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क्या चल रहा है अरब देशों के शासकों के दिमाग में ईरान को लेकर?

क्या चल रहा है अरब देशों के शासकों के दिमाग में ईरान को लेकर?

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र अलअरबीयुलजदीद ने इलाक़े में दोस्ती और दुश्मनी तथा उसके पैमानों का जायज़ा पेश किया है।

क़तर के साथ चार अरब देशों की सुलह सफाई की वजह से सऊदी अरब और तुर्की के बीच सुलह की राह भी खुल गयी और संभावित रूप से क़तर ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई है। सब से पहली चीज़ जिस पर विश्लेषक ध्यान दे रहे हैं वह क़तर के साथ दोस्ती की तेज़ रफ्तार है हालांकि पहले यह लग रहा था कि सऊदी अरब क़तर के साथ दुश्मनी भुलाने में समय लगाएगा लेकिन हमने देखा कि सऊदी अरब ने बड़ी तेज़ी के साथ क़तर से संबंध सामान्य कर लिये और अब इस समय क़तर का बहिष्कार करने वाले अन्य अरब देशों को क़तर से साथ दोस्ती पर तैयार कर रहा है। साफ तौर पर यह महसूस किया जा सकता है कि सऊदी अरब , अमरीका में नये राष्ट्रपति के पद संभालने से पहले तक क़तर के साथ सभी बहिष्कार करने वाले देशों के संबंधों को सुधारना चाहता है।

सऊदी अरब और तुर्की के बीच दोस्ती के लिए बयान जारी करना बहुत अच्छी बात है लेकिन दोनों देशों के बीच मन मुटाव खत्म करने दोस्ती का रिश्ता बनाना इतना आसान नहीं है और उसके लिए इस तरह के बयान पर्याप्त नहीं हैं।

     जहां तक संबंधों की बात करें तो तुर्की द्वपक्षीय संबंधों के मामले में ईरान की तुलना में अरब देशों से अधिक निकट है क्योंकि सीरिया, इराक़, लेबनान औज्ञ यमन जैसे देशों में ईरान की योजना पूरी तरह से स्पष्ट है।

दूसरे स्तर पर फार्स की खाड़ी के अरब देशों के तुर्की के साथ संबंध एक अनिवार्य ज़रूरत बल्कि उससे ज़्यादा है क्योंकि इसका दोनों पक्षों को फायदा होता है और एक बड़ा फायदा यह है कि इलाक़े में ईरान की योजनाओं के सामने एक प्रकार का संतुलन पैदा होता है। अगले चरण में अरब देशों और तुर्की के बीच संबंधों का फायदा यह होता है कि इलाक़े की दौलत खत्म करने के लिए पश्चिम की कोशिशों के सामने खड़ा होना संभव होता है। विशेषकर इस लिए भी कि अमरीका और पश्चिम ने सन 2015 में फार्स की खाड़ी के साथ समर्थन व सहयोग के सभी समझौतों की अनदेखी करते हुए ईरान के साथ परमाणु समझौता कर लिया और मध्य पूर्व में अपने संबंधों के लिए ईरान को सब से आगे रखा। अगर हम आज के नक़्शे को देखें तो हमें पता चलेगा कि तुर्की और सऊदी अरब एक दूसरे से निकट हैं और अरबी व इसलामी शक्ति के रूप में एक दूसरे के साथ मिल कर इलाक़े में रणनैतिक क्रांति ला सकते हैं।

ढेर सारे हंगामों के बाद, अरब देशों और फिर सऊदी अरब और तुर्की में दोस्ती की कोशिश एक नया अध्याय है जो जमाल खाशुकजी की हत्या के बाद, सम्मान के आधार पर दोनों देशों  को फिर से जोड़ सकता है। वैसे रियाज़ अगर तुर्की के क़ानून के अनुसार इस मामले का समाधान पेश करे तो फिर वह सभी पक्षों को खुश करने में सफल हो जाएगा।

अलअरबीयुलजदीद के इस लेख से पता चलता है कि अरब देशों को ईरान की कितनी चिंता है? इस्लामी और अरब देशों का दुश्मन इस्राईल उनके लिए अब दोस्त हैं और वह ज़ायोनी शासन से संबंध बना रहे हैं लेकिन ईरान के खिलाफ मोर्चा बनाने के लिए जल्दी जल्दी उन सभी देशों से  संबंधों  की कड़वाहट दूर कर रहे हैं जिनसे उनकी दुश्मनी युद्ध की हद तक बढ़ गयी थी। अरब देशों  का यह रवैया समझ से बाहर है।Q.A.

लेख में कही बातों से पार्स टू डे का सहमत होना आवश्यक नहीं है।  


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