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तीन कारणों से लगता है कि सीरिया पर इस्राईल का मिसाइल हमला आख़िरी था। क्या हम लेबनान की वायु सीमा में गिरते देखेंगे इस्राईली युद्

तीन कारणों से लगता है कि सीरिया पर इस्राईल का मिसाइल हमला आख़िरी था। क्या हम लेबनान की वायु सीमा में गिरते देखेंगे इस्राईली युद्

सीरिया की राजधानी दमिश्क के पश्चिम में मंगलवार की रात शस्त्रागार पर होने वाले इस्राईल के हमले के बारे में हमें यह लगता है कि अब अगर इस्राईल ने फिर इस प्रकार का हमला किया तो उसे अगल प्रकार का जवाब दिया जाएगा।

क्योंकि मंगलवार की रात को होने वाले हमले पर रूस और सीरिया की प्रतिक्रिया में गंभीर चेतावनी दिखाई देती है।

हम अपने इस विचार की वजह बताने से पहले यह इशारा करते चलें कि इस्राईल के एफ़16 युद्धक विमानों ने लेबनान की वायु सीमा में उड़ते हुए सीरिया के शस्त्रागार पर मिसाइल हमला किया। इन विमानों में सीरिया की वायु सीमा में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं हुई जबकि इससे पहले वह जब चाहते थे सीरियाई वायु सीमा का उल्लंघन करते थे। मगर यह उस समय की बात है जब सीरिया को रूस से एस-300 मिसाइल सिस्टम नहीं मिला था। अब हो सकता है कि इस्राईल का कोई भी हमला होने की स्थिति में इस्राईली विमानों को लेबनान की सीमा में भी निशाना बनाया जाए।

अब तक जो जानकारियां आई हैं यदि उनका विशलेषणात्मक नज़र से जायज़ा लिया जाए तो हमें तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं।

पहली बात तो यह है कि इस्राईल की इस हरकत पर रूस ने गहरा क्रोध व्यक्त किया। रूस के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इगोर कोनाशिनकोफ़ ने सीरिया की राष्ट्रीय संप्रभुता पर इस्राईल की ओर से होने वाले हमले पर आपत्ति जताई। प्रवक्ता ने बताया कि इस्राईली युद्धक विमानों ने 16 मिसाइल फ़ायर किए जिनमें से 14 मिसाइलों को सीरियाई एयर डिफ़ेन्स सिस्टम ने मार गिराया। दो मिसाइल शस्त्रागार पर लगे। प्रवक्ता ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस समय इस्राईल ने यह हमला किया बैरूत के एयरपोर्ट पर उस समय छह यात्री विमान उतर रहे थे जिनमें दो विमानों के लिए गंभी रूप से ख़तरा पैदा हो गया।

दूसरी बात यह है कि इस्राईली प्रशासन ने यह माना है कि सीरिया का मिसाइल हैफ़ा नगर के क़रीब गिरा है। इसका मतलब यह है कि इस्राईल का मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम आयरन डोम विफल हो चुका है जिसे दसियों अरब डालर ख़र्च करके इस्राईल ने इसलिए बनाया था कि इस्राईल की ओर फ़ायर किए गए मिसाइलों को सीमा पर ही मार गिराया जाए।

तीसरी बात यह है कि सीरिया ने एस-300 मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम को प्रयोग किए गए बग़ैर ही 14 मिसाइलों को मार गिराया। एस-300 मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम अधिक आधुनिक और प्रभावी सिस्टम है।

नेतनयाहू को एक महीना पहले ग़ज़्ज़ा में होने वाले टकराव में बड़ी बेइज़्ज़ती उठानी पड़ी, उनके सामने अप्रैल महीने के संसदीय चुनाव हैं जबकि भ्रष्टाचार की जांच का फंदा उनके गले के क़रीब पहुंच गया है। नेतनयाहू ख़ुद को इलाक़े में मज़बूत नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं जो अपनी इच्छा और निर्णय से बड़े सैनिक आप्रेशन कर सकता है। इस तरह वह केवल सीरियाई नेतृत्व ही नहीं बल्कि रूस को भी ललकारने की कोशिश में थे इसीलिए उन्होंने सीरिया की राजधानी दमिश्क़ के क़रीब शस्त्रागार पर हमला करवाया।

यह बात सही है कि इस्राईल के लेबनान की वायु सीमा का उल्लंघन करने से और वहां से सीरिया के भीतर इस्राईली मिसाइल हमले से किसी भी रूसी या ग़ैर रूसी विमान को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है मगर लेबनान की सरकार के पास इस्राईली की नकेल कसने का यह अच्छा अवसर है।

इससे पहले सीरिया के लाज़ेक़िया नगर से कुछ दूरी पर समुद्र के ऊपर रूस का सैनिक विमान उस समय निशाना बन गया था जब इस्राईल युद्धक विमानों ने सीरिया के ठिकानों पर हमला किया और सीरियाई ने इन हमलों का जवाब दिया था। इस हमले में रूस के 11 सुरक्षा अधिकारी मारे गए थे। इस्राईल की इस उत्तेजक हरकत के जवाब में रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन ने रूस को एस-300 मिसाइल डिफ़ेन्स सिस्टम सौंप दिया जिसका सौदा दोनों देशों के बीच बहुत पहले हो चुका था। तो क्या इस समय इस्राईल ने जो हरकत की है उसके जवाब में रूस सीरियाई सरकार को इस बात के लिए प्रोत्साहित करेगा कि वह इस्राईली विमानों को लेबनान ही नहीं बल्कि इस्राईली वायु सीमा के भीतर भी निशाना बनाए?

इन सवालों के जवाब फिलहाल हमारे पास नहीं हैं लेकिन रूस ने जिस प्रकार का आक्रोश व्यक्त किया है उससे पता चलता है कि आने वाले साल में यदि इस्राईल ने फिर कोई मिसाइल हमला किया तो हमें बहुत कुछ नया देखने को मिलेगा।

इस्राईली सरकार को सीरिया से सेना बाहर निकालने के अमरीका के फ़ैसले से बहुत बड़ा झटका लगा है। इस्राईल यह समझ रहा था कि यदि अमरीकी सेनाएं यहां मौजूद रहेंगी तो वह ईरान की बढ़ती शक्ति और पैठ का मुक़ाबला करेंगी मगर अब ट्रम्प ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस्राईल को अपनी रक्षा ख़ुद करनी है।

हमें तो यह लग रहा है कि अब नेतनयाहू भी वहीं पहुंचने वाले हैं जहां उन्हें होना चाहिए और जहां उनके पूर्ववर्ती एहूद ओलमर्ट पहुंचे थे और वह जगह है जेल! नेतनयाहू को ग़ज़्ज़ा में पराजय का मुंह देखना पड़ा, लेबनान की सीमा पर सुरंगे खोजने का ड्रामा भी नाकाम रहा वह हिज़्बुल्लाह की निंदा में सुरक्षा परिषद से कोई बयान तक पारित नहीं करवा सके और रूस का समर्थन भी गवां बैठे।

नेतनयाहू के दिन अब बस गिने चुने ही हैं और उनकी जगह जो लेगा उसकी हालत भी बेहतर नहीं होगी क्योंकि ज़माना बदल गया है और अब वह दौर नहीं रहा जब इस्राईल पूरे इलाके में धौंस जमाता था। आने वाला साल हमारे इस विचार के सुबूत पेश करेगा।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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