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क्या भारत अपने पड़ोसियों को नज़र अंदाज़ करके चीन का मुक़ाबला कर सकेगा? मोदी सरकार के पास नीतियों में सुधार का अभी वक़्त है

क्या भारत अपने पड़ोसियों को नज़र अंदाज़ करके चीन का मुक़ाबला कर सकेगा? मोदी सरकार के पास नीतियों में सुधार का अभी वक़्त है

मोदी सरकार पिछले हफ़्ते चीन के साथ हुए सैन्य टकराव के नतीजे में राष्ट्र की आत्मा पर लगने वाले गहरे ज़ख्मों को भरने का प्रयास कर रही है।

चीनी सेना अपने क़दम वापस खींचकर स्थिति को किसी हद तक सामान्य कर सकती है, लेकिन मोदी सरकार के लिए अपनी नीतियों के आकलन का यह अच्छा समय है। और अगर वह ऐसा करती है, तो उसे पता चलेगा कि समस्याएं केवल बीजिंग तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत के अपने सभी पड़ोसियों के साथ संबंध ख़राब हैं।

हालांकि हालात थोड़ी सी समझदारी से काफ़ी अलग हो सकते थे। मई 2014 में प्रधान मंत्री बनने के फ़ौरन बाद, मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका के राष्ट्राध्यक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। सार्वजनिक कूटनीति में यह एक महत्वपूर्ण प्रयास था, क्योंकि इससे पहले भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया था। मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में भी पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारने का वादा किया गया था।

मोदी ने इस अवसर पर पहले पड़ोसी की नीति की शुरूआत की और सार्क देशों को प्राथमिकता देने पर ध्यान दिया। इसके नतीजे में क्षेत्रीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिला और भू-राजनीतिक तनावों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इससे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के ज़रिए पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के चीन के प्रयासों के ख़िलाफ़ एक स्वाभाविक वातावरण भी उत्नपन्न हुआ था।

लेकिन पड़ोसियों के साथ बहुत ही आशाजनक शुरुआत के बावजूद, मोदी सरकार ने बहुत ही जल्द उनके साथ रिश्तों को ख़राब कर दिया। 2019 में भारत और पाकिस्तान युद्ध के बहुत क़रीब चले गए और दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई बार भीषण झड़पें हुईं, जिसके परिणाम स्वरूप स्थिति किसी भी वक़्त बेक़ाबू हो सकती थी।

देश में सीएए और एनआरसी जैसी योजनाओं के ज़रिए जहां देश में करोड़ों अल्पसंख्यों में असुरक्षा की भावना पैदा की, वहीं बांग्लादेश, जैसे देश को भी नाराज़ किया, जिसके गठन में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। नेपाल की संसद ऐसे नए नक्शे को मंज़ूरी दे दी, जिसमें भारत के इलाक़ों को नेपाल का दिखाया गया है।

भारत के साथ ऐतिहासिक रूप से संबंद्ध रखने वाले श्रीलंका और मालदीव, तेज़ी से चीन के घनिष्ठ सहयोगी बनते जा रहे हैं। अफ़गानिस्तान में अमरीका ने तालिबान के साथ समझौता करके भारत के अब तक के सभी प्रयासों पर पानी फेर दिया है।

इसलिए भारत को अगर चीन जैसी बड़ी शक्ति का मुक़ाबला करन है तो नई दिल्ली को अपनी मौजूदा नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा और मोदी को पड़ोसियों की तरफ़ वही क़दम उठाना होगा, जो उन्होंने शुरू में उठाया था।


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