों के मार्गदर्शन का भी इंतेज़ाम किया। मार्गदर्शन की इसी ईश्वरीय श्रंखला की अंतिम कड़ी, पैग़म्बरे  इस्लाम  का 28 सफर सन 11 हिजरी को स्वर्गवास हो गया और इस तरह से मानव समाज के मार्गदर्शन के महा अभियान में वह अपनी भूमिका निभा कर चले गये।  मानवजाति का भलाई व सौभाग्य की ओर मार्गदर्शन करना इतना बड़ा दायित्व था जिसे ईश्वर ने उनके कंधे पर डाला और उन्होंने ने भी इस दायित्व को भलिभांति निभाया। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी शिक्षाओं से  पूरी दुनिया को प्रकाशमय किया और अज्ञानता के अधंकार से इन्सानों को मुक्ति दिलायी। इस नश्वर संसार से उनकी मुक्ति वास्तव में ईश्वरीय कृपा की एक कड़ी का अंत है और यह निश्चित रूप से मानव समाज के लिए एक बहुत बड़ा दुख है। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अगर कोई किसी दुख में ग्रस्त हो जाए तो उसे पैग़म्बरे इस्लाम के खोने का दुख याद करना चाहिए कि यह सब से बड़ा दुख है।

पैगम्बरे इस्लाम जब अंतिम सांसें ले रहे थे तो उस समय उनका सिर, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सीने पर था। हज़रत अली कहते हैः मेरे माँ-बाप आप पर न्योछावर हों। आपके स्वर्गवास से वह कड़ी टूट गयी जो दूसरों के जाने से नहीं टूटी थी और वह ईश्वरीय संदेश का आना  और ईश्वरीय मार्गदर्शन है। आपके स्वर्गवास की त्रासदी सबके लिए है और सब लोग आपके स्वर्गवास पर शोकाकुल हैं। यदि आपने धैर्य व संयम का आदेश न दिया होता और व्याकुलता से न रोका होता तो हम इतना रोते कि आंसुओं का सोता ख़त्म हो जाता। यह हृदय विदारक पीड़ा सदैव मेरे मन में बाक़ी रहेगी और मेरा दुख सदैव बाक़ी रहेगा। आप के वियोग में  यह मेरा रोना बहुत कम है मगर क्या किया जाए मौत को वापस नहीं किया जा सकता। मेरे माँ-बाप आप पर न्योछावर हों हे ईश्वरीय दूत! मुझे अपने ईश्वर के निकट याद कीजिएगा और भूलिएगा नहीं। 

 

आज हम  पैगंबरे इस्लाम  का शोक एसी दशा में मना रहे हैं  कि जब उनके प्रति दुश्मनियों  के बावजूद उनका तेज और उनकी शिक्षाओं का दायरा फैलता जा रहा है। पियो अनुसंधान केन्द्र ने सन 2010 में ही कहा था कि अगले 20 वर्षों में इस्लाम युरोप में सब से बड़ा धर्म बन जाएगा।

    वर्तमान समय में अधिकांश मुसलमान, दुनिया के 55 देशों में रहते हैं और उनकी जनंसख्या यथावत बढ़ रही है और यही चीज़, अज्ञानियों के लिए चिंताजनक है और जब उन्हें कुछ नहीं सुझायी दिया तो उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की पवित्र हस्ती को ही अनादर का निशाना बनाना शुरु कर दिया।

    हालिया महीनों में पश्चिमी पत्रिकाओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पैगंबरे इस्लाम का अनादर करने की कोशिश की। फ्रासं की चार्ली हेब्दू पत्रिका ने सन 2015 में पैग़म्बरे इस्लाम का अनादर करते हुए कुछ कार्टून छापे थे जिस पर पूरी दुनिया में प्रतिक्रिया प्रकट की गयी थी। इसी पत्रिका ने पहली सितंबर सन 2020 में एक फिर उन्ही अपमानजनक कार्टूनों को प्रकाशित किया ताकि पश्चिम में इस्लाम के फैलाव को रोका जा सके जिससे एक बार फिर साबित हो गया कि युरोपीय देशों में आधुनिक विकास के बावजूद मध्ययुगीन मानसिकता अब भी बाकी है। जाए। यही वजह है कि विज्ञान व तकनीक द्वारा भी अज्ञानता में डूबा समाज, अपनी अज्ञानता से बाहर नहीं निकल पाता क्योंकि ज्ञान विज्ञान उसके जीवन की शैली को व्यवस्थित नहीं करता बल्कि  उसकी आतंरिक इच्छाएं ही मापदंड होती  हैं।  यही वजह है कि भ्रष्टाचार  और रक्तपात पश्चिमी समाजों का अभिन्न अंग बन चुका है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अज्ञानता व्यापक अर्थ  में  यह है कि जीवन में मानवीय आक्रोश और आतंरिक इच्छाओं  का प्रभाव हो और उसके अंतर्गत काम किया जाए  इसे कहते हैं अज्ञानता। अज्ञानता अर्थात मानव समाज को ,  आतंरिक इच्छाओं और आक्रोश के आधार पर वह भी प्रायः शासकों की ओर से चलाया जाए।

