?>

पिछले युद्धों के मुक़ाबले में ग़ज़्ज़ा के 12 दिवसीय युद्ध के ख़ास अंतर! 5 बिंदुओं में जानिए

पिछले युद्धों के मुक़ाबले में ग़ज़्ज़ा के 12 दिवसीय युद्ध के ख़ास अंतर! 5 बिंदुओं में जानिए

हालांकि ज़ायोनी शासन और ग़ज़्ज़ा के प्रतिरोधकर्ता गुटों के बीच अब तक कई जंगें हो चुकी हैं लेकिन हालिया 12 दिवसीय युद्ध की कुछ नई विशेषताएं सामने आई हैं जो उसे अलग तो बनाती ही हैं, साथ ही उसकी अहमियत भी बढ़ाती हैं।

सबसे पहली बात यह है कि पिछले युद्धों के विपरीत यह जंग, मस्जिदुल अक़सा पर अवैध काॅलोनियों में रहने वाले ज़ायोनियों और ज़ायोनी शासन के हमलों के जवाब में शुरू हुई। इस बार प्रतिरोधकर्ता गुटों ने बैतुल मुक़द्दस और मस्जिदुल अक़सा के मुक़ाबले में पूरे ज़ायोनी शासन को अपने हमलों का निशाना बनाया। इससे पहले के युद्धों में अवैध अधिकृत इलाक़ों या किसी हद तक तेल अवीव को निशाना बनाया जाता था लेकिन इस बार ग़ज़्ज़ा के मीज़ाइलों ने पूरे इस्राईल यहां तक कि उसके हवाई अड्डों और बंदरगाहों तक को निशाना बनाया। इस्राईल के अंतिम छोर पर प्रतिरोध के मीज़ाइल पहुंचे। इसका मतलब यह है कि अब अगर भविष्य में अवैध काॅलोनियों में रहने वाले ज़ायोनियों ने मस्जिदुल अक़सा पर हमला किया या इस्राईल ने फ़िलिस्तीनियों को ज़बरदस्ती उनके घरों से निकालने की कोशिश की तो फ़िलिस्तीनियों का मुंह तोड़ जवाब पूरे इस्राईल को भुगतना पड़ेगा।

दूसरी बात यह कि यह पहली जंग थी जिसमें ज़ायोनी शासन, संघर्ष विराम के लिए कोई शर्त निर्धारित नहीं कर सका। उसने एकतरफ़ा संघर्ष विराम की घोषणा करने में जो कुछ दिन का विलम्ब किया, वह अपनी इज़्ज़त बचाने और अमरीका की नई सरकार विशेष रूप से बाइडन को नीचा दिखाने के लिए किया। सच्चाई यह है कि नए संघर्ष विराम के लिए जिस माॅडल को चुना गया वह एक प्रकार से इस्राईल की इज़्ज़त बचाने और उसकी पराजय पर पर्दा डालने के लिए था।

तीसरे यह कि इस जंग में पहली बार ज़ायोनी शासन, ग़ज़्ज़ा में अपनी सेना भेजने की धमकी को पूरा करने में विफल रहा। इस्राईल इस बात से डर गया कि कहीं 33 दिवसीय युद्ध में पराजय, एक बार न दोहराई जाए और ग़ज़्ज़ा, मिरकावा टैंकों का क़ब्रिस्तान न बन जाए। इस युद्ध की शुरुआत में ही फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधकर्ताओं ने इस्राईली सेना की दो बक्तरबंद गाड़ियों को कोरनेट मीज़ाइल से निशाना बना दिया था और इस तरह इस्राईल को ग़ज़्ज़ा में घुसने के बारे में वाॅर्निंग दे दी थी।

चौथे यह कि इस नई जंग में यद्यपि पहले की तरह ग़ज़्ज़ा की घनी आबादी और सैनिक व असैनिक लक्ष्यों को अलग कर पाना असंभव होने के कारण मरने वाले असैनिकों की संख्या ज़्यादा थी लेकिन इसी के साथ ज़ायोनियों को होने वाली सैन्य व असैन्य जानी क्षति, ख़ुद इस्राईल द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक़ ज़्यादा थी और यह ऐसी हालत में है कि जब इस्राईल को पहुंचने वाला वास्तविक जानी नुक़सान ख़ास कर सैन्य क्षेत्र में घोषित संख्या से कहीं ज़्यादा था और इस्राईल ने पश्चिमी देशों की हमदर्दी बटोरने के लिए सिर्फ़ असैनिकों को होने वाले नुक़सान के चित्र जारी किए और अपनी हार पर पर्दा डालने के लिए मारे गए सैनिकों के वास्तविक आंकड़ों को सेंसर कर दिया।

पांचवीं बात यह कि पश्चिमी देश अपनी न्यूनतम निष्पक्षता तक बाक़ी नहीं रख सके और उन्होंने इस्राईल का समर्थन किया लेकिन अतीत की तुलना में ज़ायोनी शासन के प्रति उनके समर्थन में ध्यान योग्य कमी आई है और इससे पता चलता है कि नेतनयाहू की पोल, इस्राईल के पश्चिमी समर्थकों के सामने भी खुल चुकी है और वे अंदर ही अंदर इस बात से ख़ुश भी हो रहे हैं कि फ़िलिस्तीन के प्रतिरोधकर्ता गुटों ने ज़ायोनी शासन और ख़ुद नेतनयाहू को ठीक ठाक सबक़ सिखा दिया है। 


अपना कमेंट भेजें

आपका ईमेल शो नहीं किया जायेगा. आवश्यक फ़ील्ड पर * का निशान लगा है

*