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क़ुरैश के सबसे धनी और अपने समय के सबसे बड़े शायर ने इस्लाम की दावत सुनकर क्या कहा?

क़ुरैश के सबसे धनी और अपने समय के सबसे बड़े शायर ने इस्लाम की दावत सुनकर क्या कहा?

वलीद बिन मुग़ीरा नाम का व्यक्ति क़ुरैश क़बीले का पूंजीपति और पैसे वाला व्यापारी था।

उसके पास काफी धन था इस प्रकार से कि काबे को ढकने के लिए जो पर्दा व कपड़ा लगाया जाता था एक साल वह अपने दम पर खरीदता और लगाता था जबकि क़ुरैश क़बीले के दूसरे समस्त लोग मिलकर क़ाबे को ढकने वाले पर्दे की ख़रीदारी करते थे। दूसरे शब्दों में आर्थिक दृष्टि से वह अकेले ही पूरे क़ुरैश क़बीले के बराबर था और इसलिए उसे इद्ल कहा जाता था।

इसी प्रकार वह अरबी ज़बान इतनी अच्छी बोलता था कि उसे रैहानतुल क़ुरैश यानी क़ुरैश की सुगंध कहा जाता था। इस आधार पर जब कोई शायर शेर कहता था तो सबसे पहले उसे दिखाता था ताकि वह उस शेर की पुष्टि करे परंतु इतनी बुद्धि, समझदारी और धन- सम्पत्ति होने के बावजूद वलीद बिन मुग़ीरा पैग़म्बरे इस्लाम को सहन न कर सका और वह पैग़म्बरे इस्लाम के मुकाबले में कुरैश के काफिर व अनेकेश्वरवादियों का नेतृत्व करता था।

एक बार पैग़म्बरे इस्लाम ख़ानये काबा का तवाफ़ अर्थात परिक्रमा करके मस्जिदुल हराम में बैठकर पवित्र कुरआन के सूरे ग़ाफ़िर की तिलावत कर रहे थे। उसी समय वलीद बिन मुग़ीरा का वहां से गुज़र हुआ। पवित्र कुरआन के आकर्षण ने उसे अपनी ओर खींचा परंतु उसके अंदर जो अहंकार भरा था वह ईश्वरीय बातों को स्वीकार करने के मार्ग में रुकावट बन गया। अतः वह विदित में उपेक्षा व अनसुना करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम के पास से गुज़र गया। अगले दिन वलीद बिन मुग़ीरा काबे के सामने हजरे इस्माईल नाम के पत्थर पर बैठा था कि पैग़म्बरे इस्लाम ने सूरे फुसेल्लत की कुछ आयतों की तिलावत की यहां तक कि इस सूरे की 13वीं आयत तक पहुंचे जिसमें महान ईश्वर कह रहा है अगर इन आयतों को सुनने के बाद मुंह फेर लेते हैं तो हे पैग़म्बर आप इनसे कह दें कि मैं तुम्हें आद और समूद पर गिरने वाली बिजली से डराता हूं! जैसे ही वलीद ने पवित्र कुरआन की यह आयत सुनी वह थर्रा गया और जल्दी से उठा और अपने घर चला गया और घर का दरवाज़ा बंद कर लिया।

दूर से क़ुरैश क़बीले के बड़े लोग यह सब देख रहे थे इसलिए वे वलीद के कार्य से चिंतित थे और अबू जेहल से कहा कि तेरे चचा वलीद ने मोहम्मद के धर्म को स्वीकार कर लिया! उसके अगले दिन अबू जेहल वलीद के पास गया और कहा, चचा आपने मेरा सिर नीचा कर दिया मुझे अपमानित कर दिया! इस पर वलीद ने कहा कि भतीजे किस प्रकार मैंने सिर झुका दिया? अबू जेहल ने उससे कहा इसलिए कि आपने मोहम्मद के धर्म को स्वीकार कर लिया है! वलीद बिन मुग़ैरा ने विदित हंसी के साथ कड़वे स्वर में जवाब दिया, नहीं बिल्कुल नहीं। मैंने मोहम्मद के धर्म को स्वीकार नहीं किया है। मैं अब भी अपनी क़ौम व पूर्वजों के धर्म पर बाकी हूं परंतु मैंने मोहम्मद की ज़बान से ऐसी बात सुनी जिसने मुझे हिलाकर रख दिया। उसके बाद वलीद ने पवित्र कुरआन के बारे में कहा, उसकी बातें यानी हज़रत मोहम्मद की बातें एक विशेष प्रकार की मिठास रखती हैं और कोई भी वाणी उससे श्रेष्ठ नहीं है। वह समस्त वाणियों से श्रेष्ठ है।

