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पूर्वोत्तरी सीरिया पर तुर्की का हमला क्या बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत है? क्या सीरिया और तुर्की के बीच वार्ता शुरू हो जाएगी? क्या

पूर्वोत्तरी सीरिया पर तुर्की का हमला क्या बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत है? क्या सीरिया और तुर्की के बीच वार्ता शुरू हो जाएगी? क्या

अरब जगत के विख्यात टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः पूर्वोत्तरी सीरिया पर तुर्की के दो दिनों के हमलों के बाद भी अभी कई देशों का स्टैंड स्पष्ट नहीं हुआ है। अब तक केवल क़तर ने तुर्की की इस सैन्य कार्यवाही का समर्थन किया है।

तुर्की के रक्षा मंत्री ख़ुलूसी अकार से टेलीफ़ोन पर अपनी बातचीत में क़तर के रक्षा मंत्री ख़ालिद मुहम्मद अतीया ने इस समर्थन का एलान किया।

इस हमले के बारे में क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय माहौल को देखते हुए दो नज़रिए ज़्यादा गश्त कर रहे हैं।

पहला नज़रिया यह है कि हमले से पहले रूस, अमरीका, सीरिया, ईरान और तुर्की के बीच सहमति बन चुकी है और यही सीरिया संकट के मुख्य पक्ष हैं। इस समझौते के तहत कुर्दों की सैनिक ताक़त कम करके उनके अलगाववादी मिशन को कमज़ोर कर दिया जाएगा। यह विचार रखने वाले अपने प्रमाण में रूस की प्रतिक्रिया की नर्मी की तरफ़ इशारा करते हैं। रूस के उप राष्ट्रपति यूरी ओशाकोफ़ ने हमले के बाद अपने बयान में कहा कि वह तुर्की की चिंताओं को समझते हैं और साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि सीरिया की अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए।

दूसरा नज़रिया यह है कि रूस के साथ मिलकर अमरीका ने तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान के लिए एक भयानक जाल बिछाया है। अमरीका ने तुर्की के लिए रास्ता साफ़ करते हुए अपने सैनिक हटा लिए बिल्कुल वही स्थिति जो इराक़ी शासक सद्दाम के लिए पैदा की थी। अमरीकी राजदूत ने सद्दाम को उकसाया था कि वह कुवैत पर हमला कर दे। यह नज़रिया पेश करने वाले लोग कहते हैं कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान की नीतियों ने हालिया समय में मध्यपूर्व और यूरोप में तुर्की के बहुत से दुशमन पैदा कर दिए और एस़-400 रूसी मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम की ख़रीदारी के मामले में राष्ट्रपति ट्रम्प से भी तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं।

दोनों नज़रियों में कुछ अहम बिंदु हैं लेकिन दूसरा नज़रिया ज़्यादा सही दिखाई पड़ता है। विशेषकर इसलिए कि सीरिया के विदेश उपमंत्री फ़ैसल मेक़दाद ने जो बयान दिया है वह बहुत कठोर है। उन्होंने अर्दोग़ान को झूठा और युद्ध अपराधी कहा। उन्होंने कहा कि तुर्की के हमले का हर रूप में जवाब दिया जाएगा। यह बयान देखकर हमें तो यह भी लगता है कि तुर्की जब कुर्दों के साथ लड़ाई में व्यस्त है तो दूसरी ओर सीरिया और रूस मिलकर इदलिब की लड़ाई को निपटाने की कोशिश करेंगे जहां तुर्की द्वारा समर्थित संगठनों का क़ब्ज़ा है और अब तक तुर्की के विरोध के कारण इस इलाक़े में रूस और सीरिया ने सैनिक कार्यवाही तेज़ नहीं की है।

जब अमरीका ने कुर्दों को धोखा दिया और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया तो इस नई स्थिति में रूस खुद को दो घटकों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा है और किसी को भी गंवाना नहीं चाहता। रूस कुछ बहानों की तलाश में है जिनकी मदद से वह इस संकट से बाहर निकल जाए।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने गुरुवार को अपने बयान में कहा कि उनका देश सीरिया और तुर्की के बीच और दूसरी ओर सीरियाई सरकार और कुर्दों के बीच वार्ता के दो अलग अलग चैनल स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। शायद इस समय रूस की यही डिपलोमैसी है। तीनों ही पक्षों से रूस के अच्छे संबंध हैं।

फ़ैसल मेक़दाद ने कुर्दों से वार्ता को खारिज नहीं किया है। उन्होंने कहा कि सीरिया के दरवाज़े सारे नागरिकों के लिए ख़ुले हुए हैं मगर उनकी सरकार किसी भी अगलाववादी संगठन से वार्ता नहीं करेगी। यह बात समझ में भी आने वाली है क्योंकि उत्तरी इलाक़ों में कुर्दों के स्थानीय प्रशासन पर अब दमिश्क़ सरकार को भरोसा नहीं रह गया है। इस प्रशासन ने दमिश्क़ सरकार के साथ होने वाले अपने सारे समझौतों का उल्लंघन किया और जैसे ही उसे अमरीका का इशारा मिला जाकर उसकी गोद में बैठ गया और अलगाववाद का राग अलापने लगा।

जंगों की शुरुआत के बारे में तो पता रहता है लेकिन उसका अंत कब और कैसे होगा इस बारे में कुछ कह पाना कठिन होता है। सऊदी गठबंधन ने सोचा था कि वह तीन हफ़्ते में यमन युद्ध जीतकर अपने सारे लक्ष्य पूरे कर लेगा मगर इस समय पांचवां साल इस युद्ध को चल रहा है। अफ़ग़ानिस्तान में लड़ाई 18 साल पहले शुरू हुई, अब तक अमरीका उसमें उलझा हुआ है और बाहर निकलने के लिए हाथ पांव मार रहा है। दूसरी भी बहुत सी मिसाले हैं।

अर्दोग़ान ने पूर्वोत्तरी सीरिया के इलाक़े में ज़मीनी फ़ौज भेजकर अपने राजनैतिक जीवन का शायद सबसे बड़ा जुआ खेला है क्योंकि मिसाइलों और ड्रोन विमानों के ज़माने में थल सेना का प्रयोग बहुत बड़ा जोखिम है। इससे बड़े जानी और माली नुक़सान हो सकते हैं जिसका सीधा असर तुर्की के भीतरी हालात और विदेशी संबंधों पर पड़ सकता है।

सवाल यह है कि यह लड़ाई कब तक चलेगी? इस पर विरोधियों की ओर से क्या प्रतिक्रिया आएगी? अमरीका और यूरोप तो कठोर आर्थिक प्रतिबंधों की बात कर रहे हैं।

अरब देशों की बात की जाए तो वह सब इस समय अर्दोग़ान के ख़िलाफ़ नज़र आते हैं और सीरिया का समर्थन कर रहे हैं हालांकि यही अरब देश किसी समय सीरिया को तबाह करने वाली साज़िश के सूत्रधार बने थे। यह एक बदलाव दिखाई दे रहा है और आने वाले दिनों में इससे बड़े बदलाव नज़र आएंगे।


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