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क्या सऊदी अरब और इमारात के बीच टूट गया है स्ट्रैटेजिक एलायंस? पांच बेहद महत्वपूर्ण कारणों पर एक नज़र

क्या सऊदी अरब और इमारात के बीच टूट गया है स्ट्रैटेजिक एलायंस? पांच बेहद महत्वपूर्ण कारणों पर एक नज़र

पिछले तीस साल से फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े में हमारे अरब भाई यही रट लगाए हुए हैं कि वह अन्य अरबों से निराले हैं। उनके पास असीम दौलत भी है जबकि इसके साथ ही वह बड़े संयमी लोग हैं कभी उत्तेजित नहीं होते, उनके देशों में बड़ी शांति और स्थिरता रहती है।

लेकिन अगर फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद और इसके सदस्य देशों के संबंधों पर सरसरी नज़र डाली जाए तो साफ़ दिखाई देगा कि विवाद और टकराव अपने चरम पर है। इन अरब देशों को एक पेज पर रखने का जो सपना देखा जा रहा था वह हवा हो चुका है।

यह भूमिका हमने सऊदी अरब और इमारात के बीच बढ़ते विवाद के दृष्टिगत लिखी है। अब यह विवाद खुलकर सामने आ गया और ओपेक प्लस के निर्णय पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।

दोनों देशों के टीवी चैनलों पर पिछले दो दिनों के दौरान जो शाब्दिक जंग नज़र आई है वह इससे पहले कभी नज़र नहीं आई। सऊदी अरब के तेल मंत्री प्रिंस अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान और उनके इमाराती समकक्ष सुहैल मज़रूई के बीच यह विवाद अपने चरम बिंदु पर पहुंच गया। सऊदी मंत्री ने कहा कि इमारात ने अपना अलग राग अलापा इसलिए समझौता नहीं हो पाया तो इसका जवाब मज़रूई ने यह दिया कि सऊदी अरब अपने स्वार्थों को दूसरे देशों के हितों पर थोपने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि इमारात हमेशा सऊदी अरब के फ़ैसलों का समर्थन करता आया है और क़ुरबानियां भी देता रहा है लेकिन अब इमारात चाहता है कि उसे इंसाफ़ से उसका हिस्सा मिले।

पिछले तीन साल से दोनों देशों का विवाद लगातार ज्वालामुखी के लावे की तरह पक रहा है। हालिया शाब्दिक टकराव दरअस्ल इसी विवाद का विस्फोटक प्वाइंट था। दोनों के बीच विवाद के मुद्दे कुछ इस प्रकार हैं।

  1. सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने देश की नीतियों में बदलाव किया और इमारात को टक्कर देने के उद्देश्य से पर्यटन इकानामी पर काम शुरू कर दिया। उन्होंने महिलाओं को आज़ादी दी और नियोम शहर की बुनियाद डाली ताकि दुबई को ज़ोरदार टक्कर दे सकें। यह तो सब जानते हैं कि दुबई में सैर सपाटे के लिए जाने वाले पर्यटकों में 50 प्रतिशत सऊदी नागरिक होते हैं। इमारात को चिंता है कि कहीं आमदनी का यह ज़रिया उसके हाथ से निकल न जाए।
  2. सऊदी अरब ने क़तर से मेलजोल कर लिया तो यह फ़ैसला इमारात पर बिजली बनकर गिरा। सऊदी अरब ने क़तर का बायकाट तो इमारात, बहरैन और मिस्र के साथ मिलकर किया था लेकिन क़तर से समझौता करना हुआ तो घटकों को किनारे लगाते हुए ख़ामोशी से अपना काम कर लिया। नतीजा यह निकला कि दोहा और रियाज़ के बीच संबंध बढ़े लेकिन दोहा और अबू धाबी के मध्य तनाव बढ़ता ही जा रहा है।
  3. सऊदी अरब ने अचानक फ़ैसला कर लिया कि उसकी धरती पर जो बड़ी कंपनियां काम कर रही हैं उनको अपना हेड आफ़िस इमारात से सऊदी अरब स्थानान्तरित करना पड़ेगा। अगर किसी कंपनी ने इस आदेश को नहीं माना तो सऊदी अरब में उसे काम करने से रोक दिया जाएगा। यह इमारात की इकानामी पर बहुत बड़ा वार था।
  4. सऊदी अरब को इस बात पर बड़ी नाराज़गी है कि इमारात ने यमन युद्ध से 2019 में बाहर निकलने का फ़ैसला अकेले कर लिया, सऊदी अरब को इस मामले में विश्वास में नहीं लिया। इसका कारण यह था कि यमन में इमारात के सैनिक मारे जा रहे थे और दूसरी ओर हूती आंदोलन ने दुबई और अबू धाबी पर मिसाइल हमले शुरू कर देने की धमकी दे दी थी। इमारात के सैनिक अब केवल दक्षिणी यमन में हैं जहां हूती संगठन के सैनिक नहीं हैं यानी उनसे टकराव की संभावना नहीं है।
  5. इमारात का इलज़ाम है कि सऊदी अरब ने उसे इस्राईल से समझौता करने के लिए आगे कर दिया और अब्राहम समझौता करवा दिया लेकिन ख़ुद सऊदी अरब ने इस्राईल से यही समझौता करने से पांव पीछे खींच लिए कि कहीं सऊदी अरब के भीतर भावनाएं न भड़क जाएं और दूसरी ओर ट्रम्प भी वाइट हाउस से विदा हो चुके थे जो इस्राईल से समझौते के लिए दबाव डाल रहे थे। बिन सलमान ने नेतनयाहू और माइक पोम्पेयो से नियोम शहर में मुलाक़ात भी की थी जिसमें समझौते के लिए रोडमैप तैयार किया गया था मगर इसके बाद वह डर गए और समझौते से पीछे हट गए।

मज़ेदार बात तो यह है कि इमारात अब क़तर के रास्ते पर चल रहा है यानी जिस तरह सऊदी वर्चस्व पर एतेराज़ करते हुए क़तर इस संस्था से निकला था उसी तरह इमारात भी इससे बाहर निकल रहा है।

क़तर के संबंध तो सऊदी अरब के साथ ही मिस्र से भी अच्छे हो रहे हैं मगर इस बीच इमारात बड़ी कठिन परिस्थितियों में फंसता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि इमारात को सऊदी अरब पर बड़ी नाराज़गी है अब देखना है कि इमारात सऊदी अरब के मीडिया पर रोक लगाता है या कोई और क़दम उठाता है।


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