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दस साल में मदीने के हालात कैसे बदले, नाना और नवासे की दुखद कहानी, कोई सांत्वना देने वाला नहीं था बल्कि सबको शिकायत थी कि ....

दस साल में मदीने के हालात कैसे बदले, नाना और नवासे की दुखद कहानी, कोई सांत्वना देने वाला नहीं था बल्कि सबको शिकायत थी कि ....

आज इतिहास की उस अद्तीय महान हस्ती के स्वर्गवास का दुःखद दिन है जिसने मानव जीवन को बदल दिया और उस महान हस्ती ने इंसानों को वह रास्ता दिखाया जिस पर चल कर इंसान, लोक- परलोक में अपने जीवन को सफल बना सकता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन के अंतिम क्षणों के बारे में कहते हैं” पैग़म्बरे इस्लाम ने जब प्राण त्यागा है तो उनका सिर हमारे सीने पर था। मैंने उन्हें ग़ुस्लो- कफ़न दिया। उस समय फरिश्ते मेरी मदद कर रहे थे। फरिश्तों का एक गिरोह ज़मीन पर आ रहा था जबकि दूसरा गिरोह ज़मीन से आसमान पर जा रहा था। उनके आने- जाने की आवाज़ लगातार मेरे कानों में आती रही यहां तक कि मैंने पैग़म्बरे इस्लाम को दफ्न कर दिया।

ईश्वरीय दूत इंसानों के दिलों पर राज करने वाले शासक हैं और वे इंसानी कारवां का सच्चाई की ओर मार्गदर्शन करते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब कोई कौम गुमराह हो गयी या सच्चाई के मार्ग पर चलने से रुक गयी तो किसी न किसी पैग़म्बर ने उसकी सहायता की और उसे सच्चाई का रास्ता दिखाया। हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम अंतिम ईश्वरीय पैग़म्बर हैं। उन्हें दुनिया से सिधारे हुए लगभग चौदह सौ साल हो रहे हैं परंतु उनके अनुयाइयों की संख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। उसकी एक वजह यह है कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम एक महान और बेमिसाल हस्ती थे। उनकी जो शिक्षायें हैं वह सर्वोत्तम शिक्षायें हैं पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने स्वर्गवास से एक महीने पहले फरमाया था जुदाई निकट हो गयी है और ईश्वर की ओर वापसी होने वाली है। जल्द ही मुझे बुलाया जाने वाला है और मैं उसके निमंत्रण को स्वीकार करने वाला हूं मैं तुम लोगों के बीच दो क़ीमती व मूल्यवान चीजें छोड़ कर जा रहा हूं एक अल्लाह की किताब और दूसरे अपने बैत। महान ईश्वर ने सूचना दी है कि यह दोनों कदापि एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि दोनों मेरे पास हौज़े कौसर पर साथ आयेंगे। तो तुम अच्छी तरह सोचो कि उनके साथ कैसा व्यवहार करोगे। एक दूसरी हदीस में है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया था कि मैं अपने बाद दो मूल्यवान चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूं एक अल्लाह की किताब और दूसरे अपने अहलेबैत और जब तक तुम इन दोंनों से जुड़े रहोगे कदापि गुमराह नहीं होगे और यह दोनों एक  दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि दोनों साथ में मेरे पास हौज़े कौसर पर आयेंगे। यह वह मशहूर हदीस है जिसका उल्लेख शीया- सुन्नी दोनों की किताबों में हुआ है।

पैग़म्बरे इस्लाम की हदीस में ध्यान योग्य एक बिन्दु यह है कि उन्होंने मुसलमानों से कहा है कि जब तक तुम इन दोनों से जुड़े रहोगे कभी भी गुमराह नहीं होगे। आज बहुत से मुसलमान एसे हैं जिन्होंने पवित्र कुरआन को ले लिया है और अहले बैत को छोड़ दिया है और वे अपने आपको सच्चा मुसलमान भी समझते हैं जबकि पैग़म्बरे इस्लाम की हदीस की रोशनी में वे गुमराह हैं। इसी तरह कुछ मुसलमान एसे भी हैं जो अहलेबैत से जुड़े होने का दावा करते हैं परंतु पवित्र कुरआन की शिक्षाओं को कोई विशेष महत्व नहीं देते हैं। एसे भी मुसलमानों को नहीं कहा जा सकता कि वे पूरी तरह सच्चाई के रास्ते पर हैं।

 

