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इस्राईल के खिलाफ शेर की तरह गरजने वाले अर्दोगान क्यों बन गये भीगी बिल्ली? इस्राईल के आशीर्वाद के लिए अर्दोगान ने किसे बनाया बलि का बकरा? अब्दुलबारी अतवान का आंख खोलने वाला लेख

इस्राईल के खिलाफ शेर की तरह गरजने वाले अर्दोगान क्यों बन गये भीगी बिल्ली? इस्राईल के आशीर्वाद के लिए अर्दोगान ने किसे बनाया बलि का बकरा? अब्दुलबारी अतवान का आंख खोलने वाला लेख

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगान को इस्लामी जगत का नेता बनने का बहुत शौक है और वह कभी कभी काफी लोक प्रिय भी हो जाते हैं। इस्राईल के खिलाफ कभी वह आग उगलते थे और इस्राईली नेताओं के साथ बैठना भी पसंद नहीं करते थे मगर यह सब अब पुरानी बातें हैं। नयी बात जानने के लिए लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र रायुल यौम के मुख्य संपादक अब्दुलबारी अतवान का यह लेख ज़रूर पढ़ें।


लगभग दस वर्षों के अंतराल के बाद इस्राईल से एक यात्री विमान तुर्की के इस्तांबूल एयरपोर्ट पर उतरा। इसके साथ ही जेनेवा में वार्ता के बाद राष्ट्रपति परिषद और प्रधानमंत्री का चयन किया गया शायद यह एक संयोग हो लेकिन इससे तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान के रुख में बड़ी तेज़ी से बदलाव का चिन्ह है जिन्हें अपनी विदेश नीतियों कई बड़ी बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा है। उनकी इन नीतियों का उल्टा ही असर हुआ है और तुर्की अधिक अलग थलग पड़ गया है।

याद रहे लीबिया के मामले में राष्ट्रपति परिषद के प्रमुख फाएज़ सिराज, गृहमंत्री, फत्ही बाशाग़ा, रक्षा मंत्री सालेह अन्नमरूश जैसे अर्दोगान के सभी घटक, नई सरकार के ढांचे में अपनी अपनी पोज़ीशन बचाने में विफल रहे जिसका मतलब यह है कि तुर्की के साथ बड़े बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर करने वाली लीबिया की सरकार हार चुकी है।  

लीबिया में इस प्रकार का बदलाव, अर्दोगान के क्षेत्रीय गठबंधन के लिए बेहद अहम दो घटनाओं के बाद सामने आया है, एक क़तर और सऊदी अरब सहित चार देशों के बीच संधि और विशेषकर सऊदी अरब और मिस्र से क़तर की फिर से दोस्ती और तुर्की  बेहद निकट घटक ट्रम्प का पतन। अमरीका के नये राष्ट्रपति जो बाइडन कुर्दों और अर्मिनियों के एतिहासिक मित्र हैं और अर्दोगान से उन्हें कोई विशेष लगाव नहीं है।

इस तरह से क्षेत्र में हो रहे तेज़ बदलाव अर्दोगान को इस्राईल के सामने बांहे फैलाने के अलावा कोई और रास्ता नज़र नहीं आया। इसी लिए उन्होंने इस्राईल से मन मुटाव खत्म करने का फैसला किया और इसके लिए उन्होंने तुर्की की खुफिया एजेन्सी के प्रमुख को अवैध अधिकृत बैतुलमुक़द्दस भेजा ताकि इस्राईल से संबंध सुधारा जाए। वह दिसंबर में ही इस्राईल से संबंधों में बेहतरी की अपनी अच्छा प्रकट कर चुके थे।

इस्राईली ब्लैकमेलिंग के मास्टर हैं विशेषकर अगर सामने वाले को कृपा दृष्टि की ज़रूरत हो। इस्राईली किसी भी दशा में मुफ्त में किसी का भला नहीं करते यही वजह है कि इसराईल  ने तुर्की  साथ संबंधों की बहाली के लिए फिलिस्तीनी संगठन हमास से तुर्की के संबंध खत्म करने की शर्त लगा दी।

ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र टाइम्ज़ ने दो हफ्ते पहले एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि तुर्की ने हमास को अपने नये रुख से अवगत करा दिया है और उससे मांग की है कि वह अपने सदस्यों को तुर्की से हटाए और अपने से संबंधित कुछ कंपनियों और संगठनों को भंग कर दे तथा तुर्की की भूमि पर अपनी सभी गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगा दे इसका एक सुबूत उस समय भी नज़र आया जब तुर्की के अधिकारियों ने इस्तांबूल हवाई अड्डे पर हमास के एक अधिकारों को देश में प्रवेश होने की अनुमति ही नहीं दी और उसे जहां से वह आया था वहीं लौटा दिया।

     बहुत से चिन्ह हैं जिनसे पता चलता है कि तुर्की ने इस्राईल की शर्त मान ली है। एक सुबूत तो यह है कि इस्राईल की अलआल एयर ने तुर्की के लिए अपनी उड़ानें आरंभ कर दी हैं, इस्राईल ने इसी तरह, तुर्की में अपना प्रभारी राजदूत भी निर्धारित कर दिया है, हमास नेताओं  की इंस्ताबूल यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, फिलिस्तीनी संगठनों के मध्य वार्ता का आयोजन काहिरा में कराया जा रहा है और तुर्की मीडिया  से इस्राईल के साथ संबंध बनाने की प्रक्रिया पर अचानक ही विराम लग गया है।

लीबिया इलाके में जो कुछ हुआ है उससे तुर्की को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है और अरब जगत में भूमिका उसका सपना चकनाचूर हो गया है। इसी लिए अब अर्दोगान तुर्कमन जातिवाद को पुनः जगाने की बात करते हुए पश्चिमी चीन से शुरु होकर इंस्ताबूल तक जाने वाली तुर्की पट्टी की बातें करने लगे हैं।

अंत में हम यह कहना चाहते हैं कि तुर्की की सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलेपमेंट पार्टी को देश के भीतर बहुत सी समस्याओं का सामना है इस लिए उसे लगता है कि इस्राईल के साथ संबंध बना कर वह अपनी समस्याओं को कम कर सकती है भले ही इसके लिए उसे फिलिस्तीनी संगठन हमास की बलि ही क्यों न चढ़ानी पड़े। शायद इसी वजह से हमास ने भी रामल्लाह में फिलिस्तीनी प्रशासन से सुलह सफाई स्वीकार कर लिया है और अब वह ओस्लो समझौते के अंतर्गत और रामल्लाह की शर्तों पर चुनाव के आयोजन पर भी तैयार हो गया है, वैसे अगले दिनों में कुछ भी हो सकता है।


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