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इस्राईल से दोस्ती की चाहत के बावजूद, सऊदी अरब हिचकिचाहट का शिकार क्यों है?

इस्राईल से दोस्ती की चाहत के बावजूद, सऊदी अरब हिचकिचाहट का शिकार क्यों है?

हालिया कुछ दिनों से ऐसी अफ़वाहें गर्दिश कर रही थीं कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और सूडान के नक़्शेक़दम पर चलते हुए इस्राईल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का समझौता कर लेगा। लेकिन पिछले हफ़्ते इन अटकलों को उस वक़्त विराम लग गया, जब एक वरिष्ठ सऊदी राजकुमार ने ज़ायोनी प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू की सरकार को मध्य पूर्व में पश्चिमी उपनिवेशवादी शक्तियों का अंतिम रूप क़रार दिया।

सऊदी ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने पड़ोसी देश बहरीन में एक सुरक्षा सम्मेलन में इस्राईल की कड़ी आलोचना करते हुए कहाः आप खुले घाव का दर्द निवारक दवाईयों से इलाज नहीं कर सकते हैं।

डिटेंशन कैम्पों में फ़िलिस्तीनियों की दयनीय स्थिति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहाः बूढ़े और जवान, महिलाएं और पुरुष इन कैम्पों में सड़ रहे हैं और दूर दूर तक न्याय की कोई उम्मीद नहीं है। फ़लिस्तीनियों के घरों को ध्वस्त किया जा रहा है। जिसे इस्राईली चाहते हैं मार देते हैं।

उनका लहजा अन्य सऊदी अधिकारियों के नर्म लहजे के बिल्कुल विपरीत था, जो हाल के महीनों में इस्राईल के प्रति उन्होंने अपना रखा है। उनके शब्द इस्राईली विदेश मंत्री गैबी अशकेनाज़ी को जाकर लगे, जो वीडियो लिंक के माध्यम से सम्मेलन में भाग ले रहे थे। अशकेनाज़ी ने सऊदी प्रिंस की टिप्पणी पर खेद व्यक्त हुए कहाः मुझे नहीं लगता कि उनकी बातें मध्य पूर्व में जारी परिवर्तन को दर्शा रही हैं।

शायद इस्राईली तुर्की अल-फ़ैसल के दावे से आश्वस्त हो जाते कि वह देश के आधिकारिक प्रतिनिधि के बजाय अपनी व्यक्तिगत राय रख रहे थे। लेकिन, जब सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान के बोलने की बारी आई, तो उन्होंने प्रिंस तुर्की के इस तर्क को वापस नहीं लिया कि सउदी अरब, फ़िलिस्तीनी आकांक्षाओं के पूरा होने के बाद ही इस्राईल के साथ संबंध सामान्य बनाएगा।

उन्होंने कहाः हमें लगता है कि इस्राईल, इस क्षेत्र में अपनी जगह बना लेगा। लेकिन इसके लिए हमें फ़िलिस्तीनियों को उनका देश देना होगा और हमें इस स्थिति को निपटाने की ज़रूरत है।

इससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि सऊदी अरब को इस्राईल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने वाले समझौते की इतनी जल्दी नहीं है, हां, इस्राईल को लेकर सऊदी शासन के रवैये में बड़ा बदलाव आया है और उसका संकेत, हालिया दिनों में नेतनयाहू की सऊदी अरब की ख़ुफ़िया यात्रा और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात है।

सऊदी अरब ख़ुद को जहां फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों का बड़ा भाई समझता है, वहीं मुस्लिम देशों के नेतृत्व का भी दावा करता है। इसलिए वह कोई ऐसा संदेश नहीं देना चाहता है कि इस्राईल को मान्यता देने में उसने अपने जूनियर साथियों यूएई और बहरीन का अनुसरण किया है।

हालांकि वास्तविकता यह है कि सऊदी अरब को क्षेत्र या मुस्लिम जगत में अपनी साख पर बट्टा लगने की परवाह नहीं है। बल्कि इसके पीछे आंतरिक राजनीतिक असंतोष भी है। युवा क्राउन प्रिंस के हाथों में सत्ता की बागडोर होने के बावजूद, शाही परिवार की पुरानी पीढ़ी को वह आसानी से नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते हैं।

किंग सलमान भी फ़िलिस्तीनियों के लिए एक देश की स्थापना का समर्थन कर चुके हैं। प्रिंस तुर्की भी उन्हीं की पीढ़ी से संबंध रखते हैं, अगर उन्हें शाही परिवार में समर्थन हासिल नहीं होता, तो वह बहरीन सम्मेलन में इतना खुलकर बोलने का साहस नहीं कर पाते।

सऊदी राजनीति बाहरी लोगों के अनुमान से कहीं अधिक जटिल और पेचीदा है, इस्राईल का विरोध और फ़िलिस्तीनी नेताओं का अपमान, दोनों इसमें एक साथ शामिल हो जाते हैं। अक्तूबर में वाशिंगटन में पूर्व सऊदी राजदूत प्रिंस बन्दर बिन सुल्तान ने फ़िलिस्तीनी समस्या के समाधान की असफ़लता का ठीकरा फ़िलिस्तीनी नेताओं के सिर फोड़ते हुए उन पर सऊदी अरब से ग़द्दारी करने का आरोप लगा दिया था।

बहरहाल, यह मनामा में सऊदी अरब के दो राजकुमारों ने यह स्पष्ट कर दिया कि तेल-अवीव तक जाने वाला रास्ता रियाज़ के लिए इतना आसान नहीं है।


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