 

अगर यह कहा जाए कि पैगंम्बरे इस्लाम का मुख्य अभियान, मानव समाज को  अज्ञानता से निकालना था तो गलत  न होगा। पैगंबरे इस्लाम ने अज्ञानता के अंधकार में हाथ  पैर मार रहे अरब समाज में एक एसी सभ्यता की नींव डाली जिसने देखते देखते पूरी दुनिया को प्रभावित कर लिया और आज तक उसका डंका बज रहा है और इस्लाम नामक इस महान मिशन और सभ्यता का दायरा फैलता जा रहा है। यही वजह है कि पवित्र  ग्रंथ  कुरआने मजीद, पैगम्बरे इस्लाम को, प्रकाशमय सूरज की संज्ञा देता है जो हर चीज़ को रौशनी देता है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने मानव समाज के मार्गदर्शन का जो बीड़ा उठाया था उसे अपने बाद भी जारी रखने की भी व्यवस्था की थी। यही वजह है कि मार्गदर्शन के इस सूरज के प्रकाश मय अभियान को जारी रखने के लिए 12 सितारों का इंतेज़ाम किया ताकि मानव समाज को सही राह पर चलने के लिए आवश्यक रौशनी मिलती रहे। मानव समाज के मार्गदर्शन की इस व्यवस्था की पहली कड़ी, पैग़ंबरे इस्लाम के दामाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम थे और  उसके बाद के 11 सितारों ने हज़रत अली और हज़रत फातेमा की पीढ़ी से जनम लिया जिसकी पहली कड़ी का नाम, इमाम हसन अलैहिस्सलाम है। आज अर्थात पैगंबरे इस्लाम के स्वर्गवाद दिवस के साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम के बड़े नवासे हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का भी शहादत दिवस है।  पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के 40 वर्षों के बाद सन 50 हिजरी क़मरी को आज ही के दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम शहीद हुए थे। हम इस महान इमाम के शहादत दिवस पर हार्थिक संदेवना प्रकट करते हैं।  

 

इमाम हसन अलैहिस्सलाम, हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा के बड़े बेटे थे।  अपने जीवन के आठ वर्ष उन्होंने अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम के साथ व्यतीत किये थे इसी लिए इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने  पैग़म्बरे इस्लाम से बहुत कुछ सीखा था।  कभी-कभी ऐसा भी होता था कि जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम पर वह्य नाज़िल होती थी उस समय इमाम हुसैन भी वहां पर हुआ करते थे।  इन आयतों को वे अपनी माता हज़रत फ़ातेमा को सुनाया करते थे।  इमाम हसन के बारे में कहा जाता है कि उनका व्यक्तित्व उनका व्यवहार सब कुछ पैग़म्बरे इस्लाम से मिलता-जुलता था।

अपने पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम हसन ने 21 रमज़ान सन 40 हिजरी क़मरी में ईश्वर की ओर से लोगों के मार्गदर्शन का दायित्व संभाला था।यह उस समय की बात है जब  इस्लामी समाज बहुत ही संवेदनशील चरण से गुज़र रहा था। उसी दिन 40 हज़ार से अधिक लोगों ने इमाम  हसन की आज्ञापालन की प्रतिज्ञा ली जिसे "बैअत " कहा जाता है लेकिन बहुत कम ही लोग अपनी इस प्रतिज्ञा पर बाकी रहे। इमाम हसन के दौर को गद्दारियों का दौर भी कहा जाता है और इसकी एक बड़ी वजह तत्कालीन सीरिया का गर्वनर मुआविया था।

 