अगर ध्यान से देखा जाये तो जो मुसलमान कुरआन से जुड़े होने का दावा करते हैं वे सही अर्थों में कुरआन से भी नहीं जुड़े हैं क्योंकि अगर वे कुरआन से जुड़े होते तो पवित्र कुरआन खुद ही अहले बैत से प्रेम करने के लिए कहता है और उन्हें सर्वोत्तम आदर्श बताता है। जो लोग कुरआन से जुड़े रहने का दावा करते हैं वे पवित्र कुरआन की उन आयतों पर क्यों अमल नहीं करते जिनमें अहले बैत से प्रेम करने के लिए कहा गया है। बहरहाल जो इंसान सही रास्ते पर चलना और गुमराही से बचना चाहता है तो उसे कुरआन और अहलेबैत दोनों से जुड़े रहना चाहिये। जिस इंसान ने भी कुरआन या अहलेबैत में से किसी एक को छोड़ा तो उसे समझना चाहिये कि वह गुमराह हो चुका है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में कहा था कि हे लोगो मेरे बाद कोई दूसरा पैग़म्बर नहीं आयेगा और मेरे बाद कोई सुन्नत व परम्परा नहीं होगी। मेरे बाद जो भी पैग़म्बरी का दावा करे तो उसका यह दावा झूठा होगा और उसकी जगह जहन्नम होगी। हे लोगो न्याय से काम लो, बिखर मत जाना और मुसलमान बाक़ी रहना ताकि अमर हो जाओ।

 

पैग़म्बरे इस्लाम की एक विशेषता उनका मृदुभाषी होना है। पैग़म्बरे इस्लाम का व्यवहार इतना मधुर व शालीन था कि अगर यह कहा जाये कि उनके व्यवहार में एक जादू था तो अतिशयोक्ति नहीं होगा और ईश्वरीय धर्म इस्लाम के फलने- फूलने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। पवित्र कुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया और उन ध्यान दिया गया है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम का परिचय सर्वोत्तम आदर्श के रूप में करता है। पवित्र कुरआन के सूरे आले इमरान की आयत नंबर 159 के एक भाग में आया है कि हे पैग़म्बर अगर आप सख्त दिल होते तो लोग आपके पास से चले जाते। उनके लिए क्षमा याचना कीजिये।

पवित्र कुरआन की इस आयत से यह नतीजा निकलता है कि अच्छा स्वभाव महान ईश्वर की एक बहुत बड़ी नेअमत है और जिन लोगों का व्यवहार अच्छा नहीं है वे ईश्वरीय धर्म के प्रचार- प्रसार में अधिक सफल नहीं हो सकते। लोगों के साथ नर्मी से पेश आने का अपना एक विशेष महत्व है। लोगों को अपनी ओर खींचने में नम्र स्वभाव की उल्लेखनीय भूमिका है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने 23 वर्षों तक पूरी निष्ठा के साथ ईश्वरीय धर्म का प्रचार- प्रसार किया। इस्लाम के प्रचार- प्रसार के मार्ग में पैग़म्बरे इस्लाम को बहुत कठिनाइयों व समस्याओं का सामना हुआ और उन्हें बहुत कष्ट पहुंचाया गया इस प्रकार से कि एक स्थान पर स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं कि जिस तरह मुझे कष्ट पहुंचाया गया उस तरह किसी भी पैग़म्बर को कष्ट नहीं पहुंचाया गया। मक्के के काफिर और अनेकेश्वरवादी पैग़म्बरे इस्लाम के साथ अभद्र अशिष्ट व्यवहार करते थे परंतु पैग़म्बरे इस्लाम उनके अभद्र व्यवहार का जवाब शालीनता, सुशीलता और नम्रता से देते थे।

 

पैग़म्बरे इस्लाम की एक विशेषता महिलाओं और लड़कियों को सम्मान देना है। इस्लाम में इंसान होने की दृष्टि से महिला और पुरुष समान हैं किसी को किसी पर वरियता हासिल नहीं है मगर तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय व सदाचारिता के आधार पर।

बहरहाल पैग़म्बरे इस्लाम समस्त सदगुणों की प्रतिमूर्ति हैं और उनके अनुसरण में इंसान के लोक- परलोक का कल्याण नीहित है। पैग़म्बरे इस्लाम ने जिस धर्म को समस्त मानवता को उपहार में दिया है वह इंसान की प्रकृति के पूर्ण अनुरुप है और उसमें इंसान की समस्त आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया है। ईश्वर धर्म इस्लाम की एक विशेषता यह है कि उसमें हर समय के समस्त इंसानों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया है। सारांश यह कि पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा लाये गये धर्म के अनुसरण में इंसान का लोक- परलोक का कल्याण नीहित है।


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