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ईदे ग़दीर का विशेष कार्यक्रम

ईदे ग़दीर का विशेष कार्यक्रम

पैग़म्बरे इस्लाम के पावन जीवन के अंतिम क्षण थे।

उस समय उन्होंने फरमाया मैं तुम्हारे बीच दो मूल्यवान चीज़ें छोड़कर जा रहा हूं। एक ईश्वरीय किताब और दूसरे हमारे अहले बैत और ये दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि दोनों हौज़े कौसर पर मेरे पास आयेंगे।

एक के बाद एक दिन बीत रहा है। अभी कुछ दिन पहले अरफ़ा दिवस था। अरफ़ा वह दिन था जिसने महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की ओर पहचान का द्वार खोल दिया था और शीघ्र ही वह दिन बीत गया। उसके बाद ईदुल अज़हा का दिन आया और सबने हज़रत इब्राहीम का अनुसरण करते हुए महान ईश्वर के प्रेम में और उसका सामिप्य प्राप्त करने के लिए कुर्बानी की। ईश्वर की राह में कुर्बानी करने वाले आज के दिन ग़दीर के मैदान में पहुंचते हैं। ग़दीर वह जगह है जिसका संबंध हौज़े कौसर से बहुत गहरा है। अभी कुछ दिन पहले पवित्र नगर मक्का का वातावरण लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक की ध्वनी से गूंज रहा था। हज़ारों हाजी पैग़म्बरे इस्लाम के इस आसमानी वाक्य को दोहरा रहे थे कि पालनहार हम तेरी ओर आये हैं। हमने  तेरे निमंत्रण को स्वीकार किया है और उसका जवाब दे रहे हैं, तेरा कोई समतुल्य नहीं है, हम तेरे बंदे हैं, समस्त  प्रशंसा तुझ से विशेष है, समस्त नेमतओं और समूचे ब्रह्मांड का स्वामी तू है, तेरा कोई समतुल्य नहीं है और हम तेरी आवाज़ पर लब्बैक कहते हैं यानी हम तेरे निमंत्रण को स्वीकार करते हैं।

ज़िक़ादा महीने के अंत में पैग़म्बरे इस्लाम अपने  साथियों, अनुयाइयों, परिजनों और बहुत अधिक मुसलमानों के साथ हज करने के लिए मदीना से मक्का रवाना होते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम की यह यात्रा कुछ वर्षों के उनके प्रयासों के सुपरिणामों का प्रतिबिंबन थीं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने लोगों के पथ- प्रदर्शन के लिए अपनी जान- माल और जीवन, सब कुछ समर्पित कर दिया था ताकि लोगों तक ईश्वरीय संदेशों को पहुंचा सकें। पैग़म्बरे इस्लाम इस यात्रा में संकेत करते थे कि यह उनके जीवन की अंतिम यात्रा है यानी उनका स्वर्गवास निकट है। पैग़म्बरे इस्लाम इस बात से प्रसन्न थे कि शीघ्र ही वह अपने पालनहार के पास जाने वाले हैं। साथ ही वह इस बात से भी चिंतित थे कि कहीं मेरी जाती व कौम के लोग भी बनी इस्राईल की भांति मेरे बाद दोबारा इस्लाम से पहले अज्ञानता के काल की परंपराओं की ओर लौट जायें। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम हर अवसर से लाभ उठाते और लोगों को नसीहत करते और उपदेश देते थे। पैग़म्बरे इस्लाम अरफात नामक मैदान में पहुंचने से पहले नमरा नामक स्थान पर सामूहिक रूप से दोपहर की नमाज़ पढ़ते हैं। नमाज़ समाप्त होने के बाद नमाज़ियों को देखते हैं। पूरा मरुस्थल लोगों और नमाज़ियों से भरा था। पैग़म्बरे इस्लाम ने सबसे पहले महान ईश्वर का गुणगान किया और उसके बाद लोगों से इस प्रकार कहा हे लोगो! मेरी बात सुनो शायद मैं इस वर्ष के बाद तुम्हें इस स्थान पर न देखूं। हे लोगो! मेरे बाद दोबारा कुफ्र के समय की अज्ञानता की ओर न लौट जाना। अगर एसा किये तो तुम गुमराह और गुमराह करने वाले हो जाओगे। निश्चित रूप से मैं तुम्हारे बीच दो मूल्यवान चीज़ें छोड़कर जा रहा हूं और जब तक तुम इन दोनों से जुड़े रहोगे मेरे बाद कभी भी गुमराह नहीं होगे। एक ईश्वरीय किताब कुरआन और दूसरे मेरे अहले बैत हैं। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने लोगों से पूछा क्या मैंने ईश्वरीय आदेशों को आप लोगों तक पहुंचाया और उसके धर्म का प्रचार- प्रसार किया? सबने कहा कि जी हां। इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा हे ईश्वर तू गवाह रहना! इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया निश्चित रूप से तुम सबके सब ज़िम्मेदार हो। इस आधार पर तुम सब पर अनिवार्य है कि जो लोग मौजूद नहीं हैं उन तक यह बात पहुंचा दो। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम अरफात नाम विशाल मैदान की ओर गये, वहां ठहरे और शाम तक नमाज़, दुआ और  ईश्वरीय गुणगान में लीन रहे। यह पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन का अंतिम हज था। महान ईश्वर के संदेशों को पहुंचाने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने बहुत ही उत्तम ढ़ंग से इससे लाभ उठाया। उन्होंने 13 ज़िलहिज्जा को लोगों को ख़ीफ़ मस्जिद में जमा किया और नमाज़ के बाद ख़ुत्बा देना आरंभ किया। जिन विषयों के बारे में ख़ुत्बा दिया उनमें से एक कबायली संबंध थे। अरब, क़बाएली संबंधों के आधार पर जीवन व्यतीत करते थे और उनके मध्य जो परम्परायें थीं उनका आधार पक्षपात और अज्ञानता था। इस प्रकार से कि कभी एक व्यक्ति की हत्या की वजह से दो कबीलों में दसियों साल लड़ाई और विवाद चलता- रहता था। पैग़म्बरे इस्लाम ने अरबों के मध्य से इस बात को समाप्त करने के लिए अपने ख़ुत्बों में एक भाग में कहाः अज्ञानता के काल में जिस धन और ख़ून पर गर्व किया जाता था मैंने उसे बातिल व ग़लत करार दे दिया।

