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चीन का सरकारी मीडिया भारत को क्यों समझा रहा है कि अमरीका उसके काम नहीं आएगा?

चीन का सरकारी मीडिया भारत को क्यों समझा रहा है कि अमरीका उसके काम नहीं आएगा?

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े अख़बार ग्लोबल टाइम्ज़ ने लेखक आइ जुन का एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें भारत को दो बातें समझाने की कोशिश की गई हैं।

एक तो यह कि अमरीका कभी भी भारत के काम नहीं आएगा और दूसरे यह कि चीन सीमा विवाद के मामले में अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटेगा।

अख़बार ने लिखा कि जब सोमवार की रात भारत और चीन के सैनिक कमांडर वार्ता की मेज़ पर बैठे तो फ़ायनन्शियल टाइम्ज़ के लिए लिखने वाले स्तंभकार गीडियन रचमैन ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था कि भारत नए शीत युद्ध का एक सिरा संभाल रहा है। यह चीन के लिए अच्छी चीज़ नहीं होगी कि वह अपने प्रतद्वंद्वी को अमरीका की गोद में पहुंचा दे।

गलवान घाटी में जो कुछ हुआ वह चीन की ग़लती से नहीं भारत की ग़लती से हुआ। क्योंकि भारत के प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो ख़ुद बयान दिया कि चीनी सेना भारत के इलाक़े में दाख़िल नहीं हुई है।

रचमैन जैसे लोग अमरीका को आसमान पर बिठाने की कोशिश करते हैं वैसे हम देख रहे हैं कुछ देश हैं जो अमरीकी हितों की सेवा करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं। आस्ट्रेलिया, कैनेडा और ताइवान को इसी समूह में गिना जा सकता है जो अपने व्यापारिक हितों के लिए अमरीका को अपना सब कुछ पेश कर देते हैं। यह देश अमरीका के इशारे पर नाच रहे हैं।

भारत की बात की जाए तो इतने बड़े देश के लिए कूटनैतिक स्वाधीनता महत्वपूर्ण होती है। अमरीका अपनी इंडो पेसिफ़िक रणनीति के लिए भारत को प्रयोग करना चाहता है ताकि चीन पर अंकुश लगाए। भारत इस कोशिश में है कि अमरीका से अपने संबंधों को इस्तेमाल करते हुए चीन के प्रभाव के सामने अपनी स्थिति मज़बूत करे फिर भी भारत को यह अच्छी तरह पता है कि बड़े लक्ष्य हासिल करने में अमरीका उसकी मदद हरगिज़ नहीं करेगा।

अमरीका बहुत समय से इस कोशिश में है कि रूस के साथ भारत के रक्षा सौदों को दरकिनार करके भारत के सैन्य उद्योग का कंट्रोल अपने हाथ में ले ले। क्या यह संभव है कि भारत को इसकी जानकारी न हो? रूस से हथियारों की ख़रीदारी जारी रहना यह साबित करता है कि भारत के इरादे क्या हैं?

भारत और चीन के बीच जो सीमा विवाद है उसमें ऊंच नीच होती रहती है और इस बारे में चीन का स्टैंड साफ़ है जिसमें किसी तरह की कोई तबदीली नहीं होने वाली है। यह मुद्दा आपसी बातचीत से हल होना चाहिए इसमें किसी बाहरी को दख़्लअंदाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है।


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