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इस्राईल के नस्लभेदी होने का इंकार करना बहुत मुश्किल है, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध कर रहा है, ह्यूमन राइट्स वॉच की 213 पेज की रिपोर्ट

इस्राईल के नस्लभेदी होने का इंकार करना बहुत मुश्किल है, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध कर रहा है, ह्यूमन राइट्स वॉच की 213 पेज की रिपोर्ट

अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अत्याचार व दमन के दशकों पुराने इस सिस्टम को ख़त्म करने के लिए कार्यवाही करने की ज़रूरत है।

27 अप्रैल को प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ह्यूमन राइट्स वॉच ने 213 पेज पर आधारित एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक हैः “सीमा से बाहर”। इस रिपोर्ट में इस्राईली सरकार की, अपने यहाँ और अतिग्रहित फ़िलिस्तीन में फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ इंसानियत को शर्मिन्दा करने वाले नस्लभेदी व दमनकारी अपराध करने के कारण निंदा की।

यह रिपोर्ट, इस मानवाधिकार संगठन की नज़र में “सीमा से बाहर” को चिन्हित करती है। यह संगठन लंबे समय से इस्राईल की खुले आम व्यापक निंदा से बचता था। उसका यह रवैया फ़िलिस्तीनियों और उनके अधिकारों के समर्थकों के मन में कुंठा पैदा करता था।

ह्यूमन राइट्स वॉच की समीक्षा में, जिसे सीमा कहा गया है उसका आयाम क़ानूनी है जिसे इस्राईल लांघ चुका है। ह्यूमन राइट्स वॉच के इग्ज़ेक्यूटिव डायरेक्टर केनेथ रॉथ ने कहाः ऐसी हालत में जब दुनिया का बड़ा भाग इस्राईल के 50 साल के अवैध क़ब्ज़े को अस्थायी हालत के रूप में देखता है, जिसका दशकों से चली आ रही शांति प्रक्रिया से जल्द ही हल निकल आएगा, फ़िलिस्तीनियों का दमन उस सीमा पर स्थायी रूप से पहुंच गया है जो नस्लभेदी व दमनकारी अपराध के दायरे में आता है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़, फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ इस्राईल के अपराध इतने गंभीर हो चुके हैं कि उसे मानवता के ख़िलाफ़ अपराध समझना चाहिए, ऐसे अपराध जिसमें कुछ इतने गंभीर हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नज़र में कड़ी से कड़ी सज़ा को उचित ठहराते हैं।

1975 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव 3379 पास हुआ जिसमें ज़ायोनीवाद को एक तरह का नस्लभेद घोषित किया गया लेकिन बाद में इस्राईल के दबाव में रद्द हो गया। इस प्रस्ताव ने ज़ायोनीवाद को नस्लभेद के समीकरण में पिछले प्रस्तावों की बुनियाद पर रखा था जिसमें 1963 का प्रस्ताव नंबर 1904 भी शामिल है। प्रस्ताव 1904 में नस्लभेदी अंतर या वरीयता पर आधारित सिद्धांत के वैज्ञानिक तौर पर ग़लत, नैतिक नज़र से निंदनीय, सामाजिक नज़र ने अन्याय व ख़तरनाक होने पर बल दिया गया है।

2002 में क़ुद्स का दौरा करने के बाद, आर्चबिशप डेस्मंड टूटू ने, जिन्हें दक्षिण अफ़्रीक़ा की नैतिक अंतरात्मा कहा जाता है, कहा था जो कुछ उन्होंने फ़िलिस्तीनियों के साथ इस्राईल के व्यवहार को देखा उसने उन्हें “दक्षिण अफ़्रीक़ा में अश्वेतों के साथ गुज़रे व्यवहार की बड़ी हद तक याद दिलाई।” इस बात को वह बारंबार कह चुके हैं।

अभी यह देखना बाक़ी है कि ह्यूमन राइट्स वॉच का इस्राईल को नस्लभेदी सरकार मानने का फ़ैसला, दशकों पुराने फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष में ऐतिहासिक लम्हा होगा और राजनैतिक बद्लाव को प्रेरित करेगा। 5 फ़रवरी को अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय का अतिग्रहित फ़िलिस्तीनी इलाक़ों का अपने अधिकार क्षेत्र में क़रार देना, जनवरी में इस्राईली एनजीओ बेतस्लेम का इस्राईल को नस्लभेदी सरकार कहना और इस्राईल की आलोचना को ख़ामोश करने के लिए, इंटरनैश्नल होलोकॉस्ट रिमेम्ब्रेन्स अलायन्स की ऐन्टी सेमिटिज़्म की परिभाषा पर बड़े पैमाने पर विवाद, ये सब बता रहा है कि स्थिति में बदलाव होकर रहेगा।

कोई मानवाधिकार संगठन या कोई शख़्स कब तक इस्राईल के नस्लभेदी सरकार होने का इंकार करेगा, जब ख़ुद इस्राईली प्रधान मंत्री नेतनयाहू बड़े घमंड से कह चुके हैः “इस्राईल सब नागरिकों का नहीं है...इस्राईल सिर्फ़ यहूदी लोगों का है।”

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट सही दिशा में सार्थक बदलाव है। आज हमारे सामने यह सवाल नहीं है कि इस्राईल एक नस्लभेदी सरकार है या नहीं। अस्ल सवाल यह है कि अतंर्राष्ट्रीय समुदाय कब उसके खुल्लम खुल्ला, निंदनीय दमनकारी सिस्टम को लगाम लगाएगा। (साभारः अल्जज़ीरा। एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में रीडर लोरी ए एलेन के क़लम से)


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