अफ़ग़ानिस्तान, ऐसी जंग जिसमें कोई विजेता नहीं, बड़ों के खेल और युद्धों का निजीकरण

अफ़ग़ानिस्तान, ऐसी जंग जिसमें कोई विजेता नहीं, बड़ों के खेल और युद्धों का निजीकरण

यह कड़ाके की सर्दी का मौसम था। ताजेकिस्तान की राजधानी दोशंबा में हम अफ़ग़ानिस्तान जाने की तैयारी कर रहे थे। हम भारत से उज़्बकिस्तान और वहां से ताजेकिस्तान पहुंचे थे।

दोशंबा से हम ताजेकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर पहुंचे थे। अमरीका अफ़ग़ानिस्तान पर हमला शुरू करने वाला था अतः वायु सीमाएं बंद कर दी गई थी। उत्तरी एलायंस जिसका नेतृत्व मशहूर कमांडर अहमद शाह मसऊद कर रहे थे उस तक पहुंचने के लिए हमें सबसे नज़दीक रास्ता यही लग रहा था।

हम 17 घंटे तक सीमा पर प्रतीक्षा करते रहे जिसके बाद हमें अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल होने की अनुमति मिली। दुनिया को कोने कोने से आए पत्रकारों की गाड़ियों की वहां भीड़ लग गई थी। हमारे पास कोई और रास्ता भी नहीं था। मेरे साथ भारतीय कैमरामैन अरविंद था जिसने मुझे अनेक रुकावटों से गुज़रने में मदद दी क्योंकि भारत उत्तरी गठजोड़ को सपोर्ट कर रहा था और भारतीयों को वह लोग बहुत अच्छी नज़र से देखते थे। काफ़ी रात हो गई थी तब हम एक पुलिस चेकपोस्ट पर पहुंचे। एक कमरे के भीतर जो पुरानी गुफा के समान था हमारे पासपोर्टों पर मोहर लगाई गई। मैंने वहां अपने और कैमरान के प्रवेश के लिए 200 डालर अदा किए। हमें वहां से गाड़ी और कमांडो भी साथ में लेना था जो हमारे लिए गाइड का काम भी करता और हमारी रक्षा भी करता। हम अहमद शाह मसऊद के प्रशासन के विदेश मंत्रालय की इमारत में पहुंचे। यह वही इमारत है जहां अहमद शाह मसऊद की हत्या की गई थी। हम वहां पहुंचे तो सारे लोग हतप्रभ रह गए कि हम जीवित वहां तक कैसे पहुंच गए। कारण यह था कि मैं अरब था और अहमद शाह मसऊद की हत्या करने वाले भी अरब थे अतः इस इलाक़े में अरब पत्रकारों को लोग ज़िंदा नहीं छोड़ते थे। मुझे तीन दिन तक वहां लगभग हिरासत में रखा गया बाद में जब दूसरे पत्रकारों ने बीच बचाव किया तब मुझे छोड़ा गया। मगर मुझे उस समय तक पत्रकारिता वाला कोई काम नहीं करने दिया गया जब तक विदेश मंत्री अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने हस्तक्षेप नहीं किया जिन्हें मैं निजी रूप से जानता हूं।

इंटेलीजेन्स सूत्रों से हमें यह रिपोर्ट पहले ही मिलने लगी थी कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ़ युद्ध करना चाहता है लेकिन जब 11 सितम्बर का हमला हो गया तो अमरीका ने अन्य देशों के साथ मिलकर तालेबान का शासन ख़त्म करने की योजना बना ली।

अमरीका ने हमला किया तालेबान की सरकार गिराई और अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया अब 17 साल गुज़र जाने के बाद भी यह संकट ख़त्म नहीं हुआ और अमरीका वह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाया है जिनके लिए उसने यह युद्ध किया था।

अमरीकी-सऊदी-पाकिस्तानी जेहाद कल्चर ने सोवियत संघ की सेना को हराने में और इसके लिए युवाओं को भर्ती के लिए तैयार करने में प्रभावी भूमिका निभाई थी मगर इस कल्चर ने क्लाशनकोफ़ कल्चर को बढ़ावा दिया और अनेक चरमपंथी संगठन दुनिया भर में और विशेष रूप से अफ़ग़ानिस्तान के क़रीबी इलाक़ों में अस्तित्व में आए। अमरीका ने अफ़गानिस्तान पर हमला किया उसे अपने क़ब्ज़े में ले लिया। उसने इराक़ पर भी हमला किया और वहां भी क़ब्ज़ा किया मगर इराक़ की परिस्थितियां इस समय अफ़ग़ानिस्तान से अलग हैं। अफ़ग़ानिस्तान की बात की जाए तो यहां हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। यही कारण है कि अमरीका में भी युद्ध की रणनीति के बड़े पक्षधर भी अब युद्ध के निजीकरण की बात करने लगे हैं। इसके लिए ब्लैक वाटर और एरिक प्रिंस जैसी एजेंसियों की सेवाएं ख़रीदी जा रही हैं ताकि अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध में कुछ सफलता हासिल की जा सके।