दूसरे और तीसरे खलीफा की ओर से मुआविया को तत्कालीन सीरिया का शासक बनाया गया था लेकिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने खलीफा बनने के बाद उसे  उसके भ्रष्टाचार की वजह से पद से हटा दिया जिससे वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ ही युद्ध करने उठ खड़ा हुआ। मुआविया को इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हाथों की जाने वाली लोगों  की बैअत एक आंख न भाई और उसने धमकी और धन द्वारा अधिकांश लोगों को अपनी तरफ कर लिया और इस तरह से एक बेहद कठिन समय में इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पास, उस समय के इस्लामी समाज को रक्तपात से बचाने के लिए मुआविया से संधि के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।

 

संधि के समय मुआविया ने इमाम हसन की सारी शर्तें मान ली लेकिन पालन किसी भी शर्त का नहीं किया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम इस बारे में कहते हैं कि ईश्वर की सौगंध! खिलाफत को मैंने सिर्फ इस लिए दूसरे के हवाले कर दिया क्योंकि मेरे पास मदद करने वालों  की कमी थी। अगर मेरे साथी होती तो मुआविया के साथ रात दिन युद्ध करता यहां तक कि ईश्वर मेरे और उसके बीच फैसला कर देता।

    इमाम हसन अलैहिस्लाम इसी तरह फरमाते हैं कि मुआविया न मेरे साथ एसे विषय पर विवाद किया जिसमें सच्चाई मेरे साथ है न कि उसके साथ। लेकिन इस्लामी समाज के हित और अराकजता को रोकने के लिए मैंने बेहतर यह  समझा कि मुआविया के साथ युद्ध के बजाए संधि कर लूं क्योंकि निश्चित रूप से खून की सुरक्षा उसे बहाने से बेहतर है।

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा  सैयद अली ख़ामेनई  इमाम हसन अलैहिस्सलाम के समय की कठिन परिस्थितियों और उनके संयम के बारे में कहते हैं कि कभी कभी शहीद हो जाना, जीवित रहने से अधिकि आसान होता है। बिल्कुल एसा ही है। आध्यात्मकिता और गहराई से ज्ञान रखने वाले इस बात को बेहतर तौर पर समझते हैं। कभी कभी किसी वातावरण में जीवित रहना और प्रयास करना मर जाने और शहीद होने और ईश्वर से भेंट करने से कई गुना अधिक कठिन होता है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने इस कठिन राह का चयन किया था।  

 

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत के बारे में इतिहास में आया है कि जब मुआविया के शासन को दस बरस  का समय बीत गया तो उसने अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बनाने का फैसला किया और इसके लिए लोगों से यज़ीद की आज्ञापालन का वचन लेने का इरादा किया लेकिन इसके साथ ही उसने अशअस बिन कैस की बेटी जोदा को संदेश भेजा कि अगर वह इमाम हसन को ज़हर देकर मार डाले तो उसका विवाह अपने बेटे यज़ीद  से कर देगा और इसके साथ ही मुआविया ने उसके लिए एक लाख दिरहम भी भेजा। इमाम  जाफर सादिक  अलैहिस्सलाम कहते  हैं कि जोदा ने ज़हर लिया और घर आ गयी। रमज़ान का महीना था और इमाम हसन रोज़े से थे। गर्मी बहुत पड़ रही थी। इमाम हसन ने इफ्तार के समय दूध पीना चाहिए , जोअदा ने उसी दूध में ज़हर मिला रखा था जैसे ही इमाम हसन ने दूध पिया उन्हों पता चल गया कि दूध में ज़हर मिला था वे कहने लगे! ईश्वर की दुश्मन! तूने मुझे मारा है ईश्वर तेरा नाश करे। ईश्वर की सौगंध! मेरे बाद तुझे कोई खुशी और फायदा नहीं मिलेगा। तुझे धोखा दिया गया और उन्होंने तुझे अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल किया। ईश्वर की सौगंध! मुआविया ने तुझे बर्बाद कर दिया। ज़हरीला दूध पीने के दो दिनों के भीतर इमाम  हसन अलैहिस्सलाम  की शहादत  हो गयी और वही हुआ जो इमाम  हसन ने कहा था मुआविया ने जोअदा  से किया गया वादा पूरा नहीं किया। हम एक बार फिर इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शहादत दिवस पर हार्दिक संवेदना प्रकट करते  हैं।




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