?>

दुनिया के तीन नेताओं ने कोरोना की महामारी फैलाने में बड़ा रोल अदा किया...तीनों की एक बात समान हैः लोकप्रियता की भूख!

दुनिया के तीन नेताओं ने कोरोना की महामारी फैलाने में बड़ा रोल अदा किया...तीनों की एक बात समान हैः लोकप्रियता की भूख!

लोक लुभावनी नीतियों और राष्ट्र हित पर व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थों को प्राथमिकता देना कोरोना वायरस की महामारी के घातक रूप धारण करने में बड़ा प्रभावी साबित हुआ। इस लेख में इस प्रकार के तीन उदाहरण पेश किए जा रहे हैः

कोरोना वायरस की महामारी ने दुनिया को यह दिखाया कि किस तरह दक्षिणपंथी कट्टरवादी नीति संकट और त्रासदी को जन्म देती है और इसके नतीजे में लाखों लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। यह अमरीका में पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के शासनकाल में हुआ, यही ब्राज़ील में वहां के मौजूदा राष्ट्रपति बोलसोनारो के ज़माने में हो रहा है और यही भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काल में हो रहा है जो कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले नेता हैं।

संक्रमण और मौतों के आंकड़ों को देखा जाए तो यह तीनों देश सारी दुनिया में सबसे ऊपर हैं। अमरीका को छोड़कर जहां बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन और जो बाइडन की नई सरकार के सत्ता संभाल लेने के बाद हालात क़ाबू में होते दिखाई दे रहे हैं अन्य दोनों देशों की हालत त्रासदी की तसवीर पेश कर रही है। ब्राज़ील में रोज़ाना लगभग चार हज़ार लोगों की जानें जा रही हैं। यह दुनिया में हर दिन कोरोना से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा आंकड़ा है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। वहां भी रोज़ाना तीन हज़ार से ज़्यादा मौतें हो रही हैं जबकि रोज़ाना लगभग चार लाख नए मामले सामने आ रहे हैं। अमरीका के टाइम मैगज़ीन का कहना है कि यह सरकारी आंकड़े हैं जिनकी सत्यता पर गहरा संदेह है और अधिक संभावन यही है कि नए मामलों और मौतों का आंकड़ा इससे कहीं अधिक है।

तीनों नेताओं ने कोरोना वायरस की महामारी को डील करने की समान शैली अपनाई। पहले तो इसके ख़तरे को बहुत कम करके आंका और फिर अपने राजनैतिक स्वार्थों को प्राथमिकता देते हुए देशवासियों के स्वास्थ्य और ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ किया।

भारत ने कोरोना वायरस की दूसरी लहर से निपटने के लिए जो रवैया अपनाया उस पर तो बहुत गहराई से सोचने की ज़रूरत है। जिस ज़माने में कोरोना का संक्रमण जंगल की आग की तरह फैल रहा था भाजपा ने मोदी की एक जनसभा की वीडियो जारी की जिसमें चुनाव के लिए जमकर प्रचार किया जा रहा था।

मोदी के साथ ही भारत के गृह मंत्री अमित शाह भी पूर्वी भारत में भारी जनसभाएं करते दिखाई दे रहे थे। हालात धीरे धीरे इतने ख़राब हो गए कि उन्हें क़ाबू में कर पाना असंभव नज़र आने लगा।

भारत की सत्ताधारी पार्टी ने कोरोना को शिकस्त देने के एलान में बड़ी जल्दबाज़ी दिखाई थी। मोदी सरकार ने कहा कि हमने दुनिया के सामने कोरोना से लड़ने की नई मिसाल पेश की।

मोदी दरअस्ल पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे थे। मोदी ने वैक्सीनेशन को भी चुनावी प्रचार अभियान के एक हिस्से के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की। मार्च महीने में कैनेडा में कुछ लोगों को प्लेकार्ड हाथ में लिए दिखाया गया जिन पर विदेशों को वैक्सीन निर्यात करने पर मोदी का आभार जताया गया था।