हज का मौसम निकट था और क़ुरैश पहले से अधिक चिंतित था। क़ुरैश के कुछ लोग मस्जिदुल हराम में जमा थे। उनमें से एक ने वलीद बिन मुग़ीरा को संबोधित करके कहा शीघ्र ही हर तरफ से लोग मक्का आयेंगे और इस बात की संभावना व आशंका है कि लोग मोहम्मद की बातों को सुनकर उनकी ओर आकर्षित हो जायेंगे। हम किस तरह लोगों को उन पर ईमान लाने से रोकें? इसके जवाब में वलीद ने कहा इसका मात्र एक ही रास्ता है और वह यह है कि हम एकजुट हो जायें और मोहम्मद की बातों के मुकाबले में केवल एक ही बात कहें। ऐसा न हो कि जिसके दिल में जो आये वह कहे। उनमें से एक ने कहा कि ठीक है। सब मिलकर एक ही बात कहेंगे कि मोहम्मद झूठे हैं इस पर दूसरों ने कहा कि ऐसा संभव नहीं है। क्योंकि उन्होंने चालिस साल तक लोगों के मध्य सच्चाई और अमानतदारी से ज़िन्दगी गुज़ारी है यह कैसे संभव है कि हम कह दें कि मोहम्मद झूठे हैं? उसके बाद दूसरे व्यक्ति ने कहा कि हम लोग कहेंगे कि वह पागल हैं परंतु इस बात का भी कुछ ने विरोध किया क्योंकि जिस इंसान को सब जानते हैं कि वह बुद्धि और समझदारी में सर्वोपरि है हम किस पर उसे पागल कहें? इसके बाद क़ुरैश क़बीले के तीसरे व्यक्ति ने कहा कि वह पुरोहित हैं इस पर वलीद ने कहा कि ईश्वर की सौगंध वह पुरोहित नहीं हैं हमने पुरोहितों को देखा है परंतु मोहम्मद की बातें पुरोहितों की बातों से भिन्न हैं। इसके बाद क़ुरैश क़बीले के एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि हम कहेंगे कि मोहम्मद शायर हैं फिर वलीद ने विरोध किया और कहा मोहम्मद शायर भी नहीं हैं क्योंकि हमने विभिन्न प्रकार के शायरों व शेरों को देखा है और उनकी बातें शेर नहीं हैं। इस पर क़ुरैश क़बीले के अंतिम व्यक्ति ने कहा कि हम कहेंगे कि मोहम्मद जादूगर हैं! वलीद ने इस बार सिर हिलाया और कहा हमने समस्त प्रकार के जादूगरों और उनके जादुओं को देखा है और मोहम्मद का कार्य किसी प्रकार जादूगर से नहीं मिलता परंतु यह प्रस्ताव दूसरे समस्त प्रस्तावों से बेहतर है। हां हम सब मोहम्मद को जादूगर कहेंगे। क्योंकि उनकी बातों में जादू है और वह अपनी बातों से बाप- बेटे में, पति- पत्नी में और कुटुम्ब और परिवार में दूरी उत्पन्न कर रहे हैं।

अब्दुल्लाह बिन बनी उमय्या पैग़म्बरे इस्लाम का घोर दुश्मन था। वह लाठी टेकता हुआ घर से बाहर आया और मक्के के चार सरदारों के पास गया और उन्हें मेहमानी के लिए आमंत्रित किया। सब समझ गये कि अब्दुल्लाह के दिमाग़ में पैग़म्बरे इस्लाम से मुकाबले की कोई नई आइडिया आ गयी है यह सोचकर सबने उसके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और रात को उसके घर में सब जमा हुए। जो लोग उसके घर में जमा हुए थे उनमें वलीद बिन मुग़ैरा भी था।

यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है और वह यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम को जादूगर कहने का जो फैसला लिया गया था उसमें वलीद की कोई विशेष भूमिका नहीं थी इसलिए वह अधिक मुस्तैदी के साथ अब्दुल्लाह बिन उमय्या के घर आया था। अलबत्ता जो चार लोग अब्दुल्लाह बिन बनी उमय्या के घर में जमा हुए थे वे लोग मूर्तियों की पूजा में कोई विशेष आस्था नहीं रखते थे किन्तु अरब जगत में मूर्तिपूजा प्रचलित थी और वह इस बात को जानते थे कि यह तार्किक कार्य नहीं है फिर भी वे खुलकर न तो इसका विरोध करते थे और न ही इस्लाम धर्म की जीवनदायक शिक्षाओं को स्वीकार करते थे।

