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तुर्की और आज़रबाइजान के मुक़ाबले में ईरान के हाथ बंधे हुए नहीं हैं

तुर्की और आज़रबाइजान के मुक़ाबले में ईरान के हाथ बंधे हुए नहीं हैं

इन दिनों तुर्की और आज़रबाइजान गणराज्य के संचार माध्यमों द्वारा कुछ ऐसी अफ़वाहें और बातें फैलाई जा रही हैं, जिसका क्षेत्र की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इसी के साथ इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कुछ विश्लेषकों को क्षेत्रीय घटनाक्रमों की सही और गहरी समझ नहीं है और वे देशों की वास्तविक स्थिति से अनजान हैं।

उत्तरी ईरान में फ़ातेहाने ख़बैर सैन्य अभ्यास को लेकर एक बार फिर तुर्क सरकार के निकट मीडिया संसाधनों ने शोर-शराबा करना शुरू कर दिया और सही कवरेज और सही विश्लेषण के बजाए अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करना शुरू कर दिया।

हालांकि ईरान ने इस सैन्य अभ्यास से तीन महत्वपूर्ण संदेश देने की कोशिश की है। पड़ोसी देशों के लिए पहला संदेश यह है कि ईरान अपनी सीमाओं के नज़दीक, ज़ायोनी शासन की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करेगा। दूसरे यह कि ईरान भू-राजनीतिक परिवर्तनों से घराहट का शिकार नहीं है और कोई उसकी क्षेत्रीय स्थिति को प्रभावित नहीं कर सकता है।

तीसरे यह कि ईरान के पास क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने के लिए उच्च राजनीतिक और कूटनीतिक विश्वसनीयता की शक्ति है और वह एक भरोसेमंद और प्रतिबद्ध मध्यस्थ हो सकता है।

इस बात से हटकर कि तुर्की और आज़रबाइजान किन लक्ष्यों को साधने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ईरान फ़ार्स खाड़ी को काले सागर से जोड़ने या आर्मेनिया तक अपने ज़मीनी मार्ग जैसे मुद्दों पर समझौता नहीं कर सकता और कोई शक्ति उसे उसके इस मार्ग पर आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती है।


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