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जीने की कला

जीने की कला

हमने आपको समय के संचालन की ज़रूरत और बेहतर व अधिक लाभदायक पलों को अस्तित्व प्रदान करने में उसकी भूमिका के बारे में बताया था।

हमने इसी तरह लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए अनुशासित होने, लक्ष्यपूर्ण होने और कार्यक्रम तैयार करने के बारे में बात की थी। एक अच्छा कार्यक्रम, वह कार्यक्रम है जो किसी व्यक्ति के जीवन में उसके सभी निजी व सामाजिक दायित्वों को संगठित करे और उसके जीवन के विभिन्न पहलुओं को दृष्टिगत रखे। चूंकि हर व्यक्ति की निजी व सामाजिक ज़िंदगी, स्वयं से और अन्य लोगों से उसके संबंधों पर आधारित होती है इस लिए जीवन का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि वह इन दोनों अहम पहलुओं का सही ढंग से पोषण करे।

व्यक्तिगत दायित्वों का अर्थ यह है कि हर व्यक्ति इस बात के लिए बाध्य है कि ज्ञान अर्जित करे, अपने भीतर नैतिकता व शिष्टाचार का पोषण करे, आध्यात्मिकता पर ध्यान दे, निजी स्वास्थ्य का ख़याल रखे, स्वस्थ व पौष्टिक आहार ले, व्यायाम व मनोरंजन का कार्यक्रम बनाए, अपनी योग्यता के अनुसार कोई काम सीखे और नौकरी व आय को महत्व दे। अलबत्ता एक पहलू पर हद से अधिक ध्यान देना, मनुष्य को उसके जीवन के अन्य पहलुओं पर ध्यान देने से वंचित कर देता है और एक संतुलित जीवन का आनंद उससे छीन लेता है लेकिन एक सफल कार्यक्रम मनुष्य का ध्यान उसकी निजी व सामाजिक ज़िम्मेदारियों की ओर आकृष्ट करता है और उसके लिए एक बेहतर जीवन तैयार करता है।

इस्लाम धर्म में ज़िम्मेदारियों की पहचान को हर व्यक्ति के अहम दायित्वों में से एक बताया गया है। क़ुरआने मजीद सूरए बय्येना की पांचवीं आयत में इस संसार में मनुष्य की जिम्मेदारी के बारे में कहता है कि लोगों का इस दुनिया में ईश्वर की बंदगी के अलावा कोई अन्य दायित्व नहीं है। इसी तरह सूरए ज़ारियात की 56वीं आयत में ईश्वर कहता है। और मैंने जिन्नों व मनुष्यों को केवल इस लिए पैदा किया है कि वे मेरी उपासना करें।

इस आधार पर धर्म की दृष्टि में मनुष्य का मुख्य दायित्व बंदगी है लेकिन इस बंदगी का अर्थ एकांतवास नहीं है। इस्लाम में बंदगी का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने निजी व सामाजिक जीवन में, ईश्वर की प्रसन्नता के प्रयास में रहे और उसी को प्रसन्न करने के लिए अपने जीवन का हर काम करे तथ हरामख़ोरी, दूसरों के अधिकारों के हनन, झूठ, स्वार्थ, घमंड और अनैतिकता जैसी बुराइयों से दूर रहे। इस्लाम की शिक्षाएं मुसलमानों से चाहती हैं कि वे एक संतुलित व सामाजिक जीवन बिताएं, एक दूसरे से सहयोग करें, एक दूसरे की समस्याओं को दूर करने की कोशिश करें, पड़ोसियों पर ध्यान दें और अपने धन से दरिद्रों व ग़रीबों को वंचित न रखें।

हमने व्यक्तिगत दायित्वों के बारे में आपसे बात की थी। सोच-विचार, ज्ञानार्जन, क्षमताओं की पहचान व उनका पोषण और कोई एक कला या पेश सीखना उनमें शामिल थे। अब हम एक अन्य अहम व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी के बारे में बात करेंगे। यह ऐसी ज़िम्मेदारी है कि अगर इस पर ध्यान न दिया गया तो अनेक समस्याएं व कठिनाइयां सामने आती हैं। यह अहम ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्य की रक्षा है।

एक बड़ी अनुकंपा, जिसकी ओर से हम अधिकतर निश्चेत रहते हैं और उसके लिए ईश्वर के कृतज्ञ नहीं होते, स्वास्थ्य व तंदरुस्ती की अनुकंपा है। हम जब तक स्वस्थ रहते हैं, तब तक स्वास्थ्य के महत्व को नहीं समझते लेकिन अगर मामूली सा बुख़ार भी आ जाए या किसी अन्य रोग में ग्रस्त हो जाएं तो एकमात्र चीज़, जिसकी हम कामना करते हैं, स्वास्थ्य है। इसी तरह जब हम किसी रोगी को देखने के लिए अस्पताल जाते हैं या किसी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाते हैं और वहां बड़ी संख्या में रोगियों को देखते हैं तो अपने स्वास्थ्य का मूल्य बेहतर ढंग से समझ जाते हैं। एक प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक का कहना है कि स्वास्थ्य, स्वस्थ लोगों के सिर का वह ताज है जिसे केवल बीमार लोग ही देख सकते हैं।

जी हां! स्वास्थ्य की अनुकंपा, उन हज़ारों कामनाओं से अधिक मूल्यवान है जो संभावित रूप से हमारे मन में होती हैं। जब एक स्वस्थ व्यक्ति यह समझ ले कि उसे कितनी मूल्यवान अनुकंपा हासिल है तो फिर उसे अपने ईश्वर और रचियता का आभार प्रकट करना और उसका गुणगान करना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य के बारे में कहता हैः स्वास्थ्य, लोगों के जीवन की संपत्ति और एक सकारात्मक विषय है जो सामाजिक व व्यक्तिगत पूंजियों और इसी तरह शारीरिक क्षमताओं पर आधारित है।

