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इस्राईल में मंत्रीमंडल के गठन का मामला संसद के हवाले, नेतनयाहू नाकाम, क्या दो साल में पांचवीं बार चुनाव होंगे?

इस्राईल में मंत्रीमंडल के गठन का मामला संसद के हवाले, नेतनयाहू नाकाम, क्या दो साल में पांचवीं बार चुनाव होंगे?

ज़ायोनी शासन के राष्ट्रपति ने इस्राईल में नए मंत्रीमंडल के गठन का मामला संसद के हवाले कर दिया है।

निर्धारित समय में ज़ायोनी शासन के नए मंत्रीमंडल के गठन में नाकामी और प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू की हार की घोषणा के बाद ज़ायोनी शासन के राष्ट्रपति रोविन रिवलीन ने बुधवार को सांसदों के साथ एक मीटिंग में उनसे कहा है कि वे नए मंत्रीमंडल के गठन के लिए किसी प्रत्याशी का नाम पेश करें। 28 दिन की क़ानूनी मोहलत ख़त्म हो जाने के बाद नेतनयाहू ने मंलवार की शाम को ज़ायोनी राष्ट्रपति से कहा कि वे सरकार गठन में कामयाब नहीं हो पाए हैं और वे यह काम दोबारा उनके हवाले कर रहे हैं। पिछले दो साल में सरकार गठन में नेतनयाहू की यह तीसरी नाकामी है। इस नाकामी के बाद पिछले दो साल में चार संसदीय चुनाव आयोजित होने के बावजूद अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में राजनैतिक संकट जारी है।

 

पिछले कुछ महीनों से सारा मलबा नेतनयाहू के सिर पर गिरता आ रहा है। पहले तो वे अपने सबसे बड़े और सबसे अहम समर्थक यानी डोनल्ड ट्रम्प से वंचित हो गए और न सिर्फ़ यह कि तेल अवीव और वाॅशिंग्टन के बीच बल्कि इस्राईल के यहूदियों और अमरीका के यहूदियों के बीच भी खाई गहरी हो गई है। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय आईसीसी ने अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में ज़ायोनी शासन द्वारा किए गए अपराधों की जांच को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेतनयाहू के ख़िलाफ़ न्यायिक कार्यवाही का रास्ता खुल गया है। इसी के साथ खु़द इस्राईल के अंदर भ्रष्टाचार के कई केसों की वजह से नेतनयाहू जेल जाने से कुछ ही क़दम दूर हैं और इसी लिए वे प्रधामंत्री पद हासिल करने की सिर तोड़ कोशिश कर रहे थे ताकि उन्हें न्यायिक सुरक्षा मिल जाए लेकिन अब ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।

 

क्षेत्र में भी नेतनयाहू ने जितने जाल बिछाए थे वे एक एक करके टूटते जा रहे हैं। अमरीका, परमाणु समझौते में लौटने की कोशिश कर रहा है, सऊदी अरब, ईरान व सीरिया से अपने संबंधों को बेहतर बनाने के प्रयास में है, तेल अवीव व अरब देशों का गठजोड़ बन ही नहीं पाया जिसका नेतृत्व सऊदी अरब करने वाला था, नेतनयाहू को अबू धाबी में घुसने नहीं दिया गया और सबसे बढ़ कर यह कि ईरान पर किए जाने वाले इस्राईल के हमलों का, जिनका आदेश सीधे नेतनयाहू दिया करते थे, ईरान की ओर से कड़ा जवाब दिया जा रहा है जिसकी वजह से ज़ायोनी शासन की खोखली ताक़त का पुतला भरभरा कर गिर पड़ा है।

 

क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेतनयाहू की इन नाकामियों ने उनकी स्थिति को पहले से अधिक कमज़ोर बना दिया है। पिछले कुछ हफ़्तों में अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में जो घटनाएं हुई हैं उन्होंने सुरक्षा व संचालन के मैदान में नेतनयाहू की पोल खोल दी है। अब ऐसा लगता है कि इस्राईल के सभी दल और राजनैतिक गुट, यहां तक कि नेतनयाहू के घटक भी उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं हैं। इस वक़्त इस्राईल एक दोराहे पर खड़ा है और उसे फ़ैसला करना है कि नेतनयाहू को क़ुरबान कर दिया जाए ताकि उसे वर्तमान संकटों से मुक्ति मिल जाए या फिर नेतनयाहू को बाक़ी रखा जाए और उनके सत्ता में रहने की क़ीमत अदा की जाती रहे। 


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