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पैग़म्बरे इस्लाम और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) का शुभ जन्म दिवस

पैग़म्बरे इस्लाम और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) का शुभ जन्म दिवस

अधिकांश इतिहाकारों का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम का जन्म 17 रबीउल अव्वल पहली आमुल फील को हुआ था जबकि कुछ सुन्नी इतिहासिकारों का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम का जन्म 12 रबीउल अव्वल को हुआ था।

सारांश यह कि पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म दिवस की तारीख में शीया-सुन्नी मुसलमानों में मतभेद है और इन दोनों तारीखों के दौरान जो दिन हैं उन्हें ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रह. ने एकता सप्ताह के रूप में मनाये जाने का एलान किया था और एकता सप्ताह के दौरान दूसरे इस्लामी संप्रदायों को एक दूसरे से निकट लाने के लिए कांफ्रेन्सें आयोजित की जाती हैं, पूरी दुनिया के मुसलमान एक दूसरे को बधाई देते हैं, पैग़म्बरे इस्लाम के नम्र स्वभाव, एक दूसरे से प्रेम और उनके परित्याग आदि को याद करके एक दूसरे से अपने संबंध को मधुर, मज़बूत और प्रगाढ़ बनाते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम के पिता का नाम अब्दुल्लाह था। हज़रत अब्दुल्लाह जनाब अब्दुल्ल मुत्तलिब के बेटे थे। इसी प्रकार हज़रत आमिना बिन्ते वहब पैग़म्बरे इस्लाम की मां थीं। पैग़म्बरे इस्लाम की माता और पिता का संबंध क़ुरैश के बड़े क़बीले से था। क़ुरैश क़बीले के जो बड़े और प्रतिष्ठित लोग थे वे मक्का के महत्वपूर्ण और प्रभावी लोग थे और उनमें से अधिकांश का काम व्यापार था। पैग़म्बरे इस्लाम के पिता हज़रत अब्दुल्लाह व्यापार के उद्देश्य से शाम अर्थात वर्तमान सीरिया गये थे कि वापसी में बीमार हो गये और कुछ ही दिनों के भीतर पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म से पहले उनका स्वर्गवास हो गया।

पैग़म्बरे इस्लाम की मां का नाम आमिना था जो हज़रत वहब बिन अब्दे मनाफ की बेटी थीं। वह पवित्रता, ईश्वरीय भय और सदगुणों में क़ुरैश की महिलाओं में आदर्श थीं। एक रिवायत में है कि पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म के बाद आप ढ़ाई साल जबकि दूसरी रिवायत में है कि 6 साल तक ज़िन्दा थीं। वह अपने निकट सगे- संबंधियों से मिलने के लिए मक्के से मदीना जा रही थीं कि रास्ते में अबवा नामक स्थान पर उनका भी स्वर्गवास हो गया। इस यात्रा में उम्मे एय्यन नामकी उनकी सेविका भी उनके साथ थी। चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म से दो महीना और एक रिवायत के मुताबिक़ सात महीना पहले उनके पिता हज़रत अब्दुल्लाह का स्वर्गवास हो गया था इसलिए उनके पालन -पोषण की ज़िम्मेदारी उनके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के कांधों पर आ गयी।

सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम को दूध पिलाने के लिए उनके चचा अबू लहब की दासी सुवैबा को दिया गया परंतु पैग़म्बरे इस्लाम ने न उसका न किसी अन्य महिला का दूध पिया। एक रिवायत के मुताबिक कुछ समय के बाद पैग़म्बरे इस्लाम को अब्दुल्लाह बिन हारिस सादिया की बेटी हलीमा सादिया के हवाले किया गया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने उसका दूध पिया और पांच वर्षों तक उसने मां की तरह पैग़म्बरे इस्लाम का पालन- पोषण किया। पैग़म्बरे इस्लाम सात या आठ साल के थे कि प्रसिद्ध मुसलमान शायर हेसान बिन साबित के हवाले से इब्ने हेशाम कहता है ईश्वर की सौगंद मैं सात या आठ का था और जो कुछ मैं सुनता था उसे अच्छी तरह समझता था और मैंने देखा कि मदीना के एक किले से दूसरे किले के ऊपर जाकर एक यहूदी चिल्ला कर कहता था कि हे यहूदियो! जान लो कि जिस तारे के उदय के बाद अहमद दुनिया में आने वाले थे उस तारे का उदय रात को हो गया। इसी प्रकार रिवायत में है कि पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म दिवस की रात को कसरा नाम का बड़ा और मज़बूत महल अपने 14 स्तंभों के साथ गिर गया।