शारीरिक स्वास्थ्य का अर्थ प्रतिदिन की गतिविधियों के लिए शरीर का सक्षम होना और बीमारियों से दूर रहने के लिए ऊर्जा की रक्षा करना है। स्वास्थ्य रूपी मूल्यवान मोती की अच्छी तरह रक्षा करनी चाहिए और कभी भी और किसी भी स्थिति में उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इस्लाम की दृष्टि में भी शरीर की देखभाल और उसे क्षति न पहुंचाने का अत्यधिक महत्व है। इस ईश्वरीय धर्म में मनुष्य, ईश्वर की रचना, उसका उत्तराधिकारी और अमानतदार है। वह अपने विभिन्न संबंधों में ईश्वरीय ध्रुव पर रहता है और उसे ऐसे जीवन के लिए पैदा किया गया है जो बंदगी के साथ हो। जीवन व ईश्वर की बंदगी में शांति व संतोष का एक कारक, स्वस्थ शरीर व आत्मा है। स्वास्थ्य के महत्व के संबंध में हदीसों में कहा गया है कि मनुष्य को सबसे कड़ी कठिनाई और दुख में भी अपने शरीर व आत्मा को जान बूझ कर क्षति पहुंचाने का अधिकार नहीं है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने स्वास्थ्य को एक गुप्त व अज्ञात अनुकंपा बताया है। उन्होंने अपने एक साथी अबूज़र ग़फ़्फ़ारी से स्वास्थ्य के बारे में कहाः “हे अबूज़र! बीमारी के बाद स्वास्थ्य के महत्व को समझो और उससे बीमारी के समय लाभ उठाओ।“ सफ़ाई सुथराई का ध्यान रखना, उचित आहार और व्यायाम, स्वास्थ्य की रक्षा में अहम प्रभाव रखते हैं। व्यक्तिगत व सामाजिक रूप से सफ़ाई सुथराई का ध्यान रखना स्वास्थ्य के संबंध में बहुत अहम समझा जाता है।

इस्लाम धर्म में इसके लिए अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएं बयान की गई हैं। यहां तक कि कुछ बातों के लिए विशेष दिनों का भी उल्लेख किया गया है। उदाहरण स्वरूप नाख़ुन काटने के लिए शुक्रवार के दिन को उत्तम बताया गया है। खाना खाने से पहले हाथ धोने, इत्र लगाने, साफ़ व अच्छे कपड़े पहनने और इसी तरह की अनेक बातों पर इस्लाम धर्म ने बल दिया है। पैग़म्बरे इस्लाम सफ़ाई व पवित्रता का संदेश देते थे और सभी को सफ़ाई सुथराई की सिफ़ारिश करते थे। उनसे मुलाक़ात के समय सबसे पहली विशेषता जो हर देखने वाले को प्रसन्न कर देती थी, उनकी सफ़ाई, पवित्रता और उनका विदित सौंदर्य था।

चूंकि मनुष्य का अध्यात्म व नैतिकता उसकी प्राकृतिक ज़िंदगी से जुड़ी हुई है इस लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भी हमेशा स्वास्थ्य और सफ़ाई सुथराई का ध्यान रखने का आदेश देते थे। एक अच्छे व बेहतर जीवन के लिए हमें स्वास्थ्य व तंदरुस्ती की ज़रूरत है और व्यक्तिगत सफ़ाई-सुथराई, स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। पैग़म्बरे इस्लाम सफ़ाई को बहुत अधिक पसंद करते थे और अपने शरीर व वस्त्रों की सफ़ाई में अद्वितीय थे। इसके अतिरिक्त वे वुज़ू करने और नहाने को उपासना बताया करते थे। वे अपने साथियों व अनुयाइयों से कहते थे कि वे अपने चेहरों, वस्त्रों व घरों को साफ़ रखें। वे उनसे कहते थे कि शुक्रवार के दिन अवश्य स्नान करें और इत्र लगाएं ताकि दूसरों को उनकी दुर्गंध से तकलीफ़ न हो।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम कहते थे कि जहां तक संभव हो, साफ़ सुथरे रहो क्योंकि ईश्वर ने इस्लाम का आधार पवित्रता पर रखा है और पवित्र लोगों के अतिरिक्त कोई भी स्वर्ग में नहीं जाएगा। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि व्यक्तिगत सफ़ाई सुथराई के लिए बचपन व लड़कपन का समय बहुत अहम है। परिवार और विशेष कर माता-पिता, अपने व्यवहार और आदतों में विशेष कर सफ़ाई सुथराई में बच्चों के आदर्श होते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार खाने के बाद दांत साफ़ करना, नहाना, खाने से पहले और बाद में हाथ धोना, मुंह धोना, नाख़ुन काटना और इसी तरह की अन्य बातों का महत्व बच्चों को बचपन से ही समझाना चाहिए।

अलबत्ता अच्छी आदतें शुरू करने के लिए कभी देर नहीं होती और उन्हें कभी भी शुरू किया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को बचपन में सफ़ाई सुथराई और स्वास्थ्य का ध्यान रखने की शिक्षा नहीं दी गई है और वह ऐसे परिवार में पला बढ़ा है जिसमें इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता था तो उसे कोशिश करके यह बातें सीखनी चाहिए। जीवन के दिन गुज़रते जाते हैं और वे हमारी प्रतीक्षा में नहीं रहते अतः हमें प्रयास करके बेहतर जीवन के लिए क़दम उठाना चाहिए और इस काम को विलंबित नहीं करना चाहिए। 


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