 पैग़म्बरे इस्लाम इस तरह अरबों के बीच प्राचीन द्वेष को समाप्त करना चाहते थे। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने मुसलमानों के मध्य भाईचारे की ओर संकेत किया और फरमाया” मुसलमान, मुसलमान का भाई है और मुसलमान आपसे में भाई- भाई हैं और मुसलमान दूसरों के मुकाबले में एक हाथ हैं।“

पैग़म्बरे इस्लाम ने जब मक्का से मदीना पलायन किया था तब उन्होंने मक्का से मदीना पलायन करने के आने वालों और मदीना में रहने वाले मुसलमानों को एक दूसरे का भाई बनाया था और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को ख़ुद अपना भाई बनाया था परंतु पैग़म्बरे इस्लाम ने उस समय जो मुसलमानों को एक दूसरे का भाई बनाया था वह समय और परिस्थिति अलग व भिन्न थी और वह मुसलमानों के मध्य एक दूसरे के प्रति सहानुभूति से भी बड़े उद्देश्य को प्राप्त करना चाह रहे थे। जब वह अपने जीवन की अंतिम हज यात्रा से लौट रहे थे तो उस समय उन्हें स्वयं मुसलमानों के अंदर और बाहर दोनों से खतरा था। उन्होंने एक बार फिर हदीसे सक़लैन की ओर इशारा किया और लोगों को अपने हाथ की दो उंगलियों को दिखाया और कहा कि जिस तरह मेरे हाथ की दोनों उंगलियां एक दूसरे से अलग नहीं होंगी उसी तरह ईश्वर की किताब और मेरे अहलेबैत एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि हौज़े कौसर पर दोनों मेरे पास आयेंगे।

हज संस्कार समाप्त हो चुके हैं और पैग़म्बरे इस्लाम मक्का से मदीना जा रहे हैं। उस समय बहुत सारे मुसलमान पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे। मुसलमानों का कारवां आगे बढ़ता रहा यहां तक कि “कुराअल ग़मीम” नामक स्थान पर पहुंच गया। यह वही जगह है जिसमें ग़दीरे ख़ुम स्थित है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के संदेश के विशेष फरिश्ते हज़रत जिब्राइल नाज़िल हुए और पैग़म्बरे इस्लाम को रुकने का आदेश दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने भी फरमाया हे लोगो! ईश्वर के निमंत्रण का जवाब दो कि मैं ईश्वर का संदेश लाने वाला हूं”

कारवां वालों को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि जहां रुकने का आदेश दिया गया था वहां पानी तक नहीं था। दोपहर की नमाज़ का समय हो गया था पूरा मरुस्थल अज़ान की आवाज़ से गूंज उठा। लोगों ने नमाज की तैयारी की। पैग़म्बरे इस्लाम ने भी सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ाई। इस प्रकार की नमाज़ कभी भी वहां नहीं हुई थी। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ऊंटों के कजावे से बने मिंबर पर गये और ऊंची आवाज़ में भाषण देना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने महान ईश्वर की प्रशंसा की, उससे सहायता मांगी और कहा कि हम उस पर ईमान रखते हैं उस पर भरोसा रखते हैं और हम अपने बुरे नफ्सों व कार्यों से ईश्वर की शरण चाहते हैं कि उसके अलावा कोई भी गुहराहों का मार्गदर्शक नहीं है। ईश्वर ने जिसका मार्गदर्शन कर दिया है उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता। मैं गवाही देता हूं कि उसके अलावा कोई पूज्य नहीं है और मोहम्मद उसके बंदे और दूत हैं। हे लोगो निकट है कि मैं ईश्वर के निमंत्रण का जवाब दूं और तुम्हारे बीच से इस दुनिया से चला जाऊंगा। मुझ पर ज़िम्मेदारी है और तुम भी ज़िम्मेदार हो। मेरे बारे में क्या सोचते हो? सबने एक ज़बान होकर कहा हम गवाही देते हैं कि आपने ईश्वरीय धर्म का प्रचार- प्रसार किया और हमारे प्रति भलाई की और अच्छाई की अनुशंसा की और इस मार्ग में बहुत प्रयास किया ईश्वर आपको अच्छा प्रतिदान दे।