जिस रात पैग़म्बरे इस्लाम का जन्म हुआ इबलिस ने मदद के लिए अपने साथियों को गुहार लगायी और जब उसके सहयोगी उसके पास जमा हो गये तो उन सबों ने उससे कहा कि मेरे सरदार किस चीज़ ने आपको परेशान कर दिया है। आप क्यों इतना भयभीत हैं? इस पर इब्लिस ने कहा हाय हो तुम पर रात के आरंभ से अब तक ज़मीन और आसमान की हालत बदली- बदली देख रहा हूं। निश्चित रूप से ज़मीन पर कोई बड़ी घटना घटी है और जब से ईसा बिन मरियम पैदा हुए थे तब से आज तक इस प्रकार की कोई घटना नहीं घटी थी। अब हम आसमान में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं और वास्तविकताओं से अवगत नहीं हो सकते क्योंकि हज़रत मोहम्मद दुनिया में आ चुके हैं।

शैख सदूक़ आमाली नाम की अपनी किताब में पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से लिखते हैं कि इब्लिस आसमानों के ऊपर जाता था परंतु जब हज़रत ईसा का जन्म हुआ तो उसे तीन आसमानों के ऊपर जाने से मना कर दिया गया अब वह केवल चार ही आसमान तक ऊपर जा सकता था पर जब पैग़म्बरे इस्लाम का जन्म हो गया तो उसे सारे आसमानों पर जाने से मना कर दिया गया। अब वह सातों आसमान में से किसी भी आसमान पर नहीं जा सकता था।

इसी प्रकार एक रिवायत में है कि पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म दिवस की शुभ रात को हिजाज़ की ओर से एक प्रकाश निकला और वह पूरब की ओर वहां तक गया कि हर बादशाह का सिंहासन गिर गया। जो विद्वान भविश्यवाणी करते थे उनका ज्ञान ले लिया गया और जो जादूगर थे उनका जादू बातिल हो गया। इसी प्रकार फार्स में एक हज़ार वर्षों से जल रहा अग्निकुंड बुझ गया।

हदीसे क़ुद्सी में आया है कि महान ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहा कि हे अहमद अगर आप न होते तो मैं इस दुनिया और आसमानों को पैदा ही न करता। इस हदीस में बयान किया गया है कि पैग़म्बरे इस्लाम की वजह से दुनिया और आसमान को पैदा किया गया है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे अंबिया की 170वीं आयत में कहता है कि हे पैग़म्बरे हमने आपको समूचे ब्रह्मांड के लिए रहमत बनाकर भेजा है।  

पवित्र कुरआन की इस आयत से साफ- साफ स्पष्ट है कि महान ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को अपनी दया, रहमत व कृपा की प्रतिमूर्ति बनाकर भेजा था। महान ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को केवल इंसानों के लिए रहमत बनाकर नहीं भेजा है बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम हर उस चीज़ के लिए रहमत हैं जो इस ब्रह्मांड में है चाहे वह इंसान हो या ग़ैर इंसान। ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने पैग़म्बरे इस्लाम के जन्म दिवस के संबंध में अपने एक भाषण में कहा था कि पैग़म्बरे इस्लाम समस्त इंसानों का भला चाहते थे। वह कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में पवित्र कुरआन में विभिन्न आयतें मौजूद हैं। उनमें से एक सूरे बराअत की आयत नंबर 128 है जिसमें महान ईश्वर कहता है कि निःसंदेह तुम्हीं में से तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर आया है, तुम्हारी कठिनाइयां उसके लिए सख्त हैं और वह तुम्हारे मार्गदर्शन पर आग्रह कर रहा है और मोमिनों के प्रति कृपालु व दयालु है।

