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ईदे फित्र के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम

ईदे फित्र के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम

दोस्तो रमज़ान का पवित्र महीना समाप्त हो चुका है।

सारी दुनिया के मुसलमान ईद मना रहे हैं। वास्तव में यह उन इंसानों की ईद है जिन्होंने महान ईश्वर के इस पवित्र व श्रेष्ठतम महीने से तक़वा और सदाचारिता का पाठ लिया है। ईदे फित्र महान ईश्वर के उन बंदों की ईद है जिन्होंने स्वयं को तक़वा अर्थात महान ईश्वर के भय व सदाचारिता से सुसज्जित किया और अपनी आत्मा को निश्चेतना की नींद से मुक्त कर लिया। ईदे सईद फित्र विश्व के समस्त मुसलमानों की ईद है। एक महीने तक रोज़ा रखने, पवित्र कुरआन की तिलावत करने, आत्म निर्माण का अभ्यास करने और बुरे व ग़लत कार्यों से दूरी करने वाले ईद की नमाज़ की तैयारी कर रहे हैं और एक बार फिर से इस्लाम की शक्ति का प्रदर्शन करेंगे।

ईदे फ़ित्र का दिन बहुत बड़े परिवर्तन का दिन है यह दिन महान ईश्वर पर आस्था रखने और उसकी उपासना करने वाले ईमानदार लोगों के जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन का दिन है। यह मुसलमानों की एकता और उनकी शक्ति के प्रदर्शन का दिन है। इसी प्रकार यह दिन इंसान की उसकी अस्ल प्रवृत्ति की ओर पलटने का दिन है। आज के दिन मुसलमान ईदे फ़ित्र की नमाज़ पढ़कर और एक दूसरे के साथ ख़ुशिया मनाकर यह दिखा देंगे कि पूरी दुनिया के मुसलमान एक राष्ट्र हैं।  

ईदे फ़ित्र की नमाज़ों में मुसलमानों के मध्य एकता व समरसता को देखकर उनके दुश्मन एक बार फिर निराश हो गये हैं। दुनिया के मुसलमान अपने धार्मिक भाइयों के साथ मिलकर महान व सर्वसमर्थ ईश्वर को याद करके उससे मदद मांग रहे हैं। यह ईद वास्तव में भौतिक व सांसारिक ईद नहीं है बल्कि महान ईश्वर की कृपा व दया की ईद है। यह महान ईश्वर द्वारा माफ़ कर दिये जाने और उसका शुक्र अदा करने की ईद है। इस दिन सारे मुसलमान ईदे फ़ित्र की नमाज़ से पहले फित्रा नाम की एक विशेष धार्मिक राशि निकालते हैं और इस राशि का निकालना हर मुसलमान पर अनिवार्य है चाहे उसने पवित्र रमज़ान का रोज़ा रखा हो या न रखा हो। बड़ा हो या बूढ़ा बच्चा हो या जवान, महिला हो या पुरुष। यहां तक कि नवजात शिशु की तरफ से भी ज़काते फ़ित्रा निकालना ज़रूरी है और यह राशि ग़रीब मुसलमानों को दी जाती है। इस प्रकार वे भी इस दिन खुशी मनाते और महान ईश्वर को याद करते हैं। ईदे फ़ित्र का दिन इस्लाम धर्म की शिक्षाओं को जीवित होने का एक बेहतरीन अवसर है इस चीज़ को चाहे ईद के ख़ुत्बों के माध्यम से बयान किया जाये या ईदे फित्र के अवसर पर पढ़ी जाने वाली नमाज़ से। इस दिन सारे मुसलमान महान ईश्वर का गुणगान करते हुए कहते हैं”  हे ईश्वर यह वह दिन है जिसे तूने मुसलमानों के लिए ईद क़रार दिया है और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम के लिए पूंजी, शरफ, दया और स्थान के ऊंचा होने का माध्यम क़रार दिया है।

ईदे फित्र की नमाज़ के लिए लोगों की जो भारी भीड़ निकलती है उसे देखकर प्रलय का दृश्य याद आ जाता है। लोग गिरोह- गिरोह में ईदे फित्र की नमाज़ पढ़ने के लिए निकलते हैं। ठीक यही दृष्य प्रलय के दिन का होगा जब महान ईश्वर के आदेश से सबको दोबारा ज़िन्दा किया जायेगा और लोग गिरोह-गिरोह में प्रलय के मैदान में इकट्ठा होंगे। यह वह दिन होगा जब हर इंसान अपनी फिक्र में होगा। कोई किसी के काम नहीं आयेगा। हर इंसान के कर्म ही उसके वास्तविक साथी होंगे। आपाधापी यानी नफ्सी- नफ्सा का आलम होगा। इसी तरह फित्र की नमाज़ पढ़ने के लिए लोग गिरोह- गिरोह करके निकलेंगे।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ईदे फित्र के दिन जो खुत्बा दिया था उसमें आप मोमिनों को शुभ सूचना देते हुए कहते हैं” हे लोंगो यह आप का दिन है! यह वह दिन है जब अच्छे लोगों को उनके कर्मों का प्रतिदान दिया जायेगा और ग़लत व बुरे लोग इस दिन निराश होंगे। यह दिन प्रलय के दिन से बहुत मिलता है। तो जब तुम अपने घरों से निकल कर ईदगाह की ओर बढ़ते हो तो उस समय को याद करो जब अपनी क़ब्रों से उठाकर ईश्वर की बारगाह की ओर लाए जाओगे। जब तुम ईद की नमाज़ के लिए खड़े होते हो तो उस क्षण को याद करो जब तुम्हें ईश्वर की बारगाह में ख़ड़ा किया जायेगा। इसी प्रकार जब तुम अपने घरों को लौटेगे तो स्वर्ग की ओर अपनी वापसी के बारे में सोचो। हे ईश्वर के बंदो! रोज़ा रखने वाली महिलाओं और पुरुषों को जो सबसे कम चीज़ दी जायेगी वह यह है कि रमज़ान के अंतिम दिन एक फरिश्ता उन्हें आवाज़ देगा और कहेगा कि शुभसूचना है उन बंदों के लिए जिनके अतीत से लेकर आज तक के सारे पाप माफ कर दिये गये तो अपने भविष्य की सोच में रहो कि उन दिनों को किस प्रकार गुज़ारगो।

