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जल संकट, आशा व निराशाः अगर हम पर्यावरण से संबंधित समस्याओं पर नज़र डालें तो निश्चित रूप से पानी की कमी सब से बड़ी समस्या समझी जा

जल संकट, आशा व निराशाः अगर हम पर्यावरण से संबंधित समस्याओं पर नज़र डालें तो निश्चित रूप से पानी की कमी सब से बड़ी समस्या समझी जा

पानी का महत्व मानव जीवन ही नहीं बल्कि इस धरती पर जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है इस से तो लगभग सभी लोग अवगत हैं। पानी हमेशा ही विभिन्न धर्मों, कहानियों यहां तक कि गीत संगीत व कविताओं में प्रेरणा स्रोत रहा है।

हम सब जानते हैं कि हवा के बाद पानी सभी जीवित प्राणियों के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है और उनका अस्तित्व इस पर टिका हुआ है। जल, प्रकृति की देन है और मनुष्य से लेकर हर प्राणी और पेड़ पौधों के जीवन के लिए ज़रूरी है। धरती का तीन चौथाई हिस्सा पानी में डूबा है लेकिन अधिकांश जल स्रोत, खारे हैं और धरती पर मौजूद पानी में से मात्र एक प्रतिशत पानी, मीठा है और उसे पिया जा सकता है।

इस धरती पर मौजूद सभी जीव जंतुओं पेड़ पौधों को जो पानी की ज़रूरत है वह इसी एक प्रतिशत पानी से पूरी होती है लेकिन पानी का प्रतिशत कम हो रहा है जबकि उसे इस्तेमाल करने वाले बढ़ रहे हैं। दुनिया की आबादी बढ़ रही है और पानी कई वजहों से कम हो रहा है। इनमें से अधिकांश कारण, खुद इन्सान पैदा कर रहे हैं। प्रदूषण और कई कारणों से धरती का तापमान बढ़ रहा है और बर्फ और बारिश में भी भारी कमी हो रही है। यह सब को पता है कि धरती पर पानी सीमित मात्रा में हैं लेकिन इस दुनिया में अधिकांश लोग पानी को एसे इस्तेमाल करते हैं जैसे वह कभी खत्म ही नहीं होगा। अगर यही सिलिसला रहा है तो वह दिन दूर नहीं जब इस धरती को जल के भयानक संकट का सामना करना पड़ेगा। 

आज दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में सूखा, अपने पैर पसार रहा है। सूखे का सब से पहला परिणाम पानी की कमी के रूप में सामने आता है। इसके साथ ही जिस तरह से हम पानी को प्रदूषित कर रहे हैं और जिस तरह से दुनिया की आबादी बढ़ रही है उन सब को देखते हुए हम समझ सकते हैं कि सीमित मात्रा में मौजूद पानी को कितने और कैसे कैसे खतरों का सामना है?! 

ताज़ा अध्ययनों से पता चलता है कि दुनिया में चार अरब लोगों को पानी की कमी का सामना है और यही नहीं अध्ययन बताते हैं कि पानी की कमी, दुनिया की कुल आबादी के दो तिहाई भाग को साल में कम से कम एक महीने परशेान करती है। अध्ययनों से पता चलता है कि जल संकट की स्थिति उससे कहीं अधिक भयावह है जितनी पहले  समझी जाती थी। नये अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि दुनिया के पचास करोड़ लोग एसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां बारिश से जितना पानी गिरता है उससे दोगुना पानी का इस्तेमाल होता है। मतलब इन क्षेत्रों में एक साल में भरपूर बारिश अगर होती है तो उससे जितना पानी गिरता है उसका दोगुना पानी इस इन क्षेत्रों में रहने वाले एक साल में प्रयोग कर लेते हैं तो ज़ाहिर सी बात है वर्षों तक चलने वाली इस प्रक्रिया के नतीजे में भूमि में जल स्तर नीचा होता जा रहा है और पानी कम हो रहा है। वैसे आपको यह भी हम बता दें कि पानी की समस्या से जूझने वाले अधिकांश लोग, भारत और चीन में रहते हैं। अलबत्ता पानी की समस्या से जूझने वाले कुछ लोग केन्द्रीय व पश्चिमी अमरीका, आस्ट्रेलिया और यहां तक कि लंदन में भी रहते हैं। 

हालैंड में ट्विन्टे युनिवर्सिटी के प्रोफेसर एरजेन होकेस्ट्रा ने जल संकट पर बहुत काम किया है और व्यापक रूप से अध्ययन किया है। वह कहते हैं कि अगर हम पर्यावरण से संबंधित समस्याओं पर नज़र डालें तो निश्चित रूप से पानी की कमी सब से बड़ी समस्या समझी जाएगी। उन्होंने अपने हालिया अध्ययन में बताया है कि दुनिया के एक अरब अस्सी करोड़ लोग कम से कम से साल में छे महीने, पानी की कमी से जूझते है। 

पानी की कमी की इस समस्या से अगर आप नहीं जूझ रहे हैं तो यह न समझें कि आप बचे रहेंगे, यह संकट, फैल रहा है और अगर कुछ न किया गया तो फैलता रहेगा। जल संकट, हर प्रकार के संकट की जड़ है। 


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