कोरोना के बेक़ाबू हो जाने की एक और बड़ी वजह कुंभ का मेला था जो 11 मार्च से शुरू हुआ। बार बार चेतावनी दी जा रही थी मगर भाजपा की राज्य सरकार ने यही रट लगाए रखी कि कुंभ मेला बहुत साफ़ सुथरा है और प्रोटोकोल का पालन किया जा रहा है। राज्य के मुख्य मंत्री ने कहा कि किसी को भी कोरोना के कारण गंगा स्नान से नहीं रोका जा सकता क्योंकि आस्था कोरोना वायरस को हरा सकती है। यह सब होता रहा है और मोदी चुपचाप तमाशा देखते रहे। हालांकि कोरोना वायरस के रफ़तार पकड़ लेने की ख़बरें आने लगी थीं।

भाजपा के नेताओं ने इस बीच कोरोना वायरस के इलाज के लिए गाय का पेशाब पीने की भी वकालत की।

ब्राज़ील में जब कोरोना फैला तो शुरू से ही राष्ट्रपति बोलसोनारो ने बिल्कुल अनोखा रवैया अपना लिया। वह कोरोना से संक्रमित भी हुए मगर कोरोना के ख़तरे का मज़ाक ही उड़ाते रहे। वह न तो मास्क की उपयोगिता मानने के लिए तैयार हुए और न सामाजिक दूरी पर ध्यान दिया। नतीजा यह हुआ कि आज पूरा ब्राज़ील इसका ख़मियाज़ा भुगत रहा है।

बोलसोनारो ब्राज़ील के शहारों और प्रांतों के मेयरों और गवर्नरों से भी भिड़ गए। उन्होंने लाक डाउन लगाने का फ़ैसला किया तो बोलसोनारो ने उन्हें बाग़ी कहा। वह भी यही रट लगाए रहे कि सरकार ने सारी तैयारियां कर ली हैं अब देश को खोल देना चाहिए। ब्राज़ील में इस समय मरने वालों की संख्या ढाई लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है।

हालत यह हो गई है कि ब्राज़ीलियन वेरिएंट सामने आ गया है जो भारतीय वेरिएंट की तरह बहुत ख़तरनाक है। अमेज़न के जंगलों में रहने वाले लोगों के बारे में डर है कि कहीं उनका नस्ली सफ़ाया ही न हो जाए क्योंकि वायरस उनके बीच बुरी तरह फैल गया है।

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने भी अपनी लोकप्रियता के चक्कर में कोरोना वायरस की महामारी के संबंध में बड़ा बचकाना और घातक रवैया अपनाया। उन्होंने मास्क लगाने में बहुत टालमटोल की और लाकडाउन के एलान को बार बार टालते रहे।

मोदी की तरह ट्रम्प की भी ज़िद थी कि चुनावी सभा ज़रूर हो हालांकि इन सभाओं के कारण संक्रमण तेज़ी से बढ़  रहा था। उन्होंने अमरीका के राज्यों में लाक डाउन की वकालत करने वाले नेताओं पर जमकर हमला किया। संक्रामक रोग विशेषज्ञ फ़ाउची की सिफ़ारिशों को नज़रअंदाज़ किया और इस बड़े वैज्ञानिक को ही वह त्रासदी का नाम देने लगे। अपने चुनावी कैंपेन के अधिकारियों से टेलीफ़ोन पर बातचीत में ट्रम्प ने कहा कि जनता फ़ाउची और उनके जैसे दूसरे पागलों से बच गई।

ट्रम्प के जाने के बाद हालात संभलने लगे हैं मगर आज भी अमरीका कोरोना से होने वाली मौतों की दृष्टि से दुनिया में पहले नंबर पर है।

स्रोतः अलजज़ीरा


अपना कमेंट भेजें

आपका ईमेल शो नहीं किया जायेगा. आवश्यक फ़ील्ड पर * का निशान लगा है

*