इस नई रणनीति का लक्ष्य यह है कि अफ़ग़ानिस्तान में तैनात विदेशी सैनिकों को वहां से छुट्टी मिल जाए। इस समय 23 हज़ार विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद हैं। इनके स्थान पर प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों के 6 हज़ार सैनिकों को तैनात किया जाए।

रूस भी अफ़ग़ानिस्तान के संबंध में सक्रिय है। रूस ने एक सम्मेलन करवाने की योजना बनाई थी जिसमें तालेबान को भी भाग लेना था मगर अमरीका को इससे आपत्ति थे और उसने अफ़ग़ान राष्ट्रपति पर दबाव डालकर इस सम्मेलन को स्थगित करवाया।

चीन भी अफ़ग़ान सैनिकों को आतंकवाद से निपटने के लिए ट्रेनिंग दे रहा है और उसने अपनी सीमा के निकट वाख़ान कारीडोर में एक सैनिक छावनी का निर्माण शुरू कर रखा है।

भारत भी मध्य एशिया के बाज़ारों में प्रवेश करने की कोशिश में है और इसके लिए वह ईरान में चाबहार बंदरगाह को डेवलप कर रहा है। भारत अफ़गानिस्तान में पुनरनिर्माण के कामों और सरकार के समर्थन में बड़ी भूमिका निभा रहा है। अफ़ग़ानिस्तान के लिए भारत की सहायता 3 अरब डालर तक पहुंच गई है। कुछ विशलेषक कहते हैं कि अमरीका चाहता है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में बड़ी भूमिका निभाए। मगर अफ़ग़ान सरकार अमरीका की नीतियों के अनुसार आगे बढ़कर अफ़ग़ानिस्तन की ज़मीनी परिस्थितियों से खुद को दूर कर रही है।

इमरान ख़ान के नेतृत्व में पाकिस्तान की कोशिश है कि वह अफ़ग़ानिस्तान सरकार से रिश्ते सुधरें और सीपेक योजना आगे बढ़कर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचे।

इस बीच अमरीका ने एक नई उलट पलट शुरू कर दी। अमरीका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने इस्लामाबाद की यात्रा की और वहां से नई दिल्ली और फिर काबुल गए। उन्होंने तालेबान से नए चरण की बातचीत की घोषणा भी कर दी। यहां यह सवाल पैदा होता है कि अमरीका तालेबान से क्या चाहता है। टीकाकार यह कहते हैं कि सबसे पहली चीज़ अमरीका यह चाहता है कि तालेबान अमरीकी छावनियों की सुरक्षा का वादा करें विशेष रूप से बगराम और शोरबक छावनियों को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए।

अमरीका से तालेबान की मांग यह है कि वह जेलों में बंद उनके सभी साथियों को रिहा करे। तालेबान की यह भी मांग है कि कूटनयिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी संख्या से अधिक विदेशी सैनिक जितने भी हैं वह अफग़ानिस्तान से चले जाएं।

यह बात अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई भी कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की उपस्थिति ख़त्म होनी चाहिए।

यह बात कहते तो सभी हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाल होनी चाहिए और यह काम अफ़ग़ान फ़ोर्सेज़ के हाथों अंजाम पाना चाहिए लेकिन दूसरी ओर व्यवहारिक चरण में यह दिखाई देता है कि यहां बड़ी ताक़तों के बीच लड़ाई है और यह छद्म युद्ध तेज़ होता जा रहा है।

अफ़ग़ानिस्तान की जो नई नस्ल है वह युद्ध की छाया में पली बढ़ी है जिसका इस युद्ध को शुरू करने में कोई रोल नहीं था। दूसरी ओर अमरीका में बहुत से युवा एसे हैं जिनका 11 सितम्बर की घटना से कोई लेना देना नहीं है। वह भी बाद में सेना में भर्ती होंगे और संभवतः युद्ध के लिए अफ़ग़ानिस्तान भेजे जाएंगे और उस नस्ल के लोगों से लड़ेंगे जो वहां की नई नस्ल से संबंधित हैं। वियतनाम युद्ध के बाद अफ़ग़ानिस्तान का युद्ध अमरीका का सबसे लंबा युद्ध है। इस युद्ध में कोई विजेता नहीं है। अमरीका और उसके घटक अफ़ग़ानिस्तान में हमेशा बने रहेंगे। अमरीकी इस समय अफ़ग़ानिस्तान का युद्ध समाप्त करना नहीं बल्कि उसे अपने हिसाब से मैनेज करना चाहते हैं इसलिए अफ़ग़ान युद्ध के प्राइवेटाइज़ेशन की बात हो रही है। इस बीच सबसे बड़ी क़ीमत अफ़ग़ान जनता को चुकानी पड़ रही है।

 

डाक्टर वाएल अव्वाद

(सीरियाई मूल के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हैं जो दक्षिण एशियाई देशों के विषयों पर काम करते हैं)


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