बहरहाल बोलने वाला पहला मेहमान वलीद बिन मुग़ीरा था। वह इस प्रकार कहता है अब तक मोहम्मद को पराजित करने के लिए जो भी षडयंत्र रचा गया सब फेल हो गया। हमने मोहम्मद को पागल और जादूगर सब कहा। मोहम्मद और उनके साथियों को कड़ी से कड़ी यातनायें दीं परंतु सबने बड़े आत्म विश्वास और साहस के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। हे अब्दुल्लाह अब तुम्हारे दिमाग़ में क्या नया विचार आया है? जिसके लिए तुमने हम सबको यहां बुलाया है? मुकरेज़ बिन हम्स, अम्र बिन अब्दुल्लाह और आस बिन अम्र ने भी वही सवाल किया। कुछ देर तक चुप रहने के बाद अब्दुल्लाह ने उन सबको शराब पिलाई और उसके बाद इस प्रकार कहा जैसाकि तुम लोग जानते हो कि इस बैठक का लक्ष्य मोहम्मद का मुक़ाबला करना है परंतु नये और पहले से भिन्न तरीक़े से। हम आपस में सलाह- मशवेरा और विचारों का आदान- प्रदान करके उन्हें मात दे सकते हैं। अम्र, शास्त्रार्थ करने में पैग़म्बरे इस्लाम की ताक़त से अवगत था उसने अब्दुल्लाह की बात बीच में ही काट दी और कहा इस तरीक़े से हम नहीं जीत सकते कोई और रास्ता सोचें। अब्दुल्लाह ने उसके जवाब में कहा इस बार हम उन्हें एक सार्वजनिक स्थल पर उनसे एक ऐसा सवाल करेंगे जिसके जवाब में वह असमंजस में पड़ जायेंगे। इस स्थिति में हम मोहम्मद के अनुयाइयों को उनसे दूर कर देंगे और उन्हें अपमानित करके हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे।

उसके अगले दिन सब मिलकर पैग़म्बरे इस्लाम के पास गये। पैग़म्बरे इस्लाम अपने कुछ अनुयाइयों के साथ बैठे थे। पैग़म्बरे इस्लाम के अनयाइयों ने सोचा कि अनेकेश्वरवादी पैग़म्बरे इस्लाम को कष्ट पहुंचाना चाहते हैं यह सोचकर उन्होंने अनेकेश्वरवादियों को पैग़म्बरे इस्लाम के पास जाने से रोकने के प्रयास किया परंतु पैग़म्बरे इस्लाम ने अनेकेश्वरवादियों को अपने पास आने दिया। जब सब बैठ गये तो वलीद बिन मुग़ैरा ने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करके कहा तुम जानते हो कि हम अपने पूज्यों व मूर्तियों का बहुत सम्मान करते हैं और उनके अपमान को बर्दाश्त नहीं करेंगे। अब तक हमने जो तुम्हारे धर्म को स्वीकार नहीं किया तो उसकी वजह यह है कि तुम्हारी किताब में हमारी मूर्तियों को बहुत बुरा -भला कहा गया है और तुमने हमारी मान्यताओं का बहुत अपमान व अनादर किया है हमसे तुम किस प्रकार उम्मीद रखते हो कि हम तुम पर भरोसा करें और तुम्हारे धर्म को स्वीकार कर लें? हम केवल एक दशा में तुम पर ईमान लायेंगे जब तुम कुरआन की जगह ऐसी किताब लाओ जो हमें मूर्तिपूजा करने से न रोके या कम से कम कुरआन से उन बातों को हटा दो जिसमें हमारी मान्यताओं का अनादर किया गया है! उस स्थिति में हम तुम पर ईमान लायेंगे।

उस समय पवित्र कुरआन के सूरे युनूस की 15 से 17 तक की आयतें नाज़िल हुईं जिसमें महान ईश्वर कह रहा हैः जब हमारी आयतें स्पष्ट शब्दों में उन पर पढ़ी जाती हैं तो जो लोग हमसे मुलाक़ात की उम्मीद नहीं रखते वे कहते हैं कि इस क़ुरआन के अलावा कोई दूसरा कुरआन लाओ या उसे बदल दो तो हे पैग़म्बर आप उनसे कह दें कि हमें अपनी तरफ़ से बदलने का कोई अधिकार नहीं है और जो हम पर उतारा जाता है उसके अलावा हम किसी और चीज़ का अनुसरण नहीं करते हैं। अगर मैं अपने पालनहार की अवज्ञा करूं तो प्रलय के दिन से डरता हूं। कह दो कि अगर ईश्वर चाहता कि मैं इन आयतों को तुम पर न पढ़ूं तो ईश्वर तुम्हें इस बात से अवगत न करता। इससे पहले काफी समय तक मैंने तुम्हारे बीच ज़िन्दगी गुज़ारी है। क्या सोचते नहीं हो? तो उससे बड़ा अत्याचारी कौन है जिसने ईश्वर पर झूठ बाधा है या उसकी आयतों को झुठलाया है? निः संदेह अपराधी कामयाब व सफल नहीं होंगे।


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