पवित्र कुरआन की इस आयत से साफ तौर पर यह स्पष्ट है कि पैग़म्बर भी इंसान है और दूसरे इंसानों की भांति खाता- पीता और दूसरे कार्य अंजाम देता है। महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम की एक विशेषता यह बयान करता है कि लोगों की जो कठिनाइयां हैं यानी लोगों को जिन कठिनाइयों का सामना है उससे पैग़म्बरे इस्लाम दुःखी हैं क्योंकि वह लोगों की कठिनाइयों को अपनी कठिनाइ समझते हैं। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम लोगों के मार्गदर्शन के लिए आग्रह करते हैं अगर उन्हें लोगों की भलाई व मुक्ति पसंद न होती तो लोगों द्वारा भांति- भांति का कष्ट दिये जाने के बावजूद वह लोगों के मार्गदर्शन के लिए सतत प्रयास न करते। सारांश यह कि महान ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को दया, कृपा और रहमत की प्रतिमूर्ति बनाकर भेजा था और वह इंसान लोक- परलोक में सफल हो गया जिसने ब्रह्मांड के लिए रहमत बनाकर भेजे गये पैग़म्बर की शिक्षाओं और पद चिन्हों पर अमल किया।

कार्यक्रम के इस भाग में हम आपको यह बताना चाहते हैं कि आज ही के दिन यानी 17 रबीउल अव्वल को पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम भी पैदा हुए थे। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम का इतना अधिक सम्मान करते थे कि जब भी पैग़म्बरे इस्लाम का नाम सुनते थे तो अपने सिर को झुका लेते थे। एक बार इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एक व्यक्ति के मुंह से सुना कि उसने अपने बेटे का नाम मोहम्मद रखा है तो इमाम ने तीन बार मोहम्मद, मोहम्मद, मोहम्मद कहा और यह भी कहा कि मेरे मां- बाप और ज़मीन पर रहने वाले समस्त लोग उन पर क़ुर्बान हो जायें। उसके बाद इमाम ने उस व्यक्ति से फरमाया कि कभी अपने बेटे को बुरा- भला मत कहना, उसे मारना नहीं, उसके साथ कोई बुरा सुलूक नहीं करना। जान लो कि ज़मीन पर कोई एसा घर नहीं है जिसमें मोहम्मद नाम का कोई हो और वह घर मुबारक न हो।

बहरहाल 17 रबीउल सन 83 हिजरी कमरी को इमाम जाफ़र सादिक अलैहिस्लाम का जन्म पवित्र नगर मदीना में हुआ और पांचवें इमाम, इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम आपके पिता हैं। इमाम की कई उपाधियां हैं जिनमें सादिक़ और अब्दुल्लाह सबसे अधिक मशहूर हैं। इमाम जाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम वास्तविक अर्थों में पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं के प्रचारक थे। इमाम फरमाते हैं खुशअखलाक़ी से बेहतर कोई जीवन शैली नहीं है।“ खुशअखलाक़ी और अच्छी प्रवृत्ति की एक अलामत दूसरों की सहायता करना है चाहे उनका संबंध किसी भी धर्म से हो।

रियावत में है कि एक रात को इमाम निर्धनों की सहायता करने के लिए उनके घरों पर गये थे। उस वक्त इमाम का एक चाहने वाला और उनका एक अनुयाई भी इमाम के साथ था वह भी दूसरों की सहायता करने में इमाम की मदद कर रहा था। जब इमाम ग़रीबों की मदद कर चुके तो उसने इमाम से पूछा कि आपने जिन लोगों की सहायता की है क्या आपको विश्वास है कि वे आपके शिया और आपके चाहने वाले हैं? उसके जवाब में इमाम ने फरमाया जिन लोगों की सहायता हमने की है उनमें से कोई भी शिया और हमारा चाहने वाला नहीं था। अगर शिया होते तो हम अपने दस्तरखान का नमक भी उनमें बांटते।

इमाम का यह जवाब इस बात का सूचक है कि वह अपने आस- पास के लोगों का कितना ध्यान रखते थे। इमाम उन लोगों की भी सहायता करते थे जो शिया और उनके चाहने वाले नहीं थे। इमाम एक अन्य स्थान पर फरमाते हैं गुनाहकार और पापी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिये और उनमें मर चुकी आशा को ज़िन्दा किया जाना चाहिये और उनकी ग़लतियों को बयान करने से परहेज़ किया जाना चाहिये। क्योंकि अगर गुनाहकारों के साथ सख्ती से व्यवहार किया जायेगा तो वे सही रास्ते पर चलने से नाउम्मीद और धर्म और धार्मिक शिक्षाओं से दूर भागने लगेंगे। 


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