जब वातावरण शांत हो गया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने दोबारा कहा क्या तुम इस बात की गवाही नहीं देते हो कि ईश्वर के अलावा कोई पूज्य नहीं है। मोहम्मद उसके बंदे और उसके दूत हैं? स्वर्ग, नरक और मृत्यु सत्य है और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्रलय का दिन आयेगा और ईश्वर उन लोगों को ज़िन्दा करेगा जो मिट्टी में दफ्न हैं? इस पर सबने कहा कि हां हम गवाही देते हैं। फिर पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया मैं दो मूल्यवान चीज़ें तुम लोगों के बीच छोड़कर जा रहा हूं उनके साथ तुम कैसा व्यवहार करोगे? इस पर लोगों के बीच से एक व्यक्ति ने पूछा दो मूल्यवान चीज़ों से तात्पर्य क्या है? पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया एक ईश्वरीय किताब है कि उसका एक ओर ईश्वर के हाथ में है और दूसरी ओर तुम्हारे हाथ में है। उसकी किताब को पकड़ लो कि गुमराह नहीं होगे और दूसरे मेरे अहलेबैत हैं। ईश्वर ने मुझे सूचना दी है कि यह दोनों चीज़ें प्रलय तक एक दूसरे से अलग नहीं होंगी। हे लोगो ईश्वरीय किताब और मेरे अहलेबैत से आगे न बढ़ो और इन दोनों से पीछे भी न रहो कि अगर पीछे रह गये तो तुम खत्म न हो जाओगे।

इस स्थिति में पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हाथों को पकड़ा और उसे ऊंचा किया। सबने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम के पास देखा। इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया हे लोगो मोमिनों में सबसे योग्य व्यक्ति कौन है? सबने जवाब दिया कि ईश्वर का दूत बेहतर जानता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी बात जारी रखी ईश्वर मेरा स्वामी है और मैं मोमिनों का मालिक व स्वामी हूं हे लोगो जिस का  का मौला व स्वामी मैं हूं उसके स्वामी व मार्गदर्शक यह अली हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस अंतिम वाक्य को तीन बार दोहराया और उसके बाद कहा हे पालनहार! उसे दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और उसे  दुश्मन रख जो अली को दुश्मन रखे। हे पालन! अली के चाहने वालों की मदद कर और अली  के दुश्मनों को अपमानित कर। हे पालनहार! अली को सत्य की धुरी व आधार करार दे। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया कि उपस्थित लोगों पर अनुपस्थित लोगों को इस बात को बताना बताना ज़रूरी है। जो लोग सभा में मौजूद थे वे अपने स्थान पर ही थे कि ईश्वर का फरिश्ता संदेश लेकर नाज़िल हुआ और उसने पैग़म्बरे इस्लाम को शुभसूचना दी कि आज ईश्वर ने अपने धर्म को परिपूर्ण कर दिया और अपनी नेतमतों को पूरा किया। उस वक्त अल्लाहो अकबर की पावन ध्वनी गूंजी और पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया ईश्वर का आभार प्रकट करता हूं कि उसने अपने धर्म और अपनी नेमतों को पूरा किया और हमारी रिसालत और अली की विलायत से प्रसन्न हो गया। उसके बाद लोग गुटों- गुटों में पैग़म्बरे इस्लाम के तंबू में हाज़िर हुए और उनकी बैअत की अर्थात उनके आदेशों के पालन की प्रतिबद्धतता जताई और उन्हें मुबारक बाद दिया और उसके बाद लोग हज़रत अली अलैहिस्सलाम के तंबू में गये और पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनकी बैअत की और उन्हें मुबारक बाद दी। पैग़म्बरे इस्लाम इस दिन बहुत खुश थे और बार- बार कहते थे कि मुझे मुबारकबाद दो क्योंकि ईश्वर ने मुझसे नबुव्वत और मेरे अहलेबैत से इमामत विशेष किया और यह बहुत बड़ी विजय और कुफ्र व मित्थ्याचारियों की पराजय का भी चिन्ह है।


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