जब इंसान रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़े रखता है तो उसके दिल नर्म हो जाते हैं और आत्मा में एक विशेष प्रकार की चमक व निखार आ जाता है। इंसान महान ईश्वर की विशेष कृपा का पात्र बन जाता है। दूसरे शब्दों में इंसान अपनी क्षमता के अनुसार पवित्र रमज़ान महीने की बरकतों से लाभ उठाता है। ईदे फित्र वास्तव में वह दिन है जिस दिन इंसान ने रमज़ान के पवित्र महीने की बरकतों से जो लाभ उठाया है उसके परिणाम में सीधे रास्ते पर चलने का निर्णय करता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम एक स्थान पर ईद की वास्तविकता के बारे में फरमाते हैं” हर वह दिन ईद है जिस दिन ईश्वर की अवज्ञा व पाप न हो।

ईदे फित्र वह दिन है जब इंसान सदाचारी बनने और पापों से दूरी का फैसला करता है। जिस तरह जब कोई इंसान नया अथवा साफ- सुथरा वस्त्र धारण करता है तो उसकी पूरी कोशिश उसे गंदा होने से बचाने की होती है। यही नहीं अगर उसके साफ- सुथरे या नये वस्त्र का कोई भाग गंदा हो जाता है तो वह उसे तुरंत साफ करने का प्रयास करता है। ठीक उसी तरह जिस इंसान ने रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखा है अपनी आत्मा को विशुद्ध किया है वह हमेशा पापों से दूर रहने का प्रयास करेगा और जब कभी- कभी पाप हो जायेगा तो तुरंत उससे तौबा व प्रायश्चित करने का प्रयास करेगा। जिस इंसान ने रमजान में रोज़े रखा उसे इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि इसके बदले में उसे जो मिला है उसके गम्भीर दुश्मन भी हैं। शैतान और उसकी जैसी सोच रखने वाले घात लगाये बैठे हैं ताकि इस रमज़ान महीने में जो कुछ उसने कमाया है उसे ले लें। अगर किसी इंसान को यही न ज्ञात हो कि उसे रमज़ान में रोज़ा रखने और पापों से दूरी के बदले में क्या मिला है तो वह अपनी पूंजी से निश्चेत रहेगा और बड़ी आसानी से पापों को अंजाम दे सकता है।  

ईदे फित्र नये सिरे से अमल आरंभ करने का दिन है। ईदे फित्र के दिन रमज़ान महीने में रोज़ा रखने वाला इंसान नया जीवन आरंभ करता है। दूसरे शब्दों में जो इंसान रमज़ान महीने से पहले था अब वह दूसरा इंसान हो चुका होता है यानी उसका स्वभाव और आचरण बदल चुका होता है। वह अधिक चिंतन- मनन के साथ ज़िदंगी गुज़ारेगा। रोज़ा रखकर उसे दूसरों की भूख- प्यास का आभास हो गया है।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ईदे फित्र को हर मुसलमान के नये आध्यात्मिक जीवन का नया आरंभ मानते और कहते हैं” हर ईदे फित्र जागरुक मुसलमान के लिए एक वास्तविक ईद का दिन हो सकता है। जिस तरह वनस्पयियों और वृक्षों के लिए बंसत ऋतु एक नया जीवन हो सकती है उसी तरह यह ईद उस इंसान के लिए नये आध्यात्मिक जीवन का आरंभ हो सकती है जिसने पूरे साल के दौरान पाप किया हो। यह उसके लिए एक अद्वितीय अवसर है और यह अवसर रमज़ान का पवित्र महीना है। रमज़ान का महीना अपनी पवित्र प्रवृत्ति की ओर वापसी के अभ्यास का महीना है। मुसलमान खुले आसमान में ईद की नमाज़ पढ़ते और महान ईश्वर का सज्दा करते हैं और उसकी महानता का गुणगान करते हैं। यह वह दिन है जो  रोज़ेदार इंसान का महान ईश्वर से संपर्क स्थापित करता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईदे फित्र के दिन अपने एक खुत्बे में महान ईश्वर का गुणगान करने के बाद कहते हैं” यह वह दिन है जिसे ईश्वर ने तुम्हारे लिए ईद करार दिया है, तुम्हें उसे समझने की कृपा प्रदान की है। तो ईश्वर को याद करो वह तुम्हें याद करेगा उससे दुआ करो वह तुम्हारी दुआओं को क़बूल करेगा। कार्यक्रम के अंत में महान ईश्वर का शुक्र अदा करते और कहते हैं कि हे ईश्वर हम तेरा आभार प्रकट करते हैं कि एक महीने तक हम तेरे मेहमान थे। तूने मुझे नमाज़ पढ़ने, दुआ करने और रोज़ा रखने का सामर्थ्य प्रदान किया। हे पालनहार! हमें रमज़ान महीने की उपलब्धियों को समझने और उन्हें सुरक्षित रखने का सामर्थ्य प्रदान कर।




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